आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक याचिका में दावा किया गया है कि हरियाणा पुलिस की महिला उपनिरीक्षक ने गुरुग्राम में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले को परिवार से यह कहकर दबाने की कोशिश की कि पीड़िता को ‘गलतफहमी’ हुयी होगी।
याचिका के मुताबिक मामले की जांच की जिम्मेदारी निभा रही महिला पुलिस कर्मी ने परिवार से यहां तक कहा कि तीन आरोपियों में से एक शहर छोड़कर भाग जाएगा और फिर कभी नजर नहीं आएगा।
दस्तावेज के मुाबिक यौन उत्पीड़न के मामले को लापरवाही से संभालने की आरोपी महिला उप निरीक्षक को हरियाणा सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा ने 13 मार्च को एक अन्य यौन अपराध से संबंधित मामले को रफा-दफा करने के एवज में 25 हजार रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया।
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान महिला पुलिसकर्मी को फटकार लगाई। याचिका में आरोपी महिला पुलिस उपनिरीक्षक का नाम दर्ज है, लेकिन शीर्ष अदालत ने उसकी पहचान उजागर नहीं की और उसे जांच अधिकारी और महिला उप निरीक्षक के रूप में संबोधित किया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत,न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने माता-पिता को मामला आगे न बढ़ाने का सुझाव देने के लिए महिला अधिकारी की आलोचना करते हुए कहा, ‘‘यह चौंकाने वाला है... शिकायत दर्ज न होने पर भी पुलिस को मामले की जांच करनी होगी।’’
उच्चतम न्यायालय ने गुरुग्राम पुलिस के मामले से निपटने के तरीके पर भी सवाल उठाए। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने टिप्पणी की, ‘‘पुलिस किस हद तक असंवेदनशील हो गई है? तथाकथित महानगर में ऐसा हो रहा है! आप एक सदमे से ग्रस्त बच्ची का मामला संभाल रहे हैं।’’
शीर्ष अदालत ने गुरुग्राम में चार साल की बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के मामले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराने का अनुरोध करने वाली बच्ची के परिवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हरियाणा सरकार, पुलिस प्रमुख और अन्य को नोटिस जारी किया।
मामले में प्राथमिकी चार फरवरी को दर्ज की गई थी जबकि घटना उससे कुछ समय पहले घटी थी।
पीठ ने गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारी (आईओ) को मामले के संपूर्ण रिकॉर्ड के साथ 25 मार्च को उसके समक्ष पेश होने का भी निर्देश दिया।
उच्चतम न्यायालय में जमा कराए गए दस्तावेजों के मुताबिक जांच अधिकारी ने पीड़िता की मां को यह कहते हुए कि बच्ची अंतत: घटना को भूल जाएगी, बार-बार प्राथमिकी दर्ज नहीं कराने के लिए मनाने की कोशिश की। महिला अधिकारी ने पीड़िता की मां से कथित तौर पर कहा कि अगर प्राथमिकी दर्ज होती है तो परिवार के लिए अगले तीन साल नरक समान होंगे।