मालेगांव
मालेगांव ब्लास्ट मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के हालिया फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। Asaduddin Owaisi ने इस फैसले पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे पीड़ितों के साथ “विश्वासघात” करार दिया है। उन्होंने जांच एजेंसी National Investigation Agency (NIA) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए।
दरअसल, Bombay High Court ने 2006 मालेगांव धमाके के मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया है। इस फैसले के बाद ओवैसी ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस घटना में 31 लोगों की मौत हुई थी और 300 से अधिक लोग घायल हुए थे, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग थे। उन्होंने आरोप लगाया कि शुरुआत में जांच एजेंसियों ने जल्दबाजी में नौ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया, जिन्हें बाद में 2016 में बरी कर दिया गया।
ओवैसी ने कहा, “यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि न्याय की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं। क्या NIA इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी? इसकी संभावना बेहद कम है। पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ यह बड़ा अन्याय है। भारत में मुसलमान होने का मतलब सिर्फ न्याय का इंतजार करना रह गया है।”
उन्होंने 2008 मालेगांव ब्लास्ट केस का भी जिक्र करते हुए कहा कि इस मामले में भी जांच की दिशा पर सवाल उठे थे। ओवैसी ने पूर्व विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सालियन के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उन्हें आरोपियों के खिलाफ नरमी बरतने के लिए कहा गया था।
गौरतलब है कि 2008 मालेगांव ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस मामले में भी NIA की विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ पीड़ितों के परिवारों ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
पीड़ित परिवारों का कहना है कि जांच में कई खामियां थीं और अहम सबूतों को नजरअंदाज किया गया। उनका दावा है कि साजिश जैसे मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) भी महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अदालत ने उन्हें पर्याप्त नहीं माना।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि बम उसी मोटरसाइकिल में रखा गया था, जिसका जिक्र किया गया था। इसके अलावा, जांच के दौरान घटनास्थल से फिंगरप्रिंट, डेटा या अन्य ठोस साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए। अदालत ने यह भी कहा कि कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हेरफेर के संकेत मिले हैं, जिससे मामले की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
साथ ही, Abhinav Bharat के कथित संबंधों को लेकर भी अदालत ने कहा कि इस संगठन के फंड का आतंकवादी गतिविधियों में उपयोग होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला।
कुल मिलाकर, मालेगांव ब्लास्ट केस एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया, जांच एजेंसियों की भूमिका और आतंकवाद से जुड़े मामलों की संवेदनशीलता को लेकर बहस के केंद्र में आ गया है। ओवैसी के बयान ने इस मुद्दे को और अधिक राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बना दिया है।