मयूरभंज (ओडिशा)
वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक बेहद अनोखी और चौंकाने वाली घटना सामने आई है। एक युवा नर Royal Bengal Tiger ने करीब 800 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर ओडिशा के प्रसिद्ध Similipal Tiger Reserve में प्रवेश किया है। इस दुर्लभ घटना को अधिकारियों ने “अद्भुत और पहली बार” होने वाला मामला बताया है।
वन विभाग के मुताबिक, यह बाघ लगभग 4 से 5 साल का है और अपने पूर्ण वयस्क चरण में है। इसकी मौजूदगी का पता देशभर में चल रही बाघ गणना (टाइगर सेंसेस) के दौरान लगाए गए कैमरा ट्रैप्स से चला। सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर प्रकाश चंद गोगिनेनी ने बताया कि यह बाघ दिसंबर-जनवरी के बीच रिजर्व में दाखिल हुआ।
जानकारी के अनुसार, इस बाघ ने अपनी यात्रा छत्तीसगढ़ की दिशा से शुरू की और लंबा रास्ता तय करते हुए सुंदरगढ़, बनई के जंगल, देवगढ़, ढेंकनाल और कामाख्यानगर जैसे इलाकों से गुजरते हुए अंततः सिमिलिपाल पहुंचा। इस पूरी यात्रा के दौरान उसकी गतिविधियों को सीसीटीवी और कैमरा ट्रैप्स में रिकॉर्ड किया गया।
हालांकि बाघ के सटीक मूल स्थान की पुष्टि अभी नहीं हो पाई है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि यह मध्य भारत के बाघ आवास क्षेत्र से आया हो सकता है। खास बात यह है कि इतनी लंबी दूरी तय कर किसी बाघ का स्वाभाविक रूप से दूसरे राज्य के रिजर्व में पहुंचना पहली बार दर्ज किया गया है।
वन अधिकारियों ने बताया कि यह बाघ अभी भी सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में मौजूद है। उसकी गतिविधियों और स्वास्थ्य पर नजर रखने के लिए आने वाले समय में और अधिक कैमरा ट्रैप्स लगाए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी बाघ का इस रिजर्व में आना जैव विविधता के लिहाज से बेहद सकारात्मक संकेत है।
सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व करीब 2750 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और यह अपने दुर्लभ काले (मेलानिस्टिक) बाघों और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। हालांकि, इसकी भौगोलिक अलगाव के कारण यहां बाघों में इनब्रीडिंग (निकट संबंधियों के बीच प्रजनन) को लेकर चिंता जताई जाती रही है।
ऐसे में किसी बाहरी बाघ का यहां आना इस समस्या को कम करने में मददगार हो सकता है। इससे बाघों की आनुवंशिक विविधता बढ़ेगी और पूरी आबादी अधिक स्वस्थ बनेगी।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की लंबी दूरी की यात्रा यह भी दर्शाती है कि जंगलों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है। बाघ स्वभाव से नए क्षेत्र, साथी और भोजन की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं, और यह घटना उसी प्राकृतिक प्रवृत्ति का उदाहरण है।
कुल मिलाकर, यह घटना न केवल वन्यजीव संरक्षण के लिए एक सकारात्मक संकेत है, बल्कि यह भी दिखाती है कि भारत में बाघों के लिए सुरक्षित और जुड़े हुए आवास धीरे-धीरे मजबूत हो रहे हैं।