नई दिल्ली
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में विशेष इलेक्ट्रॉनिक वोटर सूची संशोधन (SIR) के खिलाफ अपनी याचिका पर बहस की और आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बंगाल को अन्य राज्यों की तुलना में विशेष रूप से निशाना बना रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी दलील पेश करते हुए ममता ने कहा कि राज्य के कई नागरिकों को जिंदा होने के बावजूद मृत घोषित किया गया और चुनाव आयोग की प्रक्रिया केवल लोगों को मतदाता सूची से हटाने के लिए की जा रही है, शामिल करने के लिए नहीं। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया और न्यायालय से हस्तक्षेप करने की अपील की।
ममता ने चुनाव आयोग को तंज कसते हुए इसे “व्हाट्सएप आयोग” भी कहा, जिसका संकेत आयोग द्वारा अधिकारियों को व्हाट्सएप के माध्यम से निर्देश भेजने की ओर था। उन्होंने कहा कि बंगाल में यह प्रक्रिया आमतौर पर दो साल में पूरी होती है, लेकिन इसे तीन महीनों में, त्योहार और फसल कटाई के मौसम में लागू किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि विवाहित महिलाओं को उनके पति का उपनाम या ससुराल जाने पर नोटिस भेजा जा रहा है और कोर्ट के निर्देशों के बावजूद आधार को वैध दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा। ममता ने बंगाल की तुलना असम से करते हुए कहा, "क्यों बंगाल को ही टारगेट किया जा रहा है?"
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बहस के लिए 15 मिनट का समय दिया, जिसमें ममता ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए और कहा कि उनका संघर्ष सिर्फ पार्टी के लिए नहीं बल्कि आम जनता के लिए है। उन्होंने कहा, "मैं एक सामान्य परिवार से हूं और न्याय पाने के लिए संघर्ष कर रही हूं।"
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि केवल 80 ग्रेड-2 अधिकारियों और निचले पद के कर्मचारियों को SIR प्रक्रिया में लगाया गया, जबकि ममता ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि राज्य ने आयोग की मांगी गई सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी कर 9 फरवरी तक जवाब मांगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी वास्तविक मतदाता सूची में बने रहें और कोई भी निर्दोष व्यक्ति बाहर न छोड़ा जाए।
ममता ने सुनवाई के अंत में न्यायालय को धन्यवाद दिया और लोकतंत्र की रक्षा करने की अपील की।