Makar Sankranti 2025: तिथि, अनुष्ठान, मिथक, महत्व और इसे क्यों मनाया जाता है

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 13-01-2025
Makar Sankranti 2025: Date, rituals, myths, significance, and why it's celebrated
Makar Sankranti 2025: Date, rituals, myths, significance, and why it's celebrated

 

आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली 
 
मकर संक्रांति मंगलवार, 14 जनवरी, 2025 को सुबह 9:03 बजे शुरू होगी. अनुष्ठान और प्रार्थना के लिए शुभ अवधि, पुण्य काल, 8 घंटे और 43 मिनट तक चलेगी, जो शाम 5:46 बजे समाप्त होगी. यह त्यौहार सूर्य के मकर राशि (मकर) में संक्रमण का प्रतीक है, जो इसकी उत्तर दिशा की यात्रा या उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है. इस खगोलीय घटना को अत्यधिक शुभ माना जाता है, जो नवीनीकरण और नई शुरुआत का वादा करती है.

मकर संक्रांति न केवल खगोलीय महत्व का उत्सव है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, कृषि और आध्यात्मिक परंपराओं में निहित एक अवसर भी है. देश भर में विविध रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाने वाला यह त्यौहार कृतज्ञता, नवीनीकरण और एकता का प्रतीक है.
 
मकर संक्रांति का गहरा सांस्कृतिक और कृषि महत्व है. यह ऋतुओं के परिवर्तन का प्रतीक है, जो सर्दियों के अंत और वसंत के आगमन का प्रतीक है. किसानों के लिए, यह फसल के मौसम के अंत और एक नए कृषि चक्र की शुरुआत का प्रतीक है, जो इसे प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर बनाता है.
 
 
मकर संक्रांति: एकजुटता का उत्सव

मकर संक्रांति कृतज्ञता और एकता का त्योहार है, जो परिवारों और समुदायों को एक साथ लाता है. यह रिश्तों को संजोने, बीते साल के लिए आभार व्यक्त करने और आगे आने वाले अवसरों को अपनाने का दिन है.
 
भारत भर में अनूठी परंपराओं के साथ मनाया जाने वाला यह कालातीत त्योहार लाखों लोगों के दिलों में नवीनीकरण और उम्मीद की प्रेरणा देता है.
 
मकर संक्रांति: पौराणिक महत्व

मकर संक्रांति कई किंवदंतियों से जुड़ी है:
 
भगवान शनि और सूर्य देव: यह दिन भगवान शनि और उनके पिता सूर्य देव के पुनर्मिलन के साथ सद्भाव का प्रतीक है.
 
राजा भगीरथ और गंगा: यह पवित्र गंगा के धरती पर अवतरण का स्मरण करता है, जो शुद्धिकरण और पुनर्जन्म का प्रतीक है.
 
भगवान विष्णु की विजय: यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, क्योंकि भगवान विष्णु ने राक्षसों को हराकर उनके नकारात्मक प्रभाव को समाप्त कर दिया था.
 
मकर संक्रांति: खगोल विज्ञान, कृषि और आध्यात्मिकता में महत्व
 
खगोलीय महत्व
 
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से उत्तरायण की शुरुआत होती है, जो छह महीने की अवधि है जिसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है. माना जाता है कि यह चरण मानवता के लिए समृद्धि और आशीर्वाद लाता है.
 
कृषि महत्व
 
यह त्यौहार फसल के मौसम के समापन का प्रतीक है. किसान भूमि और प्राकृतिक तत्वों को उनके समर्थन के लिए धन्यवाद देते हैं और अगले बुवाई चक्र की तैयारी करते हैं, जो विकास और नवीनीकरण का प्रतीक है.
 
आध्यात्मिक प्रतीकवाद
 
मकर संक्रांति आत्म-प्रतिबिंब और सकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करती है. सूर्य की उत्तर दिशा की यात्रा को ज्ञान और अज्ञानता के निवारण के रूपक के रूप में देखा जाता है.
 
मकर संक्रांति: पूरे भारत में क्षेत्रीय उत्सव
 
उत्तर भारत: पंजाब में, मकर संक्रांति से पहले लोहड़ी मनाई जाती है, जो एक फसल उत्सव है जिसे अलाव, पारंपरिक नृत्य और उत्सव के भोज के साथ मनाया जाता है. परिवार तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ बाँटते हैं, जो एकता का प्रतीक है.
 
दक्षिण भारत: तमिलनाडु और पड़ोसी राज्यों में, यह त्यौहार चार दिनों तक पोंगल के रूप में मनाया जाता है. भक्त सूर्य देव, मवेशियों और धरती का सम्मान करते हैं. पोंगल जैसे विशेष व्यंजन तैयार किए जाते हैं और घरों को जीवंत कोलम डिज़ाइन से सजाया जाता है.
 
 
पश्चिम भारत: गुजरात और राजस्थान में पतंग उड़ाना एक पहचान है, जो आत्मा के उत्थान का प्रतीक है. उंधियू और तिल से बनी मिठाइयाँ जैसे पारंपरिक व्यंजन साझा किए जाते हैं.
 
पूर्वी भारत: पश्चिम बंगाल में, गंगा सागर मेला तीर्थयात्रियों को पवित्र स्नान के लिए गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर खींच लाता है. पिट्ठे और पातिशप्ता जैसी मिठाइयों का आनंद लिया जाता है. बिहार और झारखंड में, दही चूड़ा, तिलकुट और खिचड़ी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ उत्सव का अभिन्न अंग हैं.
 
मध्य भारत: मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में, लोक नृत्य, मेले और सामुदायिक दावतें त्यौहार की निशानी हैं. महाराष्ट्र में, तिलगुल जैसी मिठाइयों का आदान-प्रदान "तिलगुल घ्या, गोड़ गोड़ बोला" वाक्यांश के साथ किया जाता है, जो सद्भाव और सद्भावना को बढ़ावा देता है.