मुंबई,
महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया और अभूतपूर्व अध्याय जुड़ने जा रहा है। सोमवार से शुरू हो रहा बजट सत्र राज्य के इतिहास का पहला ऐसा सत्र होगा, जब न तो विधानसभा में और न ही विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष मौजूद होगा। इस स्थिति ने सियासी हलकों में बहस तेज कर दी है और विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए चिंताजनक बताया है।
विधानसभा में इस समय सत्तारूढ़ गठबंधन महायुति को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है। महायुति में भारतीय जनता पार्टी के साथ उसके सहयोगी दल शामिल हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (एमवीए) संख्या बल के मामले में अपेक्षित आंकड़े तक नहीं पहुंच पा रहा है। नियमों के अनुसार नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए किसी दल के पास सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम दस प्रतिशत होना आवश्यक होता है। मौजूदा परिस्थिति में कोई भी विपक्षी दल इस मानदंड को पूरा नहीं कर पा रहा है।
एमवीए के घटक दलों ने इसे लोकतांत्रिक संतुलन पर आघात बताया है। संजय राउत ने इस स्थिति को लोकतंत्र पर कलंक करार देते हुए कहा कि विपक्ष की संवैधानिक भूमिका सरकार को जवाबदेह बनाना है, लेकिन जब औपचारिक रूप से नेता प्रतिपक्ष ही नहीं होगा तो सदन में प्रभावी निगरानी और बहस की धार कमजोर पड़ सकती है। वहीं भास्कर जाधव ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ गठबंधन अहंकार में लोकतांत्रिक परंपराओं की अनदेखी कर रहा है और जानबूझकर विपक्ष को संस्थागत मान्यता से दूर रखा जा रहा है।
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति का विशेषाधिकार है और सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं करती। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप है।
उधर, पिछले वर्ष दिसंबर में कांग्रेस की एमएलसी प्रज्ञा सातव के इस्तीफे के बाद 78 सदस्यीय विधान परिषद में विपक्ष की स्थिति और कमजोर हो गई है। इससे ऊपरी सदन में भी नेता प्रतिपक्ष के पद पर दावा करना लगभग असंभव हो गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिना नेता प्रतिपक्ष के बजट सत्र सरकार के लिए अपेक्षाकृत सहज हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता और विपक्ष की औपचारिक भागीदारी को लेकर सवाल लगातार उठते रहेंगे। महाराष्ट्र की सियासत में यह सत्र लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रह सकता है।





