हज़रत मूसा (अ.स.) के जीवन में तौरेत का अवतरण एक बेहद महत्वपूर्ण घटना थी। इस्लामी हदीसों के अनुसार, तौरेत रमज़ान के महीने में, खासकर छठी तारीख को हज़रत मूसा (अ.स.) पर अवतरित हुई। हज़रत वसीला इब्न अस्का (र.अ.) से एक रिवायत में यह भी बताया गया है कि यह घटना रमज़ान के दूसरे सप्ताह में हुई थी। उस समय हज़रत मूसा (अ.स.) और उनके अनुयायी बनी इसराइल मिस्र से बाहर निकल चुके थे और सिनाई पर्वत की ओर यात्रा कर रहे थे। यही वह जगह थी जहाँ अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अ.स.) को बुलाया और उन्हें तौरेत प्रदान की। इस घटना का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत गहरा था।

हज़रत मूसा (अ.स.) को तौरेत अवतरित होने का अनुभव अल्लाह तआला का विशेष आदेश था। यह पुस्तक यहूदी राष्ट्र के लिए एक कानूनी और नैतिक संविधान का काम करती थी। तौरेत का मुख्य उद्देश्य लोगों को ईश्वर की पूजा और उसके आदेशों के पालन की शिक्षा देना था।
इसके अलावा यह समाज में न्याय और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून और नियम भी प्रदान करती थी। तौरेत में धार्मिक कृत्यों, उपासना पद्धतियों और बलिदान के नियमों का भी विस्तार से उल्लेख है। कुरान में कहा गया है कि अल्लाह ने हज़रत मूसा (अ.स.) से सीधे बात की और उन्हें तौरेत का ज्ञान दिया। सूरा अन-निसा में इसका जिक्र मिलता है।
तौरेत को मूल रूप से पाँच भागों में बांटा गया था। इसमें धार्मिक, सामाजिक और नैतिक विषयों का विस्तृत विवरण था। यहूदी धर्म में इसे तनख या पुराना नियम भी कहा जाता है। तौरेत का मुख्य संदेश एकेश्वरवाद था, यानी केवल एक ईश्वर की पूजा और उसके आदेशों का पालन करना।
इसके साथ ही इसमें नैतिक और सामाजिक कानूनों का उल्लेख था, जैसे चोरी, हत्या और झूठी गवाही पर रोक। उपासना और बलिदान के नियमों के माध्यम से लोगों को पवित्रता और धर्मिक कर्तव्यों का पालन करना सिखाया गया। इसके अलावा, न्यायपालिका और दंड प्रणाली से संबंधित नियम भी तौरेत में शामिल थे।

समय के साथ यहूदियों ने तौरेत में कुछ बदलाव और विकृतियाँ की। कुरान में इसका स्पष्ट जिक्र है। सूरा अल-बक़रा में बताया गया है कि कुछ लोग अपने हाथों से किताब लिखते और कहते थे कि यह अल्लाह की ओर से है, जबकि उसमें परिवर्तन किए गए थे। इस कारण तौरेत का वास्तविक संदेश और उद्देश्य समय के साथ बदल गया। इस्लाम के आगमन के बाद कुरान ने इन विकृतियों को सुधारते हुए अंतिम मार्गदर्शन प्रदान किया।
तौरेत का अवतरण न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था, बल्कि यह सामाजिक और न्यायिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। इस किताब ने यहूदी समाज में न्याय, समानता और व्यवस्था स्थापित करने का काम किया। इसके अवतरण का समय और स्थान भी इस्लामी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। यह रमज़ान के महीने में हुआ, जो खुद ही एक पवित्र और खास महीना है। हज़रत मूसा (अ.स.) ने तौरेत प्राप्त करने के दौरान चालीस दिन तक उपवास रखा। यह उपवास आत्म-शुद्धि और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। इसी परंपरा से रमज़ान में उपवास रखने की प्रथा जुड़ी है।
हज़रत मूसा (अ.स.) और हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के बीच भी गहरा संबंध था। हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) ने अपने समुदाय का जिक्र करते हुए कहा कि उनका स्थान सबसे बड़ा होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि हज़रत मूसा (अ.स.) और हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) का संदेश और मार्गदर्शन आपस में जुड़ा हुआ था। मुसलमान हज़रत मूसा (अ.स.) के जीवन और तौरेत से कई महत्वपूर्ण शिक्षा ले सकते हैं। इसमें न्याय, धैर्य और अल्लाह पर भरोसा जैसी सीख शामिल हैं।

रमज़ान के महीने में तौरेत का अवतरण न केवल धार्मिक घटना थी, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण थी। इस अवतरण ने यहूदी समाज को एक नया कानूनी और नैतिक ढांचा दिया। यहूदी राष्ट्र को अपने जीवन में नियम, न्याय और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने की दिशा मिली। समय के साथ इस पुस्तक में हुई विकृतियों को कुरान ने सुधार दिया। आज हमें तौरेत और हज़रत मूसा (अ.स.) की शिक्षा से यह सीखने की आवश्यकता है कि हम अपने जीवन में न्याय, ईश्वर पर भरोसा और सत्य के मार्ग पर चलें।
हज़रत मूसा (अ.स.) का जीवन और तौरेत का अवतरण हमें यह भी याद दिलाता है कि ईश्वर का संदेश हमेशा सही और मार्गदर्शक होता है। यह संदेश केवल धार्मिक कर्तव्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को न्याय, नैतिकता और सही आचरण की ओर मार्गदर्शन देता है। तौरेत ने यहूदियों को उनकी सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारियों का पालन करना सिखाया।
समाप्त करते हुए कहा जा सकता है कि हज़रत मूसा (अ.स.) का तौरेत प्राप्त करना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं थी। यह एक ऐसा मोड़ था जिसने धार्मिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से यहूदी समाज की दिशा बदल दी। इसके साथ ही यह घटना मुसलमानों के लिए भी सीखने योग्य है।

यह हमें यह याद दिलाती है कि हमें अपने जीवन में न्याय, सत्य और ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। तौरेत और हज़रत मूसा (अ.स.) की शिक्षा आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन का स्रोत है।