Jaiprakash Associates bankruptcy case: NCLAT reserves verdict, clash over bidding process
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
जयप्रकाश एसोसिएट्स के बहुचर्चित दिवालिया मामले में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी National Company Law Appellate Tribunal ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों को दो से तीन दिन के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मंगलवार को हुई सुनवाई में वेदांता समूह की ओर से वरिष्ठ वकील अभिजीत सिन्हा ने पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समाधान प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज किया गया। उनके अनुसार, वेदांता की योजना का सही तरीके से मूल्यांकन ही नहीं किया गया।
सिन्हा ने तर्क दिया कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के तहत प्रक्रिया निष्पक्ष और अधिकतम मूल्य देने वाली होनी चाहिए, लेकिन यहां ऐसा नहीं दिखा। उन्होंने कहा कि लेनदारों की समिति की व्यावसायिक समझ को ढाल बनाकर मनमाने फैसले नहीं लिए जा सकते।
उन्होंने यह भी कहा कि मूल्यांकन के लिए बनाई गई प्रणाली का सही ढंग से पालन नहीं हुआ। बीच में बदलाव किए गए, लेकिन उनकी जानकारी बोली लगाने वालों को नहीं दी गई। इससे पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
वेदांता की ओर से यह भी दावा किया गया कि समिति की बैठकों में उनके प्रस्ताव पर पर्याप्त समय ही नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि केवल अंक देना मूल्यांकन नहीं होता। किसी भी फैसले के पीछे ठोस विश्लेषण होना जरूरी है, जो इस मामले में नजर नहीं आया।
दूसरी तरफ, जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान पेशेवर की ओर से वरिष्ठ वकील अरुण कटपालिया ने इन आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार और पारदर्शी तरीके से चली। सभी बोली लगाने वालों को अपने प्रस्ताव बेहतर करने का मौका दिया गया।
कटपालिया ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर लिया गया और इसमें सबसे बेहतर मूल्य को प्राथमिकता दी गई। उन्होंने कहा कि समिति की आंतरिक चर्चाओं को सार्वजनिक करना जरूरी नहीं होता।
इस मामले में अलग-अलग पक्षों के बीच टकराव साफ दिख रहा है। एक तरफ प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल हैं, तो दूसरी तरफ इसे नियमों के अनुसार सही ठहराया जा रहा है।
अब सबकी नजर ट्रिब्यूनल के फैसले पर टिकी है। यह फैसला न सिर्फ इस मामले के लिए अहम होगा, बल्कि भविष्य में दिवालिया प्रक्रिया के मानकों को भी प्रभावित कर सकता है।