शिशुओं, बुजुर्गों के लू की चपेट में आने के मामले में भारत सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल: रिपोर्ट

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 28-10-2026
India among worst-hit countries for infants, elderly exposed to heatwaves: Report
India among worst-hit countries for infants, elderly exposed to heatwaves: Report

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
भारत उन देशों में शामिल है जहां शिशुओं और बुजुर्गों के लू की चपेट में आने का जोखिम सबसे अधिक है।
 
स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों पर नजर रखने वाली एक अंतरराष्ट्रीय शोध पहल ‘लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की दसवीं संकेतक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई।
 
पत्रिका के अनुसार, भारत उन शीर्ष देशों में शामिल है जहां लू का सबसे अधिक असर कमजोर आयुवर्गों यानी शिशुओं और बुजुर्गों पर पड़ता है। इस सूची में भारत के साथ चीन, अमेरिका और रूस भी शामिल हैं।
 
रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में शिशुओं और बुजुर्गों के लू की चपेट में आने के मामलों में 2024 के रिकॉर्ड स्तर की तुलना में कमी आई है। वर्ष 2024 में बुजुर्गों के लिए यह आंकड़ा 15.3 अरब व्यक्ति-दिन और शिशुओं के लिए 2.3 अरब व्यक्ति-दिन था। वर्ष 2025 में इन दोनों आयु वर्गों के लू की चपेट में आने के मामले अब तक के दूसरे सबसे ऊंचे स्तर पर रहे। इस दौरान बुजुर्गों के लिए यह आंकड़ा 10.8 अरब व्यक्ति-दिन और शिशुओं के लिए 1.1 अरब व्यक्ति-दिन दर्ज किया गया।
 
रिपोर्ट में कहा गया कि जनसंख्या के आकार के हिसाब से देखें तो 2025 में बुजुर्गों को औसतन प्रति व्यक्ति 12.8 दिन और शिशुओं को औसतन 8.7 दिन लू का सामना करना पड़ा।
 
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के विशेषज्ञों के नेतृत्व में तैयार की गई इस रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि दुनिया भर में जलवायु संबंधी कदम तो उठाए जा रहे हैं, लेकिन जिस तेजी से ‘ग्लोबल वार्मिंग’ बढ़ रहा है उतनी तेजी से कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। विशेष रूप से, 2016 के पेरिस समझौते के बाद के दशक में उससे पहले के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान कहीं अधिक तेजी से बढ़े हैं।
 
रिपोर्ट के लेखक पेरिस समझौते के एक दशक बाद जलवायु परिवर्तन को आधिकारिक तौर पर ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित करने और इससे निपटने के लिए दुनियाभर में मिलकर कदम उठाने की व्यवस्था विकसित करने के वास्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तहत एक नया तंत्र बनाने की वकालत कर रहे हैं। इसके अलावा, उनका सुझाव है कि सरकारों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों से लेकर जलवायु संबंधी वित्तीय सहायता तक, हर फैसले में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।