Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 22-05-2026
Haji Ramkadu, the King of Folk Music, Awarded the Padma Shri
आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली
मीर हाजीभाई कासमभाई ‘हाजी रमकडू’ को भारतीय लोक संगीत और ढोलक वादन की दुनिया में एक जीवित किंवदंती माना जाता है। गुजरात के जूनागढ़ से ताल्लुक रखने वाले हाजी रमकडू ने अपने छह दशक लंबे संगीत सफर में न केवल गुजराती लोक संगीत को नई पहचान दी, बल्कि ढोलक जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र को सम्मान और लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके इसी अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री से सम्मानित किया है।
करीब 80 वर्ष की आयु में भी हाजी रमकडू की ऊर्जा, समर्पण और संगीत के प्रति जुनून लोगों को प्रेरित करता है। उन्होंने अपने करियर में 1,000 से अधिक मंचीय कार्यक्रमों में प्रस्तुति दी है और हजारों लोक संगीत आयोजनों तथा भजनों में अपनी ढोलक की थाप से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। लोक संगीत की दुनिया में उनका नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है।
हाजी रमकडू की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि उन्होंने ढोलक को केवल एक सहयोगी वाद्य यंत्र तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक स्वतंत्र और प्रभावशाली प्रस्तुति कला के रूप में स्थापित किया। उनकी ताल, लय और प्रस्तुति शैली ने गुजराती लोक संगीत को नई पहचान दिलाई। वर्षों तक उन्होंने पारंपरिक गुजराती धुनों और लोक लयों को जीवित रखने के लिए लगातार काम किया और नई पीढ़ी के कलाकारों को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी दिया।
पुरस्कार मिलने के बाद हाजी रमकडू ने भावुक होकर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा, “मैं इस सम्मान को पाकर बेहद खुश हूं। मेरे पास अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने मेरे योगदान को पहचाना और मुझे पद्मश्री देने का निर्णय लिया। आज मुझे अपनी लगभग 60 वर्षों की मेहनत का फल मिला है।”
उन्होंने अपने लंबे संगीत सफर को याद करते हुए बताया कि उन्होंने कई प्रसिद्ध कलाकारों के साथ मंच साझा किया है। इनमें दिवालीबेन भील, Osman Mir और Kirtidan Gadhvi जैसे नाम शामिल हैं। हाजी रमकडू ने न केवल लाइव कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति दी, बल्कि गुजराती फिल्मों और निजी संगीत एल्बमों के लिए भी स्टूडियो रिकॉर्डिंग की।
संगीत के अलावा हाजी रमकडू समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी विशेष पहचान रखते हैं। वे गौसंरक्षण और गौसेवा के लिए लंबे समय से काम कर रहे हैं। उन्होंने गायों और गौशालाओं के संरक्षण के उद्देश्य से 35,000 से अधिक चैरिटी कार्यक्रमों का नेतृत्व किया है। यही वजह है कि लोग उन्हें केवल कलाकार नहीं, बल्कि समाज के प्रति समर्पित व्यक्तित्व के रूप में भी देखते हैं।
लोक संगीत के क्षेत्र में उनका योगदान केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने गुजराती संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने में भी अहम भूमिका निभाई। उनकी ढोलक की थाप आज भी गुजरात की लोक संस्कृति की पहचान मानी जाती है।
पद्मश्री सम्मान के जरिए देश ने हाजी रमकडू की कला, समर्पण और समाजसेवा को सम्मानित किया है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची लगन, मेहनत और संस्कृति के प्रति प्रेम किसी भी कलाकार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।