नई दिल्ली
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (MOFSL) ने अपनी 'H1 2026 प्रीशियस मेटल्स आउटलुक' रिपोर्ट में कहा है कि अगले 12-15 महीनों में सोने की कीमत USD 5,500 तक पहुँचने से पहले, निकट भविष्य में इसमें 8 प्रतिशत तक की गिरावट (करेक्शन) आ सकती है। कंपनी ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे धीरे-धीरे सोना खरीदने (स्टैगर्ड एक्युमुलेशन) की रणनीति अपनाएं और धैर्य रखें। MOFSL की रिपोर्ट में सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारकों में आए बदलाव पर ज़ोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि अब भू-राजनीतिक तनाव या संघर्षों का मतलब हमेशा सोने की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं होता है।
रिपोर्ट में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए धीरे-धीरे सोना खरीदने की रणनीति अपनाने की सलाह दी गई है। इसमें कहा गया है कि "सोने की कीमत USD 4,800 (₹4,56,564.24) के स्तर तक पहुँचने से पहले मौजूदा स्तरों से 6-8% तक गिर सकती है, और इसके बाद 12-15 महीनों की अवधि में यह USD 5,500+ (₹5,23,146.53) तक पहुँच सकती है।" घरेलू स्तर पर, USD/INR के 95.5 होने का अनुमान लगाते हुए, ब्रोकरेज हाउस ने ₹1,33,000 से ₹1,30,000 के बीच खरीदारी के लेवल की पहचान की है। इसके लिए मीडियम-टर्म टारगेट ₹1,68,000 और उसके बाद ₹1,93,000 तय किए गए हैं।
टैरिफ को लेकर अनिश्चितता, ETF में ज़बरदस्त निवेश, सेंट्रल बैंक की खरीदारी और US फेड द्वारा ब्याज दरें घटाने की उम्मीदों के कारण सोने ने 2026 की मज़बूत शुरुआत की। हालांकि, दूसरी तिमाही (Q2) में हालात बदल गए। टैरिफ और US-ईरान संघर्ष ने महंगाई की चिंताएं बढ़ा दीं, जिससे बाज़ार ने लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों का अनुमान लगाना शुरू कर दिया। इससे रियल ट्रेजरी यील्ड और US डॉलर में तेज़ी आई और सोने की 'सेफ-हेवन' (सुरक्षित निवेश) के तौर पर अपील कमज़ोर पड़ गई।
ब्रोकरेज हाउस ने कहा, "सोने में लंबे समय के निवेश का आधार अभी भी मज़बूत है, लेकिन आने वाले साल में जल्दबाज़ी के बजाय धैर्य रखने की ज़रूरत है।" उन्होंने दो अहम बातों की ओर इशारा किया -- US में महंगाई की दिशा और नए नेतृत्व के तहत फेड के ब्याज दरों से जुड़े फैसले। जब तक रियल इंटरेस्ट रेट्स में उल्लेखनीय गिरावट नहीं आती, तब तक सोने की कीमत एक दायरे में रह सकती है या निकट भविष्य में इसमें 6-8% की और गिरावट (करेक्शन) आ सकती है। इसलिए, निवेशकों को बाज़ार के निचले स्तर (बॉटम) का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करने के बजाय, धीरे-धीरे खरीदारी (स्टैगर्ड एक्युमुलेशन) करने पर विचार करना चाहिए, यानी कीमत गिरने पर किश्तों में खरीदारी करनी चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया है, "जिन निवेशकों का नज़रिया 12 से 15 महीने का है, उन्हें मौजूदा कमज़ोरी को बाज़ार से बाहर निकलने के कारण के बजाय निवेश के मौके (एंट्री अपॉर्चुनिटी) के तौर पर देखना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि सोने को सेंट्रल बैंक की खरीदारी और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय स्थिति बिगड़ने से संरचनात्मक समर्थन मिल रहा है, साथ ही करेंसी की वैल्यू घटने (करेंसी डिबेसमेंट) के ख़िलाफ़ बचाव के तौर पर इसकी भूमिका भी बनी हुई है।"
साथ ही, ब्रोकरेज हाउस ने चांदी में निवेश करने वालों को इसकी ज़्यादा अस्थिरता (वोलैटिलिटी) का ध्यान रखने की सलाह दी, "क्योंकि यह एक कीमती धातु होने के साथ-साथ औद्योगिक धातु भी है और इसकी मांग इलेक्ट्रिफिकेशन (बिजलीकरण) से जुड़ी है।"