आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
राज्यसभा में बुधवार को विभिन्न दलों के सदस्यों ने न्यायिक सुधारों को समय की मांग बताते हुए जोर दिया कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और न्यायपालिका में वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए।
दो बार के स्थगन के बाद दोपहर दो बजे राज्यसभा की बैठक शुरू होने पर कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को चर्चा एवं लौटाने के लिए पेश किया।
लोकसभा इस विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है।
विधेयक पर चर्चा के बाद कानून मंत्री मेघवाल ने उसका जवाब दिया। मंत्री के जवाब के बाद राज्यसभा ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से लौटा दिया।
चर्चा में हिस्सा ले रहे सदस्यों ने निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या और न्यायपालिका में वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग की।
आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि देश में जिस तरह से अपराध बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए अदालतों की हालत में सुधार किया जाना चाहिए, अवसंरचना को अत्याधुनिक बनाया जाना चाहिए और न्यायाधीशों की संख्या भी बढ़नी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में पांच करोड़, उच्च न्यायालयों में 60 से 65 लाख और उच्चतम न्यायालय में 96 हजार मामले लंबित हैं। ‘‘हमें सोचना होगा कि इन मामलों को देखते हुए क्या देश में अदालतों की संख्या और न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त है ?’’
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने जानना चाहा कि कितने न्यायाधीश दलित या पिछड़े वर्ग के समुदाय के हैं।
राष्ट्रीय जनता दल के संजय यादव ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए अखिल भारतीय न्यायिक प्रणाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी न्यायाधीशों की नियुक्ति किसी परीक्षा के आधार पर नहीं बल्कि कॉलेजियम व्यवस्था से होती है।
यादव ने कहा ‘‘इस व्यवस्था को खत्म किया जाए और एक अखिल भारतीय न्यायिक प्रणाली बनाई जाए ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से की जा सके। न्यायपालिका में आरक्षण व्यवस्था होनी चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज के सबसे पिछड़े और वंचित वर्ग की भागीदारी न्यायपालिका में एक फीसदी भी नहीं है जो बहुत चिंता की बात है।