First joint view by Coronagraphs on India's Aditya-L1 and Europe's Proba-3 decodes Solar Eruptions
बेंगलुरु (कर्नाटक)
पहली बार, भारत के आदित्य-L1 मिशन और यूरोप के प्रोबा-3 मिशन द्वारा सूर्य के एक ही विस्फोट (solar eruptions) के वैज्ञानिक अवलोकनों का संयुक्त रूप से विश्लेषण किया गया है और उन्हें प्रकाशित किया गया है। बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) के वैज्ञानिकों ने 'कोरोनल मास इजेक्शन' (CMEs) का अध्ययन करने के लिए आदित्य-L1 पर लगे VELC पेलोड और प्रोबा-3 पर लगे ASPIICS पेलोड से प्राप्त अवलोकनों को एक साथ मिलाया। उन्होंने सूर्य के बहुत करीब के क्षेत्र में इन CMEs के द्रव्यमान (mass), घनत्व (density) और ऊर्जा (energetics) को मापा। यह अध्ययन 'एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स' (Astronomy & Astrophysics) जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
CMEs सूर्य से होने वाले बड़े विस्फोट होते हैं, जिनमें भारी मात्रा में चुंबकीय प्लाज्मा (magnetized plasma) अंतरिक्ष में बाहर फेंका जाता है। जब ऐसे विस्फोट पृथ्वी की ओर आते हैं, तो वे पृथ्वी के निकट के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। सूर्य के पास CMEs के मापदंडों को मापना उन भौतिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो CMEs के गुणों और उनके आगे के विकास को निर्धारित करती हैं।
हालाँकि, सौर डिस्क (solar disk) के बहुत करीब CMEs का अवलोकन करना चुनौतीपूर्ण होता है। पहले के स्पेस कोरोनोग्राफ (space coronagraphs) इन्हें केवल आंशिक रूप से ही देख पाते थे और कमजोर CMEs के शुरुआती विकास को ट्रैक नहीं कर पाते थे। नतीजतन, यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि आंतरिक कोरोना (inner corona) में CME की ऊर्जा किस तरह गतिज (kinetic), तापीय (thermal) और चुंबकीय (magnetic) ऊर्जा के बीच बंटती है। आदित्य-L1/VELC और प्रोबा-3/ASPIICS के डेटा को मिलाने से इसे बेहतर ढंग से समझने की संभावना पैदा हुई है।
भारत का पहला समर्पित सौर मिशन, आदित्य-L1, 2 सितंबर 2023 को PSLV-C57 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था। 6 जनवरी 2024 को इस अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु के चारों ओर एक 'हेलो ऑर्बिट' (halo orbit) में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया। यह विशेष स्थान सूर्य से जुड़ी विभिन्न घटनाओं का बिना किसी रुकावट के अवलोकन करने में मदद करता है। 'विजिबल एमिशन लाइन कोरोनोग्राफ' (VELC) को बेंगलुरु के IIA ने ISRO के साथ मिलकर विकसित किया है। VELC, 5303 एंगस्ट्रॉम (Angstrom) की 'ग्रीन कोरोनल लाइन' (green coronal line) का उपयोग करके, सूर्य के कोरोना का 1.05 से 1.5 सौर त्रिज्या (solar radii) तक स्पेक्ट्रोस्कोपिक अवलोकन करता है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का मिशन, 'प्रोबा-3' (Proba-3), 5 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से PSLV-XL रॉकेट के ज़रिए लॉन्च किया गया था। यह दुनिया का पहला 'प्रिसिजन फॉर्मेशन-फ्लाइंग' (सटीक संरचना में उड़ान भरने वाला) मिशन है। इसमें दो अंतरिक्ष यान एक-दूसरे से लगभग 150 मीटर की दूरी पर उड़ान भरते हैं, और एक यान दूसरे पर अपनी छाया डालता है। इससे अंतरिक्ष में एक कृत्रिम सूर्य ग्रहण (artificial solar eclipse) बनता है।
इस स्थिति में, प्रोबा-3 पर लगा 'ASPIICS' कोरोनोग्राफ, सूर्य के कोरोना (बाहरी वातावरण) की तस्वीरें ले सकता है। यह तस्वीरें 'व्हाइट लाइट' (सफेद प्रकाश) और 5303 एंग्स्ट्रॉम की 'ग्रीन कोरोनल लाइन' (हरी कोरोनल रेखा) में ली जाती हैं, जो सूर्य की त्रिज्या (solar radii) के लगभग 1.1 से 3 गुना हिस्से को कवर करती हैं।
आदित्य-L1 पर लगे कोरोनोग्राफ (VELC) और प्रोबा-3 पर लगे कोरोनोग्राफ (ASPIICS) ने मिलकर सौर कोरोना के लगभग एक ही हिस्से का अवलोकन किया। इसमें दो अलग-अलग तरह के अवलोकन किए गए: VELC के ज़रिए स्पेक्ट्रोस्कोपिक (स्पेक्ट्रम संबंधी) डेटा लिया गया, जबकि ASPIICS के ज़रिए तस्वीरें (इमेजिंग) ली गईं। इस तरह के संयुक्त अवलोकन से, केवल एक अंतरिक्ष यान के डेटा की तुलना में, CME (कोरोनल मास इजेक्शन) के विकास को कहीं बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है।
ASPIICS द्वारा ली गई व्हाइट-लाइट और ग्रीन कोरोनल लाइन की तस्वीरें बहुत स्पष्ट होती हैं, जिससे CME के आकार, उसकी गतिशीलता और द्रव्यमान (mass) का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। वहीं, VELC के स्पेक्ट्रोस्कोपिक अवलोकन से लगभग 20 लाख डिग्री तापमान वाली CME गैस के बारे में जानकारी मिलती है। इससे CME के घनत्व (density) और तापीय ऊर्जा (thermal energy) का स्वतंत्र अनुमान लगाया जा सकता है। ये दोनों उपकरण 'लो कोरोना' (सूर्य के कोरोना का निचला हिस्सा) में एक ही क्षेत्र (field of view) को देखते हैं।
टीम ने पाया कि जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच, केवल दो CME (14 और 16 सितंबर को) ऐसे थे जिन्हें VELC और ASPIICS दोनों ने एक साथ रिकॉर्ड किया। इन दोनों ही मामलों में, VELC ने विस्फोट (eruptions) को बहुत शुरुआती चरण में ही पकड़ लिया, जो यह दिखाता है कि ये दोनों उपकरण एक-दूसरे के पूरक के रूप में कैसे काम करते हैं।
ISRO के अनुसार, ये परिणाम बताते हैं कि ASPIICS और VELC के संयुक्त अवलोकन से सौर कोरोना के भीतरी हिस्से में CME के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा का सटीक आकलन किया जा सकता है।
इससे CME के शुरुआती विकास को समझने के लिए नए वैज्ञानिक आधार मिलते हैं। यह अध्ययन दिखाता है कि यदि एक ऐसा कोरोनोग्राफ, जो कोरोना की तस्वीरें लेता है, उसे ऐसे कोरोनोग्राफ के साथ जोड़ा जाए जो कोरोना का स्पेक्ट्रम मापता है, तो इससे CME की उत्पत्ति और उसके विकास की एक अधिक पूर्ण और सत्यापित (cross-checked) तस्वीर सामने आती है। यह कार्य आदित्य-L1 के बढ़ते वैज्ञानिक प्रभाव को दर्शाता है, साथ ही सौर खगोल भौतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में समन्वित अवलोकनों तथा इससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ताकत को भी उजागर करता है।