‘पदोन्नति में पक्षपात’: सीआईसी ने जेएनयू प्रोफेसर को रिकार्ड का अवलोकन करने की अनुमति दी

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 23-03-2026
'Favouritism in promotion': CIC allows JNU professor to inspect records
'Favouritism in promotion': CIC allows JNU professor to inspect records

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
केंद्रीय सूचना आयोग ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को विश्वविद्यालय के पदोन्नति रिकॉर्ड का अवलोकन करने की अनुमति दी है। प्रोफेसर ने "पदोन्नति में पक्षपात" का आरोप और यह दावा करते हुए आयोग का रुख किया था कि ‘‘अपात्र उम्मीदवारों को उच्च अधिकारियों से अनुचित पक्षपात के कारण पदोन्नत किया जा रहा है।’’
 
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने साथ ही आरटीआई के जवाब में इस मामले में विश्वविद्यालय के इनकार को भी खारिज कर दिया।
 
यह मामला जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की एक संकाय सदस्य मौसमी बसु द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन से उत्पन्न हुआ है, जिसमें उन्होंने फरवरी 2022 और मार्च 2025 के बीच ‘कैरियर एडवांसमेंट स्कीम’ (सीएएस) के तहत पदोन्नति के मामलों का विवरण मांगा है। इसमें संकाय सदस्यों के नाम, पदोन्नति के चरण और साक्षात्कार और आदेशों की तारीखें, साथ ही लंबित मामले शामिल हैं।
 
विश्वविद्यालय ने अपने जवाब में, केवल संख्यात्मक आंकड़े प्रदान किए - पदोन्नति मामलों के लिए "215 संख्या" और लंबित मामलों के लिए "89 संख्या" - यह कहते हुए कि "अन्य जानकारी को आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(ई) और (जे) के तहत प्रकटीकरण से छूट प्राप्त है।’’
 
सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ई) और 8(1)(जे) सूचना के प्रकटीकरण को रोकने वाले प्रमुख अपवाद हैं। पहली धारा भरोसे के तहत रखी गई जानकारी की रक्षा करती है, धारा 8(जे) ऐसी व्यक्तिगत जानकारी की रक्षा करती है जो निजता का अनुचित उल्लंघन करती है, जब तक कि व्यापक जनहित प्रकटीकरण को उचित न ठहराए।
 
सुनवाई के दौरान, बसु ने कहा कि उन्हें बिना किसी सहायक दस्तावेज के, सीएएस के तहत लंबित मामलों के "केवल अस्पष्ट संख्यात्मक आंकड़े" दिए गए थे।
 
बसु ने कहा कि संकाय सदस्यों की सूची, उनके कार्यभार ग्रहण करने की तिथि, पदोन्नति आदि से संबंधित विशिष्ट जानकारी प्रतिवादी द्वारा देने से इनकार कर दी गयी है, इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए कि अपीलकर्ता भी विश्वविद्यालय के उन कर्मचारियों में से एक थीं जिन्हें संदेह था कि अयोग्य उम्मीदवारों को उच्च अधिकारियों के "अनुचित पक्षपात" के कारण पदोन्नत किया जा रहा है।
 
उन्होंने यह भी दलील दी कि संसद में दिए गए जवाबों में विश्वविद्यालय के इस तरह के आंकड़े साझा किए गए थे और आरटीआई अधिनियम के किसी भी छूट प्रावधान के तहत इन्हें देने से इनकार नहीं जा सकता।
 
हालांकि, विश्वविद्यालय ने यह दलील दी कि "सभी संकाय सदस्यों के संपूर्ण व्यक्तिगत डेटा में तृतीय पक्षों की व्यक्तिगत जानकारी के तत्व शामिल हैं" जो भरोसे के तहत रखे जाते हैं, और इसलिए, इनका खुलासा नहीं किया जा सकता।
 
यह देखते हुए कि मामला सेवा संबंधी शिकायत से उत्पन्न हुआ है, सूचना आयुक्त सुधा रानी रेलंगी ने कहा कि ‘‘इस अपील का मुख्य आधार पदोन्नति में भेदभावपूर्ण व्यवहार की आशंका थी।’’
 
कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए, सूचना आयुक्त ने कहा कि "जानकारी देने से इनकार करना वस्तुतः ऐसे मामलों में न्याय या राहत पाने के अवसर को रोकने जैसा है।’’