नई दिल्ली
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन डीआरडीओ (DRDO) ने वर्ष 2025 में भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति की है। डीआरडीओ के अध्यक्ष समीर वी. कामत ने कहा कि संगठन के प्रयासों से ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को रक्षा क्षेत्र में एक “क्वांटम जंप” मिला है।
डीआरडीओ की 68वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कामत ने बताया कि वर्ष 2025 में सरकार ने डीआरडीओ द्वारा विकसित कई स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के लिए 22 ‘स्वीकृति-ए-आवश्यकता’ (Acceptance of Necessity – AoN) प्रदान की हैं। इन परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत लगभग 1.30 लाख करोड़ रुपये है और इनका निर्माण भारतीय उद्योगों द्वारा किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, यह किसी एक वर्ष में दी गई अब तक की सबसे अधिक AoN है।
जिन प्रमुख प्रणालियों को AoN मिली है, उनमें इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम (IADWS), पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम, क्विक रिएक्शन सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली ‘अनंत शास्त्र’, लंबी दूरी की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अस्त्र Mk-II (बीवीआर एयर-टू-एयर मिसाइल), ड्रोन डिटेक्शन व इंटरडिक्शन सिस्टम Mk-II, नाग एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम Mk-2, एडवांस्ड लाइटवेट टॉरपीडो और AEW&C Mk-1A शामिल हैं।
कामत ने बताया कि रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) और सर्विसेज प्रोक्योरमेंट बोर्ड (SPB) द्वारा दी गई ये मंजूरियां भारतीय रक्षा उद्योग को मजबूत करेंगी और आयात पर निर्भरता घटाएंगी। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि 2025 में 26,000 करोड़ रुपये से अधिक के 11 अनुबंध डीआरडीओ के उत्पादन साझेदारों के साथ किए गए, जिनमें पिनाका रॉकेट सिस्टम, आश्विनी रडार, एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर प्रणालियां शामिल हैं।
डीआरडीओ अध्यक्ष ने कहा कि 2025 में कई स्वदेशी प्रणालियां सेना, अर्धसैनिक बलों, पुलिस और आपदा प्रतिक्रिया बलों में शामिल की गईं। उन्होंने वैज्ञानिकों से साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी अगली पीढ़ी की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।
कामत ने यह भी बताया कि अब तक 2,201 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण लाइसेंस भारतीय उद्योगों को दिए जा चुके हैं, जिनमें से 245 केवल 2025 में हुए। साथ ही, डीआरडीओ ने अपने परीक्षण केंद्र उद्योगों के लिए खोले, जहां वर्ष 2025 में 4,000 से अधिक परीक्षण किए गए।
उनके अनुसार, डीआरडीओ का यह प्रयास न केवल रक्षा तैयारियों को मजबूत कर रहा है, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा निर्माण के एक प्रमुख केंद्र के रूप में भी स्थापित कर रहा है।






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