दिल्ली हाई कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR और CBI जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 21-09-2026
Delhi HC refuses plea seeking FIR, CBI probe against Justice Yashwant Varma; says petitioner has no locus
Delhi HC refuses plea seeking FIR, CBI probe against Justice Yashwant Varma; says petitioner has no locus

 

नई दिल्ली 
 
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने और बाद में उसके हटाए जाने के मामले में FIR दर्ज करने और CBI या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। जस्टिस अमित बंसल ने याचिकाकर्ता, वकील घनश्याम उपाध्याय के अधिकार (locus) पर सवाल उठाया और कहा कि उनके पास दिल्ली पुलिस और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का दूसरा रास्ता मौजूद है।
 
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की: "मैं इस पर सुनवाई नहीं कर रहा हूं। यह बिना किसी ठोस आधार के किसी को फंसाने की कोशिश (witch hunt) जैसा है। क्या आपके पास करने के लिए कुछ बेहतर नहीं है?" इसके बाद कोर्ट ने उपाध्याय को याचिका वापस लेने और कानून के अनुसार उचित उपाय अपनाने की अनुमति दे दी। खुद पेश हुए उपाध्याय ने मार्च 2025 में आग लगने के बाद जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से नकदी मिलने, उसकी कस्टडी और उसके गायब होने के मामले में FIR दर्ज करने और CBI या SIT से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी।
 
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ठोस सबूत होने के बावजूद, जिनसे संज्ञेय अपराध (cognizable offences) का पता चलता है, आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई न करना मनमाना है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि इस मामले में उपलब्ध सामग्री FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने के लिए ज़रूरी "महज शक की सीमा से कहीं अधिक" थी। याचिका में यह भी कहा गया कि इन-हाउस कमेटी और वैधानिक जांच समिति के निष्कर्षों को भले ही अपने आप में आपराधिक अपराध का सबूत नहीं माना जा सकता, लेकिन वे यह तय करने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री हैं कि क्या संज्ञेय अपराध का उचित संदेह था, जिसके लिए आपराधिक जांच मशीनरी को सक्रिय करने की आवश्यकता हो।
 
याचिकाकर्ता ने नकदी के कथित स्रोत, मालिकाना हक, कस्टडी और गायब होने के अलावा, आग लगने के बाद भौतिक सबूतों को ज़ब्त न करने और सुरक्षित न रखने के मामले की भी जांच की मांग की। याचिका के अनुसार, 14-15 मार्च, 2025 की रात को नई दिल्ली में 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम/आउटहाउस में आग लग गई थी। आरोप लगाया गया था कि आग बुझाने और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई के दौरान जली हुई और आंशिक रूप से जली हुई नकदी देखी गई थी और उसकी तस्वीरें व वीडियो भी बनाए गए थे। सुनवाई के दौरान, भारत सरकार और CBI की ओर से पेश हुए स्टैंडिंग काउंसिल प्रेमतोष कुमार मिश्रा ने याचिका का विरोध किया और कहा कि याचिकाकर्ता के पास इस मामले को आगे बढ़ाने का कोई अधिकार (locus) नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि उपाध्याय पहले सुप्रीम कोर्ट जा चुके थे और उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।
 
मिश्रा ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पुलिस और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का दूसरा रास्ता मौजूद था। हालांकि, उपाध्याय ने तर्क दिया कि यह मामला "असाधारण प्रकृति" का है और दावा किया कि मजिस्ट्रेट इस मामले को ठीक से संभालने में सक्षम नहीं होंगे, क्योंकि मजिस्ट्रेट CBI या SIT जांच का आदेश नहीं दे सकते। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, हाई कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को इसे वापस लेने की अनुमति दे दी, साथ ही उन्हें कानून के तहत उचित उपाय अपनाने की छूट भी दी।
 
यह घटनाक्रम जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर जली हुई नकदी मिलने के मामले की कानूनी जांच के बीच सामने आया है। जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने बिना हिसाब-किताब वाली नकदी मिलने, अहम सबूतों को सुरक्षित रखने और जस्टिस वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण से जुड़े आरोपों पर अपनी जांच के नतीजे दर्ज किए हैं।