Delhi HC holds appeal maintainable against UAPA property attachment order, says Section 25(6) order not interlocutory
नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 25(6) के तहत स्पेशल कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) एक्ट की धारा 21 के तहत अपील की जा सकती है, जिसमें आतंकवाद से जुड़ी संपत्ति की ज़ब्ती या अटैचमेंट की पुष्टि की गई हो। जस्टिस नवीन चावला और रविंदर डुडेजा की बेंच ने कहा कि UAPA की धारा 25(6) के तहत आदेश कोई अंतरिम (interlocutory) आदेश नहीं है, बल्कि यह संपत्ति की ज़ब्ती या अटैचमेंट के मामले में संबंधित पक्ष के अधिकारों का अंतिम रूप से फैसला करता है।
कोर्ट ने कहा कि NIA एक्ट की धारा 21 स्पेशल कोर्ट के किसी भी फैसले, सज़ा या आदेश के खिलाफ अपील का कानूनी अधिकार देती है, सिवाय अंतरिम आदेश के। बेंच ने कहा कि चूंकि धारा 25(6) के तहत आदेश ज़ब्ती या अटैचमेंट के मुद्दे पर अंतिम फैसला करता है, इसलिए यह धारा 21 के तहत अपील के दायरे में आता है। ये टिप्पणियां तब की गईं जब कोर्ट अकील अहमद द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहा था। अकील ने पटियाला हाउस कोर्ट्स के स्पेशल जज के सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें UAPA की धारा 25(3) के तहत डेज़िग्नेटेड अथॉरिटी (नामित प्राधिकरण) के आदेश के खिलाफ उनकी अपील खारिज कर दी गई थी। डेज़िग्नेटेड अथॉरिटी ने अशरफ नगर, कोंढवा, पुणे में संपत्ति के अटैचमेंट की पुष्टि की थी।
नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने अपील की स्वीकार्यता पर शुरुआती आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि UAPA का चैप्टर V आतंकवाद से जुड़ी कमाई की ज़ब्ती, अटैचमेंट और ज़ब्त करने (forfeiture) से निपटने के लिए एक पूरा कोड है।
NIA ने तर्क दिया कि धारा 25(6) डेज़िग्नेटेड अथॉरिटी के आदेश के खिलाफ स्पेशल कोर्ट में अपील का प्रावधान करती है और NIA एक्ट की धारा 21 के तहत एक और अपील की अनुमति देने से अटैचमेंट आदेश के खिलाफ असल में दूसरी अपील की स्थिति बन जाएगी।
उसने यह भी तर्क दिया कि धारा 25(6) के तहत आदेश प्रकृति में अंतरिम था और इसलिए, NIA एक्ट की धारा 21 के तहत उसे चुनौती नहीं दी जा सकती थी।
आपत्ति को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि UAPA खुद संपत्ति के अटैचमेंट और ज़ब्ती (forfeiture) के बीच अंतर करता है। बेंच ने कहा, "संपत्ति को अटैच (ज़ब्त) करने का मतलब यह नहीं है कि उसे हमेशा ज़ब्त (फ़ॉरफ़ीचर) ही कर लिया जाएगा।" बेंच ने बताया कि UAPA की धारा 26 के तहत ज़ब्ती का आदेश देने से पहले धारा 27 के तहत अलग से 'कारण बताओ नोटिस' (show-cause notice) देना ज़रूरी है।
कोर्ट ने माना कि धारा 25 के तहत अटैचमेंट और धारा 26 के तहत ज़ब्ती की कार्रवाई के "दो अलग-अलग चरण" हैं, और इन चरणों से जुड़ी अपीलें अलग-अलग अंतिम आदेशों से संबंधित होती हैं। बेंच ने यह भी कहा कि ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि ज़ब्ती से जुड़ी बाद की अपील पर सुनवाई करते समय हाई कोर्ट, अटैचमेंट से जुड़ी अपील में अपने ही पहले दिए गए आदेश को ध्यान में नहीं रखेगा। कोर्ट ने 'नसरीन मोहसिन चौधरी बनाम नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी' मामले में एक समान बेंच (coordinate bench) के पहले के आदेश पर भी विचार किया, जिसमें धारा 25(6) के आदेश के खिलाफ अपील की स्वीकार्यता (maintainability) को प्रथम दृष्टया स्वीकार किया गया था।
कोर्ट ने गौर किया कि एक अन्य मामले, 'आसिया अंद्राबी बनाम नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी' में, कोर्ट ने धारा 25(6) के आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था, लेकिन यह स्पष्ट किया कि वह फैसला उस मामले के खास तथ्यों पर आधारित था और उसमें ऐसी अपील की स्वीकार्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया था।
बेंच ने 'अमित अग्रवाल बनाम भारत संघ' मामले में झारखंड हाई कोर्ट के 2025 के फैसले पर भी ध्यान दिया, जिसमें UAPA की धारा 25(6) के आदेश के खिलाफ NIA एक्ट की धारा 21 के तहत अपील के मुद्दे पर विचार किया गया था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि UAPA की धारा 25 में आतंकवाद से जुड़ी आय (proceeds of terrorism) होने के संदेह वाली संपत्ति को ज़ब्त या अटैच करने की प्रक्रिया दी गई है। इसमें प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका देना और उसके बाद अधिकृत अधिकारी (Designated Authority) और विशेष अदालत द्वारा निर्णय लेना शामिल है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अटैचमेंट का परिणाम ज़ब्ती (फ़ॉरफ़ीचर) से अलग है। ज़ब्ती की कार्रवाई धारा 27 के तहत कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बाद धारा 26 के तहत हो सकती है।
बेंच ने कहा, "UAPA की धारा 25(6) अंतिम है और प्रकृति में 'अंतरिम' (interlocutory) नहीं है।" बेंच ने आगे कहा कि यह प्रावधान संपत्ति को ज़ब्त या अटैच करने के मुद्दे को अंतिम रूप से तय करता है। इसके अनुसार, बेंच ने इस अपील को सुनवाई के योग्य माना और NIA की शुरुआती आपत्ति को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपील को 2 दिसंबर, 2026 को अंतिम सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाए। यह आदेश 15 सितंबर, 2026 को अकील अहमद द्वारा UAPA की धारा 28 और NIA एक्ट की धारा 21 के तहत दायर अपील पर पारित किया गया था।