एल्गोरिदम अब अरबों लोगों के पढ़ने, देखने और विश्वास करने की दिशा प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में प्रभाव और विचारों पर नियंत्रण की क्षमता किसी सैन्य शक्ति से कम महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। लोकतांत्रिक संप्रभुता अब इस बात पर भी निर्भर करती है कि नागरिक व्यक्तिगत रूप से तैयार की गई सूचनाओं और योजनाबद्ध प्रभाव के बीच स्वतंत्र निर्णय ले पाएं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और एल्गोरिदमिक सिस्टम यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं कि नागरिकों को कौन-सी जानकारी मिलेगी, वे उसे किस संदर्भ में देखेंगे और किस तरह उसका मूल्यांकन करेंगे। इन तकनीकों ने संचार को लोकतांत्रिक बनाया और ज्ञान तक पहुंच बढ़ाई है, लेकिन साथ ही लोगों का ध्यान भी लगातार ‘ऑप्टिमाइज’ किए जाने वाली वस्तु बन गया है। चुनौती केवल तकनीक नहीं, बल्कि उन आर्थिक और व्यावसायिक प्रोत्साहनों की है जो यह निर्धारित करते हैं कि लोग क्या देखें, किस पर भरोसा करें और किस तरह प्रतिक्रिया दें।
डिजिटल युग की सबसे बड़ी विशेषता केवल सूचनाओं की अधिकता नहीं, बल्कि सूचनात्मक शक्ति का केंद्रीकरण है। एल्गोरिदम यह तय करने लगे हैं कि कौन-सी घटना लोगों की नजर में आएगी और कौन-सा नैरेटिव सार्वजनिक बहस में हावी होगा। नागरिकों के सामने वास्तविकता अब तेजी से ऐसे डिजिटल सिस्टम के माध्यम से पहुंच रही है, जो सूचनाओं को चुनते और रैंक करते हैं। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या ये प्रक्रियाएं लोकतांत्रिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए पर्याप्त पारदर्शी और जवाबदेह हैं।
मनोविज्ञान और व्यवहार विज्ञान भी यह समझने में मदद करते हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों को किस तरह प्रभावित करते हैं। मनोवैज्ञानिक डेनियल काह्नेमन ने तेज और सहज सोच तथा धीमी और विश्लेषणात्मक सोच के बीच अंतर बताया था। डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर पहली तरह की सोच को बढ़ावा देते हैं। भावनात्मक और उत्तेजक सामग्री तेजी से प्रतिक्रिया पैदा करती है और एल्गोरिदम उसे अधिक ‘एंगेजमेंट’ मानकर आगे बढ़ाते हैं।
सोशल मीडिया के आने से पहले भी मनोवैज्ञानिक प्रयोग यह दिखा चुके थे कि व्यक्ति समूह के दबाव और कथित अधिकार के प्रभाव में अपने निर्णय बदल सकता है। सोलोमन ऐश और स्टेनली मिलग्राम के प्रयोगों ने इस प्रवृत्ति को सामने रखा था। सोशल मीडिया ने इन कमजोरियों को पहचानने और उनका इस्तेमाल करने की क्षमता को औद्योगिक स्तर तक पहुंचा दिया है। ‘इल्यूजरी ट्रुथ इफेक्ट’ और ‘कन्फर्मेशन बायस’ जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभावों के कारण लोग बार-बार सामने आने वाली सूचनाओं को सच मानने लगते हैं, जबकि उनके विपरीत प्रमाण धीरे-धीरे नजरों से ओझल हो सकते हैं।
लोकतंत्र असहमति को स्वीकार करता है, लेकिन साझा वास्तविकता की समझ के कमजोर होने से लोकतांत्रिक व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इसलिए असली बहस केवल सोशल मीडिया या तकनीक की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्म-शासन की बौद्धिक नींव की है।
लोगों की सोच और धारणा को प्रभावित करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है। शीत युद्ध के दौरान भी प्रचार, मनोवैज्ञानिक अभियानों और गुप्त गतिविधियों के जरिए लोगों की धारणाओं को प्रभावित करने तथा सामाजिक विभाजन को बढ़ाने का प्रयास किया जाता था। डिजिटल क्रांति ने इस प्रभाव को तत्काल, व्यक्तिगत और वैश्विक स्तर पर पहुंच योग्य बना दिया है।
अरब स्प्रिंग ने डिजिटल प्लेटफॉर्म की संभावनाओं और जोखिम दोनों को सामने रखा। सोशल मीडिया ने नागरिकों को तेजी से संगठित होने, संवाद करने और आंदोलन खड़ा करने में मदद की। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सूचना नेटवर्क कितनी तेजी से राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके बाद कैंब्रिज एनालिटिका मामले ने दिखाया कि व्यक्तिगत डेटा और व्यवहार संबंधी प्रोफाइलिंग के जरिए लोगों को लक्षित राजनीतिक संदेश दिए जा सकते हैं। इससे साझा सूचना वातावरण और लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया के सामने नई चुनौती पैदा हुई।
अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रभाव को और अधिक व्यक्तिगत, अनुकूलनीय और लगातार बनाए जाने की क्षमता रखता है। एआई लोगों के व्यवहार का विश्लेषण कर सूचना के माहौल को लगातार बदल सकता है। इसका अर्थ है कि मुकाबला केवल इस बात पर नहीं रह गया है कि नागरिक क्या देखते हैं, बल्कि इस पर भी है कि वे उपलब्ध तथ्यों का मूल्यांकन किस तरह करते हैं।
यदि संस्थाओं, प्रमाणों और साझा सूचना स्रोतों पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है तो समाज को ध्रुवीकृत और प्रभावित करना आसान हो जाता है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा नुकसान नागरिकों की स्वतंत्र निर्णय क्षमता और अंततः उनकी कॉग्निटिव सॉवरेनिटी को होता है।
उदार लोकतंत्रों के सामने यहां एक कठिन संतुलन की स्थिति है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है, लेकिन दूसरी ओर अपारदर्शी एल्गोरिदम अरबों लोगों द्वारा देखी और साझा की जाने वाली सामग्री को प्रभावित कर रहे हैं।
इसका समाधान सरकार द्वारा हर सूचना पर नियंत्रण नहीं हो सकता। गलत सूचना से निपटने के नाम पर बनाई गई शक्तियां वैध आलोचना और असहमति को दबाने का माध्यम भी बन सकती हैं। इसलिए लोकतंत्रों को यह सुनिश्चित करना होगा कि एल्गोरिदमिक शक्ति जवाबदेह हो, लेकिन निजी कंपनियों के प्रभाव की जगह सरकारी सेंसरशिप भी स्थापित न हो।
इसी कारण कई लोकतांत्रिक देश अब केवल कंटेंट को नियंत्रित करने के बजाय डिजिटल सिस्टम की जवाबदेही पर ध्यान दे रहे हैं। यूरोपीय संघ का डिजिटल सर्विसेज एक्ट एल्गोरिदमिक पारदर्शिता, प्रणालीगत जोखिम के आकलन और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर जोर देता है। ऑस्ट्रेलिया ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कदम मजबूत किए हैं। वहीं चीन ने व्यापक सरकारी निगरानी और हस्तक्षेप वाला अलग मॉडल अपनाया है।
इससे स्पष्ट है कि बड़ी शक्तियां डिजिटल सूचना तंत्र को अब रणनीतिक राष्ट्रीय महत्व का विषय मान रही हैं। चुनौती यह है कि लोकतांत्रिक देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उन स्वतंत्रताओं से समझौता न करें, जिनकी रक्षा के लिए यह व्यवस्था अस्तित्व में आई है।
भारत के सामने भी यही चुनौती है कि डिजिटल व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जाए, लेकिन संवैधानिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से समझौता न हो। सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021, प्रस्तावित डिजिटल इंडिया एक्ट पर चर्चाएं और एआई गवर्नेंस को लेकर जारी प्रयास यह दर्शाते हैं कि प्लेटफॉर्म की सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर विचार हो रहा है।
प्रस्तावित फैक्ट चेक यूनिट पर न्यायिक समीक्षा ने भी गलत सूचना से मुकाबले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन की चुनौती को सामने रखा है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, आनुपातिकता और स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण हैं।
भारत को प्रतिक्रियात्मक नियमन से आगे बढ़कर ‘कॉग्निटिव सॉवरेनिटी’ की रक्षा के लिए एक स्पष्ट सिद्धांत आधारित ढांचा तैयार करना चाहिए। इसका उद्देश्य यह तय करना नहीं होना चाहिए कि नागरिकों को क्या सोचना है, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि वे स्वतंत्र रूप से सोच, विचार और निर्णय कर सकें।
इसके लिए चार प्रमुख सिद्धांत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पहला, एल्गोरिदमिक जवाबदेही पर जोर। नियमन का लक्ष्य भाषण या विचारों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उन एल्गोरिदम को जवाबदेह बनाना होना चाहिए जो करोड़ों लोगों के सूचना वातावरण को प्रभावित करते हैं। स्वतंत्र ऑडिट, सिफारिशी प्रणालियों में पारदर्शिता और शोधकर्ताओं के लिए नियंत्रित डेटा एक्सेस जैसे उपाय इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।
दूसरा, डिजिटल साक्षरता को नागरिक क्षमता बनाना। लोगों को यह समझना जरूरी है कि एल्गोरिदम उनके ध्यान को किस तरह प्रभावित करते हैं, गलत सूचना कैसे फैलती है और मनोवैज्ञानिक पूर्वाग्रह निर्णयों को कैसे प्रभावित करते हैं। लोकतंत्र में संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा के साथ नागरिकों में प्रमाणों का मूल्यांकन करने और हेरफेर को पहचानने की क्षमता विकसित करना भी आवश्यक है।
तीसरा, गुप्त प्रभाव अभियानों की पहचान के लिए स्वतंत्र संस्थागत क्षमता। विदेशी हस्तक्षेप, बॉट नेटवर्क, एआई से तैयार दुष्प्रचार और अन्य छिपे हुए हेरफेर की पहचान करने के लिए स्वतंत्र संस्थागत व्यवस्था जरूरी है। हालांकि इसका उद्देश्य राजनीतिक असहमति को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विकल्पों को सुरक्षित रखना होना चाहिए।
चौथा, सरकारी हस्तक्षेप पर संवैधानिक निगरानी। ऑनलाइन भाषण को प्रभावित करने वाली हर सरकारी कार्रवाई स्पष्ट कानूनी अधिकार, संसदीय निगरानी और स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा के अधीन होनी चाहिए। न सरकार और न ही तकनीकी कंपनियां ‘सत्य’ की अंतिम निर्णायक बन सकती हैं। संवैधानिक लोकतंत्र में राज्य की भूमिका स्वतंत्र और सूचित सार्वजनिक बहस के लिए परिस्थितियां तैयार करना है, न कि उस बहस पर एकाधिकार स्थापित करना।
आखिरकार यह बहस केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। यह उन बौद्धिक परिस्थितियों को बचाने की लड़ाई है, जिनके आधार पर लोकतंत्र कायम रह सकता है। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है जब नागरिक persuasion और coercion, प्रमाण और प्रचार तथा असहमति और छल के बीच अंतर कर सकें।
20वीं सदी ने दुनिया को सिखाया कि संप्रभुता के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा, सैन्य शक्ति और आर्थिक मजबूती जरूरी है। 21वीं सदी यह मांग कर रही है कि इसके साथ कॉग्निटिव सॉवरेनिटी यानी स्वतंत्र रूप से सोचने और निर्णय लेने की क्षमता की भी रक्षा की जाए।
कोई देश अपनी सीमाओं को सुरक्षित कर सकता है, अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है और सेना को आधुनिक बना सकता है। लेकिन यदि उसके नागरिक अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता खो दें तो उसकी संप्रभुता भीतर से कमजोर हो सकती है। इसलिए एआई के दौर में कॉग्निटिव सॉवरेनिटी की रक्षा केवल तकनीकी या नीतिगत चुनौती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की संवैधानिक आवश्यकता बन चुकी है।
डिस्क्लेमर: कुणाल कश्यप दिल्ली में सीजीएसटी (अपील्स) के आयुक्त हैं। वह भारतीय राजस्व सेवा (IRS-C&IT) के अधिकारी हैं और मनोविज्ञान में मास्टर डिग्री रखते हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।