समीर गायकवाड़
दिल्ली की सड़कों पर वह मराठी मानुस का अब तक का सबसे बड़ा मोर्चा था। उस मोर्चे में सबसे आगे चल रहे एक ट्रक पर खड़ा होकर एक शाहीर (लोक गायक) डफली बजा रहा था। बिना किसी माइक के, अपने गले की नसें तानकर वह सुबह दस बजे से दोपहर चार बजे तक लगातार छह घंटे गाता रहा। एक हाथ से डफली बजाते हुए, वह अपनी बुलंद और पहाड़ी आवाज़ में पोवाड़े गा रहा था। यह हैरान कर देने वाला नज़ारा देखकर दिल्ली वाले दंग रह गए। वे दांतों तले उंगली दबाकर उस शाहीर को हैरत भरी नज़रों से देख रहे थे।
शाम चार बजे एक बड़ी जनसभा के साथ मोर्चे का समापन हुआ। यह सभा संयुक्त महाराष्ट्र के लिए थी। इस सभा में बोलते हुए आचार्य अत्रे उस शाहीर की तारीफ करते हुए भावुक हो गए। उन्होंने कहा, "शाहीर, अगर आज छत्रपति शिवाजी महाराज ज़िंदा होते, तो उन्होंने तुम्हारी पीठ थपथपाकर 'शाबाश शाहीर' कहा होता और अपने हाथ का सोने का कड़ा तुम्हें इनाम में दे दिया होता।" 'दो कौड़ी के मोल बिकने को मराठा तैयार नहीं है', यह डंके की चोट पर कहने वाले वह अज़ीम शाहीर थे 'शाहीर अमर शेख'। यह लेख अमर शेख की कामयाबियों और उनकी ज़िंदगी का एक अक्स है।

गरीबी से उठकर संयुक्त महाराष्ट्र की आवाज़ बनने का सफर
अमर शेख मज़हब से मुस्लिम थे, लेकिन उन्होंने कभी जात या मज़हब नहीं देखा। उनकी ज़िंदगी की शुरुआत एक पानी भरने वाले के तौर पर हुई। उसके बाद उन्होंने गाड़ी के क्लीनर और फिर मिल मज़दूर के तौर पर काम किया। आगे चलकर वह मिल मज़दूरों के नेता बन गए। अपनी कुदरती पहाड़ी आवाज़ की देन की वजह से वह पूरे महाराष्ट्र में मशहूर और हरदिलअज़ीज़ हो गए। शेख सरनेम वाले इस शाहीर की यह कहानी बेहद ज़िंदादिल है।
'महाराष्ट्र शाहीर' के तौर पर अमर शेख को भूलना एक बड़ी नाशुक्री होगी। संयुक्त महाराष्ट्र के बनने में मराठी अवाम की कुर्बानी सबसे बड़ी है। आचार्य अत्रे, डांगे, एस. एम. जोशी, उद्धवराव पाटिल, सेनापति बापट और क्रांतिसिंह नाना पाटिल जैसे महान नेताओं के जोशीले भाषणों से यह आंदोलन गांवों तक पहुँचा। इस माहौल को बनाने में शाहीर अमर शेख का बहुत बड़ा योगदान है। उनके साथ-साथ उनके साथी आत्माराम पाटिल और बाकी सभी शाहिरों का योगदान भी बहुत कीमती है।

बिना माइक और बिजली के लाखों की भीड़ को बांधना
आज शायद किसी को यकीन न हो, लेकिन उस दौर में गांवों में बिजली नहीं थी। माइक नहीं होते थे। तख्ती पर चॉक से लिखकर हज़ारों-लाखों की भीड़ जुटाई जाती थी। ऐसी विशाल जनसभाओं की शुरुआत शाहीर अमर शेख की शाहिरी से ही होती थी। बड़े-बड़े नेता अक्सर रात में देर से पहुँचते थे। उस दौर में ऐसा कोई नियम नहीं था कि सभा दस बजे तक खत्म हो जानी चाहिए।
एक-एक रात में चार-चार सभाएं होती थीं और सभी एक के बाद एक चलती थीं। अमर शेख अपनी पहाड़ी आवाज़ से सभा शुरू करते थे। जब अत्रे, डांगे, एस. एम., उद्धवराव और क्रांतिसिंह जैसे 'पांडव' सभा में पहुँचते, तब अमर शेख अगली सभा के लिए निकल जाते। इतना ज़्यादा गाने से कोई भी आम शाहीर खून की उल्टियां कर देता।
मंच पर सिर्फ तीन-चार लालटेन होते थे। अगर गांव में पेट्रोमैक्स होता भी था, तो वह कांग्रेस वालों के पास होता था, जो उन्हें नहीं मिलता था। इसलिए सभा लालटेन की रोशनी में ही होती थी। आखिरी कतार में बैठे इंसान को मंच पर बैठे लोग दिखाई तक नहीं देते थे। लेकिन अमर शेख की पहाड़ी आवाज़ बिल्कुल आखिर तक पहुँचती थी। हर तरफ खामोशी छा जाती थी। जब डफली पर थाप पड़ती, तो अमर शेख के मुंह से दहकते हुए शोले जैसे लफ्ज़ निकलते:
‘जनतेच्या सत्तेची ज्योत जागती
गर्जा संयुक्त महाराष्ट्र भारती
गोव्याच्या फिरंग्याला चारूनी खडे
माय मराठी बोली चालली पुढे
एक भाषकांची होय संगती
गर्जा संयुक्त महाराष्ट्र भारती..’
(जनता की सत्ता की लौ जाग उठी है, संयुक्त महाराष्ट्र की जयकार करो। गोवा के विदेशियों को धूल चटाकर, हमारी मातृभाषा मराठी आगे बढ़ रही है। एक भाषा बोलने वाले सब एक साथ आ रहे हैं, संयुक्त महाराष्ट्र की जयकार करो...)
अमर शेख के बाद आत्माराम पाटिल हाथ में डफली लेते। उनकी शाहिरी से एक अलग ही जोश पैदा हो जाता:
‘संयुक्त महाराष्ट्र उगवतोय सरकारा
खुशाल कोंबडं झाकून धरा..’
(हे सरकार, संयुक्त महाराष्ट्र का सूरज उग रहा है, तुम मुर्गे को छुपाकर चाहे जितनी कोशिश कर लो, इस सवेरे को रोक नहीं सकते...)
महाराष्ट्र सचमुच सुलग उठा था। मराठी मानुस ने संयुक्त महाराष्ट्र के लिए अपना सब कुछ कुर्बान करने की तैयारी दिखा दी थी। लोग इन शाहिरों के मुंह से निकलने वाले एक-एक लफ्ज़ को कैच कर रहे थे।
(बेल्लारी बेळगांव। पंढरी पारगाव। बोरी उंबरगाव। राहुरी जळगाव। सिन्नरी ठाणगांव। परभणी नांदगाव। व-हाडी वडगांव। शिरीचा बस्तार। भंडारा चांदा। सातारा सांगली। कारवार डांग। अन् मुंबई माऊली। जागृत झालाय दख्खनपुरा.. खुशाल कोंबडं झाकून धरा..)
(बेल्लारी, बेलगाम... से लेकर हमारी मां मुंबई तक। पूरा दक्कन अब जाग चुका है, सरकार तुम मुर्गे को छुपाकर चाहे जितनी कोशिश कर लो, इस सवेरे को रोक नहीं सकते...)
पूरी सभा इन शाहिरों की मुट्ठी में आ जाती थी। मुख्य वक्ताओं को आने में दो-तीन घंटे की देरी हो जाती थी। इतने लंबे वक्त तक सभा को बांध कर रखना कोई आसान काम नहीं था। यह मर्दों का काम था। ये मर्द शाहीर दो-तीन घंटे तक सभा को अपने काबू में रखते थे। उनका डफ, तुनतुने और ढोलक सुनकर पूरी सभा झूम उठती थी।

अण्णाभाऊ साठे और नारायण सुर्वे के गीतों को किया अमर
दिल्ली के मोर्चे में अमर शेख के साथ लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे भी थे। वह गीत लिखते थे और अमर शेख उन्हें गाते थे।
'माझी मैना गावाकडे राहिली
माझ्या जिवाची होतिया काहिली...'
(मेरी मैना (पत्नी) गांव में ही रह गई है, और यहां उसके बिना मेरी जान तड़प रही है... - यह गीत मुंबई आए एक मज़दूर के दर्द और गांव की याद को बयां करता है)
अण्णाभाऊ के इस गीत को अमर शेख ने गांव-गांव तक पहुँचाया। उसी वक्त वामपंथी (लेफ्टिस्ट) ख्यालात के मशहूर कवि नारायण सुर्वे की कविता को भी उन्होंने ही अमर किया:
'डोंगरी शेत माझं ग, मी बेनू किती?
आलं वरीस राबून, मी मरू किती?...'
(पहाड़ पर मेरा खेत है, मैं कितनी निराई (खरपतवार निकालना) करूं? पूरा साल मेहनत करके मैं कितना मरूं?... - यह कविता एक गरीब किसान औरत के दर्द और न खत्म होने वाले संघर्ष को दिखाती है)
कवि, अभिनेता और एक अज़ीम इंसान
अमर शेख सिर्फ एक शाहीर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन गीतकार भी थे। 'अमर गीत', 'धरती माता' और 'कलश' उनके मशहूर कविता संग्रह हैं। 'कलश' के लिए आचार्य अत्रे ने 60 पन्नों की भूमिका लिखी थी, जिससे इस किताब की अहमियत मराठी दिलों और घर-घर तक पहुँच गई।
इस मशहूर मराठी लोकशाहीर का असली नाम मेहबूब हुसैन पटेल था। उनकी पैदाइश 20 अक्टूबर 1916 को बार्शी के एक गरीब परिवार में हुई थी। उनकी वालिदा का नाम मुनेरबी था। मिल की हड़ताल में आगे रहने की वजह से उन्हें विसापुर जेल भी जाना पड़ा। वहां उनकी मुलाकात कॉमरेड रघुनाथ करहाडकर से हुई और उनके असर से वह कम्युनिस्ट बन गए।
उन्होंने 'प्रपंच' और 'महात्मा ज्योतिबा फुले' जैसी मशहूर फिल्मों में काम भी किया। 'महात्मा फुले' खुद आचार्य अत्रे की बनाई हुई फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपति का सिल्वर मेडल मिला था। इसी फिल्म के लिए अमर शेख की एक्टिंग की खूब तारीफ हुई थी।
समाज के दबे-कुचले लोगों की तरक्की के लिए उन्होंने अपनी आवाज़ और कलम को वक्फ कर दिया। 29 अगस्त 1969 को 63 साल की उम्र में इंदापुर के पास एक हादसे में उनका इंतकाल हो गया। उनकी याद में मुंबई यूनिवर्सिटी में 'शाहीर अमर शेख' चेयर शुरू की गई है।
महाराष्ट्र दिवस के मौके पर नई पीढ़ी को इस अमर शाहीर के महान काम से रूबरू कराने के लिए यह एक छोटी सी कोशिश है। इस अनोखे योद्धा को तीन बार सलाम।
(लेखक मराठी के मशहूर साहित्यकार और विचारक हैं।)