बंगाल में वंदे मातरम् पर विवाद

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-05-2026
Controversy over 'Vande Mataram' in Bengal
Controversy over 'Vande Mataram' in Bengal

 

कोलकाता।

Communist Party of India (Marxist) के सांसद Bikash Ranjan Bhattacharyya ने पश्चिम बंगाल सरकार के उस फैसले की आलोचना की है, जिसमें राज्य के सभी स्कूलों और मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य कर दिया गया है। उन्होंने इस आदेश को “अनियमित” और “असंवैधानिक” बताते हुए कहा कि उचित समय पर इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।

समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में भट्टाचार्य ने कहा कि किसी विशेष गीत को सभी शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य बनाना संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मदरसों और अन्य स्कूलों में वंदे मातरम् को अनिवार्य करना अत्यंत अनियमित और असंवैधानिक कदम है। इसे उचित समय पर हाई कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।”

दूसरी ओर, Vishwa Hindu Parishad के नेता Vinod Bansal ने राज्य सरकार के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि यह कदम छात्रों में देशभक्ति और भारतीय संस्कृति की भावना को मजबूत करेगा। विनोद बंसल ने कहा, “वंदे मातरम् को लंबे समय तक इस्लामी कट्टरपंथियों और उनकी सोच ने दबाने की कोशिश की। पहले कांग्रेस, फिर कम्युनिस्ट और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने इसे महत्व नहीं दिया। हम बंगाल की मुख्यमंत्री की सराहना करते हैं कि उन्होंने सरकारी स्कूलों के साथ-साथ मदरसों में भी इसे अनिवार्य किया, ताकि हर छात्र अपने दिन की शुरुआत देशभक्ति के संदेश के साथ करे।”

दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में राज्य के सभी स्कूलों में कक्षाएं शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य कर दिया है। यह आदेश राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि राज्य के सभी स्कूलों में तत्काल प्रभाव से इस व्यवस्था को लागू किया जाएगा।

कोलकाता स्थित स्कूल शिक्षा विभाग के प्रशासनिक शाखा द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया, “पूर्व के सभी आदेशों और प्रथाओं को निरस्त करते हुए यह निर्देश दिया जाता है कि कक्षाओं के प्रारंभ से पहले प्रार्थना सभा में ‘वंदे मातरम्’ का गायन राज्य के सभी स्कूलों में अनिवार्य होगा।”

14 मई को जारी इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह फैसला सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद लिया गया है। साथ ही यह निर्देश राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले सभी शिक्षण संस्थानों पर लागू होगा, जिनमें सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूल शामिल हैं।

हालांकि, इस फैसले ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर इसे राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है, तो दूसरी ओर कुछ विपक्षी दल और सामाजिक समूह इसे धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों के नजरिए से देख रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक और कानूनी बहस का बड़ा विषय बन सकता है, खासकर तब जब इसे अदालत में चुनौती दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।