CIC appointments: Court refuses to direct disclosure of dissent by Leader of Opposition
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष के असहमति नोट का खुलासा करने का निर्देश नहीं देगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ को केंद्र सरकार ने बताया कि सीआईसी में खाली पद भर दिए गए हैं। इसके बाद, पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि वह शीर्ष अदालत के 2019 के फैसले के अनुसार विवरण देते हुए एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करे।
वर्ष 2019 के फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने सीआईसी और राज्य सूचना आयोगों (एसआईसी) में पदों को भरने के लिए निर्देश जारी किए थे।
सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 12(3) के तहत, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नामों का चयन कर उनकी सिफारिश करती है। इस समिति में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री भी शामिल होते हैं।
शीर्ष अदालत सीआईसी और एसआईसी के रिक्त पदों को भरने के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने एसआईसी में रिक्त पदों को भरने के मुद्दे पर भी विचार किया और राज्यों को जल्द ही चयन प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
पीठ ने राज्यों से वहां लंबित मामलों को ध्यान में रखते हुए एसआईसी में स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने की वांछनीयता पर विचार करने को भी कहा।
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने कहा कि सीआईसी में रिक्त पदों पर नियुक्तियां कर दी गई हैं और सभी पद भर दिए गए हैं।
अंजलि भारद्वाज और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि केंद्र ने इस बारे में ब्योरा नहीं दिया है कि किसने आवेदन किया था और नियुक्तियों के लिए किसे ‘शॉर्टलिस्ट’ किया गया। उन्होंने कहा, '‘‘उन्हें खुलासा करना होगा कि आवेदन करने वाले कौन लोग हैं।’’
पीठ ने कहा कि जिन लोगों को नियुक्त किया गया उनके नाम सार्वजनिक हैं। भूषण ने कहा, "नाम सार्वजनिक हैं लेकिन उनकी योग्यता नहीं। विपक्ष के नेता का एक असहमति नोट है। वह प्रकाशित नहीं है।"
इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम उस पर गौर नहीं करेंगे। यहां सुनवाई करने का कोई सवाल ही नहीं है।"
भूषण ने दलील दी कि लोगों को यह जानने का अधिकार है कि विपक्ष के नेता की असहमति का कारण क्या था। पीठ ने कहा कि वह यह उम्मीद नहीं कर सकती कि केंद्र सरकार और समिति किसी अयोग्य व्यक्ति को इन पदों पर नियुक्त करेगी।
भूषण ने तर्क दिया कि अतीत में, एक ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया गया था जिसके पास आरटीआई अधिनियम के बारे में कोई अनुभव नहीं था।