मुंबई,
हिन्दी सिनेमा के मशहूर निर्देशक शक्ति सामंता की 100वीं जयंती पर उनके पुत्र अशिम सामंता ने पिता के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके पिता को पद्मश्री या पद्म विभूषण जैसी राष्ट्रीय सम्मान की उपयुक्तता थी। अशिम ने कहा कि पिता ने कई सफल और यादगार फिल्में बनाई, जैसे “अराधना”, “अमर प्रेम” और “कश्मीर की कली”, लेकिन फिर भी उन्हें उस समय राष्ट्रीय स्तर की मान्यता नहीं मिली।
अशिम ने बताया कि उनके पिता एक बहुमुखी फिल्म निर्माता थे, जिन्होंने अलग-अलग शैलियों में काम किया। उनकी पहली हिंदी फिल्म “बहू”, क्राइम थ्रिलर “हावड़ा ब्रिज”, रोमांटिक थ्रिलर “चाइना टाउन” और “एन इवनिंग इन पेरिस”, और रोमांटिक फिल्मों “अराधना” और “अमर प्रेम” ने दर्शकों का दिल जीता।
अशिम ने कहा कि उनके पिता पुरस्कारों और राष्ट्रीय सम्मान के लिए कभी आग्रह नहीं करते थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “अमर प्रेम” की संगीत उपलब्धियों को उचित पुरस्कार नहीं मिले, और वह खुद भी मानते थे कि उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलना चाहिए था।
सामंता का फिल्मी करियर लगभग पांच दशकों तक रहा। उन्होंने 1955 में “बहू” से निर्देशन की शुरुआत की और 2002 में “देवदास” तक फिल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने फिल्म निर्माता संघ (IMPPA) के अध्यक्ष और सीबीएफसी के चेयरमैन के रूप में भी कार्य किया। उनके निर्देशन में बनी फिल्मों में अशोक कुमार, माधुबाला, शम्मी कपूर, शर्मीला टैगोर और राजेश खन्ना जैसे सितारे थे, जिनकी वजह से फिल्में और भी लोकप्रिय हुईं।
अशिम ने बताया कि पिता का संगीत का गहरा ज्ञान था और वह एक कुशल बांसुरी वादक भी थे। उन्होंने कई फिल्मों में शर्मीला टैगोर के साथ काम किया, जिनके साथ उनका संबंध परिवार जैसा था। 1967 में बनी फिल्म “एन इवनिंग इन पेरिस” में शर्मीला टैगोर ने पहली बार स्क्रीन पर बिकिनी पहनी।
अशिम ने पिता को घर पर भी प्यार करने वाला, सतर्क और सहायक बताया। वह केवल पिता ही नहीं, बल्कि दोस्त, मार्गदर्शक और सहयोगी भी थे। अशिम ने कहा कि पिता की फिल्मों को रीमेक करने का विचार उन्होंने हमेशा टाला, क्योंकि वह मानते थे कि कुछ क्लासिक्स को छेड़ना सही नहीं।
शक्ति सामंता की याद में हिंदी ओटीटी प्लेटफॉर्म Ultra Play ने ‘Shakti Samanta@100: A Celebration of Timeless Cinema’ के नाम से उनकी 32 फिल्मों का महोत्सव आयोजित किया। अशिम ने यह भी बताया कि उनके पिता की पसंदीदा तीन फिल्में थीं: “अमनुष”, “अमर प्रेम” और “अराधना”।
शक्ति सामंता की विरासत आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर है, और उनके योगदान को याद करना सिनेमा प्रेमियों के लिए गर्व की बात है।






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