दानिश अली /श्रीनगर/ नई दिल्ली
कश्मीर के बांदीपुरा ज़िले से लगभग दस किलोमीटर दूर बसे एक बुनियादी सुविधाओं से वंचित गांव से निकलकर इमरान लोन आज उन हज़ारों कश्मीरी युवाओं के लिए उम्मीद की किरण बन चुके हैं, जो सेना या पुलिस में शामिल होकर देश और जम्मू-कश्मीर की सेवा करना चाहते हैं। उनका अपना सपना सेना की वर्दी पहनने का था, लेकिन समय पर सही मार्गदर्शन और जानकारी न मिलने के कारण वह सपना अधूरा रह गया। फिर भी इमरान ने अपने अधूरे सपने को दूसरों के सपनों में ढाल दिया और आज वे वही कर रहे हैं, जो कभी उनके लिए किसी ने नहीं किया था,युवाओं को रास्ता दिखाना।

इमरान लोन कहते हैं, “मैं आर्मी में जाना चाहता था। लेकिन न तो किसी ने सही समय पर गाइड किया और न ही प्रोसीजर की जानकारी मिली। जब सब समझ में आया, तब तक उम्र निकल चुकी थी। सेना में जाकर देश की सेवा करना मेरा सपना था।” उनका यह सपना भले ही पूरा न हो सका, लेकिन आज उसी सपने की प्रेरणा से वे कश्मीर के युवाओं को सेना और पुलिस की तैयारी करा रहे हैं।
‘आवाज़ द वॉयस’ से बातचीत में इमरान बताते हैं कि कश्मीर का माहौल अब बदल रहा है। लंबे समय तक बेरोज़गारी और अवसरों की कमी के चलते कश्मीरी युवा हताशा और नशे की गिरफ्त में फंसते जा रहे थे। “करीब अस्सी प्रतिशत युवा डिप्रेशन में हैं, क्योंकि यहां नौकरियां नहीं हैं।
परेशान होकर कई युवा ड्रग्स की ओर चले जाते हैं,” वे कहते हैं। लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। सेना और पुलिस की भर्तियों में कश्मीरी युवाओं की दिलचस्पी बढ़ी है। आज भर्ती रैलियों में हज़ारों की संख्या में युवा हिस्सा ले रहे हैं और ट्रेनिंग कैंपों में जमकर मेहनत कर रहे हैं।
इमरान लोन इसी बदलाव का हिस्सा हैं। उन्होंने सेना और पुलिस में भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए एक फ्री फिटनेस एकेडमी शुरू की है। यहां सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद और शाम चार बजे ट्रेनिंग होती है।
उनकी एकेडमी में न सिर्फ लड़के, बल्कि बड़ी संख्या में लड़कियां भी ट्रेनिंग ले रही हैं। हाल ही में कांसटेबल भर्ती में उनकी एकेडमी की सात लड़कियां और तीस लड़के सफल हुए। फिलहाल वे अग्निवीर योजना के तहत भर्ती की तैयारी करा रहे हैं।
इमरान खुद कैलिस्थेनिक्स के खिलाड़ी हैं। यह एक ऐसा मार्शल आर्ट और फिटनेस सिस्टम है, जो शरीर के अपने वजन से ताकत, संतुलन और नियंत्रण विकसित करता है। पुश-अप्स, पुल-अप्स, स्क्वैट्स और प्लैंक्स जैसी एक्सरसाइज़ के ज़रिये यह न केवल ताकत और सहनशक्ति बढ़ाता है, बल्कि चोट से बचाव और संपूर्ण फंक्शनल फिटनेस भी देता है।
स्ट्राइक, ग्रैपलिंग और स्टेबिलिटी जैसी क्षमताओं को बेहतर बनाने में कैलिस्थेनिक्स बेहद कारगर माना जाता है। कश्मीर में इस कला की यह पहली और फिलहाल इकलौती एकेडमी है, जिसे इमरान लोन चला रहे हैं।

इमरान की अपनी कहानी भी किसी संघर्ष से कम नहीं रही। उनका गांव ऐसा है जहां सड़क, बिजली और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं। स्कूल जाने के लिए उन्हें रोज़ मौसम की मार झेलते हुए सात-आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। परिस्थितियों के चलते उन्हें बीच में ही स्कूली पढ़ाई छोड़नी पड़ी। आगे की पढ़ाई और जीवन की तलाश उन्हें श्रीनगर ले आई।
श्रीनगर में शुरुआती दिन बेहद कठिन थे। जीवनयापन के लिए उन्होंने होटलों में बर्तन धोने से लेकर वेटर और सेल्समैन तक का काम किया। लेकिन उनके भीतर कुछ अलग करने की आग जल रही थी। बचपन से ही वे ब्रूस ली और जैकी चैन की फिल्मों से प्रेरित थे।
उन्हीं फिल्मों ने उन्हें मार्शल आर्ट्स की ओर खींचा। इमरान बताते हैं कि उस दौर में श्रीनगर की लगभग हर गली में मार्शल आर्ट्स के कोचिंग क्लब हुआ करते थे। ऐसे में उन्होंने सोचा कि अगर कुछ करना है, तो अलग करना होगा।
यहीं से उनकी ज़िंदगी ने नया मोड़ लिया। उन्होंने बेहद कठिन और अनुशासन-प्रधान खेल कैलिस्थेनिक्स को अपनाया। वर्षों की मेहनत और अभ्यास के बाद वे इस कला में पारंगत हो गए। यही कला आज उनकी पहचान और आजीविका का मुख्य साधन है।

उन्होंने कैलिस्थेनिक्स और फिटनेस से जुड़े वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने शुरू किए, जो देखते ही देखते लोकप्रिय हो गए। आज इमरान लोन कश्मीर के प्रमुख सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स में गिने जाते हैं। एक फिटनेस कोच के रूप में वे हज़ारों युवाओं को न सिर्फ ट्रेनिंग दे रहे हैं, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी मज़बूत बना रहे हैं।
इमरान मानते हैं कि सोशल मीडिया फिटनेस को लेकर जागरूकता फैलाने का एक बेहद प्रभावी माध्यम बन गया है। “अगर सही दिशा में इस्तेमाल किया जाए, तो सोशल मीडिया युवाओं को नशे और निराशा से बाहर निकाल सकता है,” वे कहते हैं। आज उनकी सोशल मीडिया से होने वाली कमाई ही उनका मुख्य आय स्रोत है, लेकिन उससे कहीं बड़ा उनका योगदान वह बदलाव है, जो वे युवाओं के जीवन में ला रहे हैं।
पैरा फोर्सेज से प्रेरित होकर इमरान ने युवाओं को उसी स्तर की ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा है। उनकी एकेडमी में आने वाले अधिकतर युवा आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से हैं। इमरान उनसे कोई फीस नहीं लेते, क्योंकि वे जानते हैं कि सही समय पर मिला एक मौका किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है,जैसा कि काश, उनके साथ भी हुआ होता।
आज बांदीपुरा के उस छोटे से गांव का यह युवक “टाइगर” के नाम से जाना जाता है। वह सिर्फ एक फिटनेस कोच या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नहीं, बल्कि उन युवाओं की आवाज़ है, जो कभी सही मार्गदर्शन के अभाव में भटक गए थे। इमरान लोन की कहानी इस बात का सबूत है कि अगर इरादे मज़बूत हों, तो सीमित संसाधन भी किसी को सीमित नहीं कर सकते। उनका जीवन संघर्ष, संकल्प और सेवा का जीवंत उदाहरण है,एक ऐसा उदाहरण, जो कश्मीर के बदलते भविष्य की झलक दिखाता है।