ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
13 अक्तूबर, 1948 को जन्मे नुसरत फतेह अली खान चुनिंदा शब्दों को सुरों में पिरोकर उसे कव्वाली के रूप में पेश करते थे, और यह सीधा सुनने वालों के दिल पर वार करता था। कुछ आवाज़ें समय के साथ पुरानी नहीं पड़तीं। वे पीढ़ियाँ बदलने के बाद भी लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखती हैं। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ भी ऐसी ही आवाज़ थी, जिसमें सूफ़ियाना रंग, इश्क़ की गहराई और रूह को छू लेने वाली कशिश एक साथ सुनाई देती थी। उनकी कव्वाली सुनते हुए श्रोता अक्सर भाषा और सरहदों से आगे निकल जाते हैं। यही वजह है कि पाकिस्तान में जन्मे इस महान फ़नकार का संगीत भारत में भी उतनी ही मोहब्बत से सुना जाता है।
नुसरत फ़तेह अली ख़ान और भारत के रिश्ते की कहानी सिर्फ़ उनके लोकप्रिय गीतों या बॉलीवुड में उनकी मौजूदगी तक सीमित नहीं है। इस कहानी का एक बेहद अहम अध्याय भारतीय संगीतकार ए.आर. रहमान के साथ उनका सहयोग भी है। वर्ष 1997 में दोनों कलाकारों की आवाज़ें एक ऐसे गीत में मिलीं, जिसने अपने नाम और संदेश से ही संगीत की ताक़त को रेखांकित किया ‘Gurus of Peace’। यह गीत ए.आर. रहमान के एल्बम Vande Mataram का हिस्सा था, जिसे भारत की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर जारी किया गया था। India Today की उस दौर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना में भारत और पाकिस्तान के प्रमुख गायकों को शामिल करने का विचार भी था।

जब संगीत ने सरहदों से आगे बढ़कर बात की
1997 का साल भारत की आज़ादी के 50 वर्ष पूरे होने का साल था। इस मौके पर जारी Vande Mataram केवल एक संगीत एल्बम नहीं था, बल्कि भारतीय संगीत को नए अंदाज़ में पेश करने का एक बड़ा प्रयास भी था। ए.आर. रहमान ने इसमें पारंपरिक भारतीय धुनों, आधुनिक संगीत संयोजन और अलग-अलग संगीतकारों की प्रतिभा को साथ लाने की कोशिश की।
इसी परियोजना में नुसरत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ शामिल हुई। पाकिस्तान की धरती पर जन्मे नुसरत ने अपनी कव्वाली के माध्यम से दुनिया भर में पहचान बनाई थी, जबकि रहमान भारतीय संगीत जगत में अपनी अलग ध्वनि और प्रयोगों के लिए पहचाने जाने लगे थे। दोनों का साथ आना इस बात का उदाहरण था कि संगीत की दुनिया में सहयोग के लिए राष्ट्रीयता से अधिक अहम रचनात्मकता और आपसी सम्मान हो सकते हैं।
‘Gurus of Peace’ में नुसरत की बुलंद, प्रभावशाली आवाज़ और रहमान की संगीत-शैली का मेल सुनाई देता है। नुसरत की गायकी में जहाँ सूफ़ियाना परंपरा की गहराई थी, वहीं रहमान के संगीत में आधुनिक ध्वनियों और नए प्रयोगों की जगह थी। इन दोनों रंगों का मेल गीत को एक अलग पहचान देता है।
इस सहयोग का महत्व इसलिए भी था कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे हैं। राजनीतिक तनाव, अविश्वास और ऐतिहासिक विवादों के बीच दोनों देशों के कलाकारों का एक साथ काम करना सांस्कृतिक संवाद की संभावनाओं को सामने लाता रहा है। हालांकि, किसी एक गीत से राजनीतिक दूरियाँ समाप्त नहीं हो जातीं, लेकिन वह लोगों को एक-दूसरे की कला सुनने और समझने का अवसर ज़रूर देता है।

रहमान के बारे में नुसरत की राय
नुसरत और रहमान के सहयोग की कहानी केवल स्टूडियो में साथ गाने तक सीमित नहीं थी। दोनों कलाकारों के बीच संगीत के प्रति सम्मान भी इस रिश्ते का अहम पहलू था। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 2009 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 1997 में बेंगलुरु में अपने आख़िरी भारतीय संगीत कार्यक्रमों में से एक के दौरान नुसरत से रहमान के बारे में पूछा गया था। उस समय रहमान संगीत की दुनिया में तेज़ी से अपनी पहचान बना रहे थे। नुसरत ने उनके बारे में सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “अच्छा बच्चा है।” रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि नुसरत रहमान की संगीत प्रतिभा और साथी कलाकारों के प्रति उनके शिष्ट व्यवहार से प्रभावित थे।
यह प्रसंग इसलिए उल्लेखनीय है कि नुसरत स्वयं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके थे। इसके बावजूद वे दूसरे कलाकारों की प्रतिभा को स्वीकार करने और उनकी सराहना करने से पीछे नहीं हटते थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नुसरत को रहमान के साथ आगे भी काम करने की उम्मीद थी।
लेकिन यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी। 16 अगस्त 1997 को लंदन में नुसरत फ़तेह अली ख़ान का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 48 वर्ष थी। उनके जाने से सूफ़ी संगीत और कव्वाली की दुनिया ने एक ऐसा कलाकार खो दिया, जिसकी आवाज़ ने पारंपरिक संगीत को अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एक गीत, जो बन गया विरासत का हिस्सा
‘Gurus of Peace’ नुसरत की अंतिम रिकॉर्डिंग्स में से एक था। इस गीत को उनके जीवन के आख़िरी दौर और रहमान के साथ उनके सहयोग की याद से अलग करके नहीं देखा जा सकता। नुसरत के निधन के बाद भी यह गीत उनकी विरासत के साथ जुड़ा रहा। ए.आर. रहमान के एल्बम Vande Mataram को 1997 में भारत की स्वतंत्रता के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जारी किया गया था। इसमें नुसरत और रहमान की आवाज़ों वाला गीत एक विशेष स्थान रखता है। Apple Music पर उपलब्ध एल्बम विवरण भी इस सहयोग को एल्बम की उल्लेखनीय विशेषताओं में गिनता है।
इस गीत को केवल भारत-पाकिस्तान के दो कलाकारों का संगीत-सहयोग कहना इसकी पूरी भावना को व्यक्त नहीं करता। यह उस संभावना की भी याद दिलाता है जिसमें कलाकार अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए एक साझा रचना तैयार कर सकते हैं। नुसरत अपनी कव्वाली की परंपरा से आए थे और रहमान भारतीय संगीत की विविध परंपराओं को आधुनिक ध्वनियों के साथ जोड़ रहे थे। दोनों ने अपनी-अपनी पहचान छोड़े बिना एक साझा संगीत अनुभव तैयार किया।
संगीत की यही विशेषता है। किसी गीत को सुनने के लिए श्रोता को गायक की राष्ट्रीयता जानना आवश्यक नहीं होता। वह धुन में अपना अनुभव, अपनी भावनाएँ और अपनी स्मृतियाँ खोज सकता है। यही वजह है कि कई बार कलाकारों की बनाई हुई सांस्कृतिक कड़ियाँ उन सीमाओं से अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जो उन्हें अलग करती हैं।
बॉलीवुड में नुसरत की आवाज़ और धुनों का असर
नुसरत फ़तेह अली ख़ान का भारत से जुड़ाव केवल ए.आर. रहमान के साथ किए गए काम तक सीमित नहीं था। हिंदी फ़िल्म संगीत में भी उनकी मौजूदगी बेहद प्रभावशाली रही। उनकी कव्वालियों और धुनों ने भारतीय संगीतकारों को आकर्षित किया और फ़िल्मों में उनके संगीत की अलग-अलग तरह से गूँज सुनाई दी।
नुसरत ने और प्यार हो गया जैसी हिंदी फ़िल्मों के लिए भी गाया। इस फ़िल्म में ऐश्वर्या राय और बॉबी देओल मुख्य भूमिकाओं में थे। फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में उनका योगदान उनके निधन के बाद भी जारी रहा। उनकी आवाज़ में गाया गया ‘दुल्हे का सेहरा’ फ़िल्म धड़कन के माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचा और विवाह जैसे भावनात्मक अवसरों पर लोकप्रिय हुआ। ‘तेरे बिन नहीं लगदा’ की धुन भी हिंदी फ़िल्म कच्चे धागे के संगीत से जुड़कर व्यापक पहचान हासिल करती रही।
उनकी कव्वालियों के नए संस्करण और उनसे प्रेरित फ़िल्मी गीत भी भारतीय संगीत जगत में चर्चा का विषय रहे। ‘मेरे रश्के क़मर’ को 2017 की फ़िल्म बादशाहो के लिए नए रूप में पेश किया गया। ‘साँसों की माला’ जैसे गीतों को भी अलग-अलग दौर में नए श्रोताओं ने सुना। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में नुसरत की रचनाओं और उनसे प्रेरित बॉलीवुड गीतों के कई उदाहरण दिए गए हैं।
इन गीतों की लोकप्रियता का एक कारण उनकी धुनों की भावनात्मक ताक़त है। नुसरत की गायकी में इश्क़ केवल रोमांस नहीं था; वह समर्पण, विरह, बेचैनी और रूहानी अनुभव का भी प्रतीक बन सकता था। यही भाव अलग-अलग संदर्भों में श्रोताओं को आकर्षित करते हैं। किसी के लिए उनकी कव्वाली इबादत के करीब है, किसी के लिए प्रेम की अभिव्यक्ति और किसी के लिए पुरानी यादों का हिस्सा।
हालांकि, उनकी रचनाओं के इस्तेमाल और उनसे प्रेरित गीतों को लेकर मौलिकता तथा उचित श्रेय की बहस भी होती रही है। किसी कलाकार की धुन से प्रेरणा लेना और उसकी रचना का अनधिकृत इस्तेमाल करना एक ही बात नहीं है। नुसरत की विरासत का सम्मान करने का अर्थ यह भी है कि उनके संगीत के मूल रचनाकारों और परंपरा को उचित पहचान दी जाए।

नई पीढ़ी तक कैसे पहुँच रही है नुसरत की आवाज़?
नुसरत फ़तेह अली ख़ान को सुने जाने के लिए आज किसी एक पीढ़ी या संगीत-परंपरा तक सीमित रहने की आवश्यकता नहीं है। उनकी रिकॉर्डिंग्स डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध हैं। पुराने गीतों के नए संस्करण, फ़िल्मों में उनकी धुनों का इस्तेमाल और सोशल मीडिया पर संगीत के छोटे अंश उन्हें नए श्रोताओं तक पहुँचाते हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस ने 2025 में प्रकाशित अपने एक लेख में नुसरत की विरासत और नई पीढ़ी के बीच उनके संगीत की लोकप्रियता पर चर्चा की थी। यह बताता है कि उनका संगीत केवल पुरानी रिकॉर्डिंग्स के संग्रह में बंद नहीं है, बल्कि बदलते संगीत-परिदृश्य में भी नए श्रोताओं तक पहुँच रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पढ़ें।
आज संगीत सुनने के माध्यम बदल चुके हैं। पहले किसी कलाकार तक पहुँचने के लिए रेडियो, कैसेट, सीडी या लाइव कार्यक्रमों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब मोबाइल फ़ोन पर कुछ ही क्षणों में कोई गीत दुनिया के किसी भी हिस्से में सुना जा सकता है। इस बदलाव ने पुराने कलाकारों को भी नई पीढ़ी से जुड़ने का अवसर दिया है।
लेकिन केवल तकनीक किसी आवाज़ को अमर नहीं बनाती। उसके पीछे उस संगीत की गुणवत्ता और भावनात्मक गहराई भी होती है। नुसरत की गायकी में सुरों के साथ आवाज़ की ताक़त, लय पर पकड़, लंबे आलाप और धीरे-धीरे ऊँचाई तक पहुँचने की क्षमता थी। वह एक ही रचना में श्रोताओं को ठहराव से उत्साह और फिर भावनात्मक उत्कर्ष तक ले जा सकते थे।
उनकी कव्वाली में सामूहिक गायन और ताल का भी महत्वपूर्ण स्थान था। मुख्य गायक की आवाज़, साथ देने वाले कलाकारों की प्रतिक्रियाएँ और तालियों की लय मिलकर ऐसा अनुभव रचते थे, जिसमें श्रोता केवल सुनने वाला नहीं रहता, बल्कि प्रस्तुति का हिस्सा बन जाता था। इसीलिए उनकी लाइव प्रस्तुतियों की चर्चा आज भी संगीत-प्रेमियों के बीच होती है।
कव्वाली को दुनिया तक पहुँचाने वाला फ़नकार
नुसरत फ़तेह अली ख़ान की पहचान एक महान कव्वाल के रूप में बनी, लेकिन उनका संगीत पारंपरिक मंचों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अलग-अलग देशों के कलाकारों के साथ काम किया और विश्व संगीत के क्षेत्र में भी अपनी पहचान स्थापित की। उनकी गायकी ने उन श्रोताओं को भी कव्वाली से परिचित कराया, जो उर्दू, पंजाबी या फ़ारसी की पूरी समझ नहीं रखते थे।
यहाँ संगीत की एक विशेषता सामने आती है भावना कई बार भाषा की सीमा से आगे निकल जाती है। श्रोता हर शब्द का अर्थ न समझ पाए, फिर भी आवाज़ की तड़प, लय और प्रस्तुति में मौजूद ऊर्जा को महसूस कर सकता है। नुसरत की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता में यह गुण भी महत्वपूर्ण रहा।
उनके लिए कव्वाली सिर्फ़ एक गायन शैली नहीं थी। यह एक ऐसी परंपरा थी जिसमें कविता, संगीत, आध्यात्मिकता और सामूहिक अनुभव एक साथ आते हैं। उन्होंने इस परंपरा को अपनी विशिष्ट आवाज़ और प्रयोगों के माध्यम से नए श्रोताओं तक पहुँचाया। आधुनिक संगीत के साथ उनके सहयोग ने भी यह दिखाया कि परंपरा और प्रयोग एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते।
ए.आर. रहमान के साथ उनका सहयोग इसी व्यापक दृष्टि का एक उदाहरण था। रहमान की संगीत-भाषा आधुनिक थी, लेकिन वह भारतीय संगीत की जड़ों से भी जुड़ी थी। नुसरत की गायकी पारंपरिक कव्वाली से आती थी, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति दुनिया भर के श्रोताओं को आकर्षित करती थी। दोनों का साथ इन दो संगीत-दृष्टियों के बीच एक संवाद था।
नुसरत की विरासत में छिपा इंसानियत का संदेश
नुसरत फ़तेह अली ख़ान की कहानी को भारत-पाकिस्तान के रिश्तों के संदर्भ में पढ़ते समय यह याद रखना आवश्यक है कि कला अपने आप में सभी राजनीतिक समस्याओं का समाधान नहीं है। कलाकारों का सहयोग सीमाओं, विवादों और मतभेदों को एक झटके में समाप्त नहीं कर सकता। फिर भी वह एक ऐसा साझा स्थान बनाता है, जहाँ लोग एक-दूसरे की आवाज़ सुन सकते हैं और सांस्कृतिक समानताओं को पहचान सकते हैं।
भारत में नुसरत की लोकप्रियता इसी सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा है। उनके गीतों को पसंद करने के लिए किसी विशेष राष्ट्रीयता या धार्मिक पहचान का होना आवश्यक नहीं है। लोग उन्हें उनकी आवाज़, धुनों और भावनात्मक अभिव्यक्ति के कारण सुनते हैं।
‘Gurus of Peace’ की याद भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर तैयार हुए एल्बम में एक पाकिस्तानी कव्वाल और एक भारतीय संगीतकार की साझेदारी ने यह संभावना सामने रखी कि साझा रचना का आधार आपसी सम्मान हो सकता है। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है, जब दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक तनाव लोगों के बीच दूरी बढ़ाते हैं।
नुसरत के संगीत में प्रेम और समर्पण के भाव बार-बार लौटते हैं। सूफ़ियाना परंपरा में प्रेम को केवल व्यक्तिगत संबंध के रूप में नहीं, बल्कि इंसान और उसके व्यापक आध्यात्मिक अनुभव के बीच संबंध के रूप में भी समझा जाता है। यही व्यापकता उनकी गायकी को अलग-अलग तरह के श्रोताओं से जोड़ती है।
आवाज़ जो आज भी सुनाई देती है
16 अगस्त 1997 को नुसरत फ़तेह अली ख़ान इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी रिकॉर्डिंग्स, कव्वालियाँ और उनसे जुड़ी यादें आज भी मौजूद हैं। उनके जाने के बाद भी उनके गीत फ़िल्मों में सुनाई दिए, नए कलाकारों ने उनकी रचनाओं को नए रूप में पेश किया और संगीत-प्रेमियों ने उनकी पुरानी प्रस्तुतियों को फिर-फिर सुना। ए.आर. रहमान के साथ ‘Gurus of Peace’ उनके संगीत-सफ़र का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह गीत दो कलाकारों की आवाज़ों के मेल से आगे बढ़कर एक ऐसे दौर की याद भी है, जब संगीत के माध्यम से साझा सांस्कृतिक अनुभव रचने की कोशिश की गई थी।
नुसरत की विरासत का अर्थ सिर्फ़ उनके पुराने हिट गीतों को याद करना नहीं है। इसका अर्थ उस संगीत-परंपरा को समझना भी है, जिसे उन्होंने अपनी आवाज़ से नई पहचान दी; उन कलाकारों को पहचानना भी है, जिन्होंने उनसे प्रेरणा ली; और उन श्रोताओं की भावनाओं को समझना भी है, जिनके लिए उनकी कव्वाली आज तक सुकून, प्रेम या आध्यात्मिक जुड़ाव का माध्यम है। उनकी आवाज़ आज भी इसलिए ज़िंदा है क्योंकि वह किसी एक दौर, एक भाषा या एक सीमा में कैद नहीं रही। वह पाकिस्तान से उठी, भारत के संगीत-प्रेमियों के दिलों तक पहुँची और दुनिया भर के श्रोताओं के बीच अपनी जगह बनाती चली गई।
नुसरत फ़तेह अली ख़ान और ए.आर. रहमान का ‘Gurus of Peace’ इसी विरासत की एक यादगार मिसाल है एक ऐसी रचना, जो बताती है कि कलाकार अलग-अलग देशों से आ सकते हैं, उनकी संगीत-परंपराएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन जब वे सुरों में मिलते हैं तो एक साझा अनुभव जन्म ले सकता है।और शायद यही किसी महान कलाकार की सबसे बड़ी विरासत है उसकी आवाज़ का उसके जीवन के बाद भी लोगों को जोड़ते रहना।