जावेद अख्तर की शायरी से जुड़ा मोहम्मद वकील का खास रिश्ता

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 02-11-2026
Mohammad Vakil’s special connection to Javed Akhtar’s poetry
Mohammad Vakil’s special connection to Javed Akhtar’s poetry

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली 

गजल सिर्फ सुरों का खेल नहीं, बल्कि अल्फाज में छिपे एहसास को आवाज देने की कला है। इसी सोच के साथ मशहूर गजल गायक मोहम्मद वकील अब गीतकार और शायर जावेद अख्तर की रचनात्मक दुनिया से जुड़कर एक खास संगीत सफर पर निकल पड़े हैं। दोनों की यह साझेदारी जल्द रिलीज होने वाले सिंगल 'बज़ाहिर क्या है' में सुनाई देगी। इस गाने में जावेद अख्तर की गहरी और अर्थपूर्ण शायरी को मोहम्मद वकील की शास्त्रीय संगीत में रची-बसी आवाज का साथ मिला है।
 
मोहम्मद वकील के लिए जावेद अख्तर के साथ काम करना महज एक म्यूजिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी और सम्मान का अनुभव रहा। जावेद अख्तर के लिखे शब्दों की गहराई को समझना और उनके भावों को गायकी के जरिए श्रोताओं तक पहुंचाना उनके लिए एक चुनौती भी थी। वकील बताते हैं कि जावेद अख्तर की शायरी में असाधारण गहराई है, जिसकी वजह से शुरुआत में उन्हें थोड़ी घबराहट महसूस हुई। लेकिन जावेद अख्तर के प्रोत्साहन और उन पर जताए गए भरोसे ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया।
 
 

जावेद अख्तर के अल्फाज और मोहम्मद वकील के सुरों का संगम

इस सहयोग की सबसे खास बात यह है कि इसमें शायरी की मूल आत्मा को बरकरार रखते हुए संगीत को समकालीन अंदाज दिया गया है। गजल की पारंपरिक शास्त्रीय नींव के साथ आधुनिक पश्चिमी संगीत के तत्वों को भी शामिल किया गया है। मोहम्मद वकील चाहते हैं कि यह गजल नई पीढ़ी के श्रोताओं तक भी पहुंचे, लेकिन ऐसा करते हुए इसकी क्लासिकल पहचान और भावनात्मक गहराई कम न हो।
 
वकील का कहना है कि वह बचपन से संगीत सीख रहे हैं। उनके परिवार में संगीत का माहौल रहा है और उनके उस्तादों ने उन्हें रागों की गहराई तथा भारतीय संगीत की बारीकियों से परिचित कराया। करीब 35 वर्षों के पेशेवर अनुभव के बावजूद वह आज भी सीखने की प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं।
 
गजल की रूह को समझना आसान नहीं

मोहम्मद वकील मानते हैं कि गजल गायकी के लिए सिर्फ प्रतिभाशाली आवाज होना काफी नहीं है। इसके लिए शायरी की गहरी समझ, वर्षों का रियाज, उस्तादों का मार्गदर्शन और शायरों की संगत जरूरी है।
 
उनके मुताबिक, गजल का हर शेर अपने आप में एक अलग कहानी, विचार और भावना समेटे होता है। गायक की असली चुनौती इन भावनाओं को समझकर उन्हें सुरों में इस तरह पिरोना है कि श्रोता भी उस एहसास से जुड़ सकें।
 
वह अपनी गायकी को 'रागदारी आधारित गजल' बताते हैं, जहां रागों की गहराई और शायरी के जज्बात एक-दूसरे को पूरा करते हैं। यही खूबी गजल को फिल्मी और पॉप संगीत से अलग पहचान देती है।
 
'सा रे गा मा' से जावेद अख्तर के साथ खास सफर तक

मोहम्मद वकील ने 1997 में 'सा रे गा मा' का खिताब जीता था और 1998 में इसके मेगा फाइनल्स के विजेता बने थे। उस सफलता से शुरू हुआ उनका संगीत सफर आज भी लगातार जारी है। 'बज़ाहिर क्या है' के जरिए वह एक बार फिर अपनी शास्त्रीय संगीत की विरासत और आधुनिक संगीत के बीच खूबसूरत तालमेल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
 
अपनी कला के प्रति समर्पण को बयां करते हुए उन्होंने ये पंक्तियां भी साझा कीं:
 
“फन में फनकार का जलता है लहू यूं जैसे... मोम के जिस्म में धागे का जिगर जलता है...”
 
मोहम्मद वकील और जावेद अख्तर की यह साझेदारी इस बात की याद दिलाती है कि अच्छी गजल सिर्फ सुनी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है। 'बज़ाहिर क्या है' में शब्दों की गहराई और सुरों की संवेदनशीलता किस तरह एक-दूसरे से जुड़ती है, यह देखना और सुनना दिलचस्प होगा।