जम्मू (जम्मू और कश्मीर)
डोगरी भाषा को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के प्रयास में, जम्मू में नवरात्रि के दौरान डोगरी भाषा में रामलीला का मंचन किया जा रहा है। इसे देखने के लिए हर उम्र के लोग आ रहे हैं। आयोजकों का कहना है कि इस पहल का मकसद नई पीढ़ी को उनकी क्षेत्रीय भाषा से फिर से जोड़ना है। इस रामलीला में रामायण के प्रसंगों को डोगरी भाषा में पेश किया गया है, जिससे दर्शकों को अपनी स्थानीय भाषा में इस पारंपरिक महाकाव्य का अनुभव करने का मौका मिल रहा है। युवाओं की ओर से भी इसे लेकर काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। कई युवाओं का कहना है कि इससे उन्हें अपनी मातृभाषा के महत्व को समझने में मदद मिली है।
'सीनियर सिटीजन्स सपोर्ट सर्विसेज क्लब' के अध्यक्ष कस्तूरी गुप्ता ने बताया कि घरों और शिक्षण संस्थानों में डोगरी भाषा का इस्तेमाल कम होता जा रहा है। इसी वजह से उनके संगठन ने लोगों को इस भाषा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के तरीके खोजने का फैसला किया। गुप्ता ने ANI को बताया, "आज हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग घरों में डोगरी नहीं बोल रहे हैं। बच्चे जहां बड़े होते हैं और सीखते हैं—यानी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय—वहां भी इस भाषा का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इसका मतलब यह है कि धीरे-धीरे यह भाषा विलुप्त हो सकती है।"
उन्होंने कहा कि किसी भाषा को बढ़ावा देने के लिए केवल इक्का-दुक्का कार्यक्रम आयोजित करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि समाज के सभी वर्गों की ओर से लगातार प्रयासों की जरूरत है। यह क्लब स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसे कार्यक्रम चला रहा है, जिनसे डोगरी भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा मिले। इसके अलावा, उन्होंने शहर की सार्वजनिक जगहों पर डोगरी भाषा में साइनबोर्ड लगाने जैसी पहल भी की है, ताकि लोगों के बीच इस भाषा की दृश्यता बढ़ सके।
गुप्ता ने कहा कि रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन लोगों की अपनी मातृभाषा के प्रति सोच बदलने में मदद कर सकते हैं और उन्हें इसे बोलने में गर्व महसूस करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। उन्होंने कहा, "बच्चे भी इस रामलीला को देखने आ रहे हैं। अगर हम उन्हें अपनी संस्कृति और भाषा से परिचित कराते हैं, तो लोगों तक संदेश ज्यादा प्रभावी ढंग से पहुंचता है, क्योंकि भाषा और संस्कृति आपस में जुड़े हुए हैं।"
क्लब के महासचिव विजय शर्मा ने बताया कि डोगरी रामलीला का आयोजन, भाषा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई कई पहलों में से एक है। उन्होंने कहा कि रोजमर्रा की जिंदगी में डोगरी भाषा के इस्तेमाल में काफी कमी आई है। उन्होंने बताया कि संगठन को अपने पिछले कार्यक्रमों के लिए अच्छी प्रतिक्रिया मिली थी और अब वे 24 अक्टूबर को एक जुलूस निकालने की योजना बना रहे हैं, जिसमें अलग-अलग स्कूलों के लगभग 500 छात्रों के शामिल होने की उम्मीद है।
शर्मा ने कहा कि रामलीला को इसलिए चुना गया क्योंकि रामायण से हर पीढ़ी के लोग परिचित हैं, जिससे यह डोगरी भाषा को बढ़ावा देने का एक प्रभावी माध्यम बन जाती है।
उन्होंने कहा, "सोच यह थी कि रामलीला और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के ज़रिए लोगों तक कोई संदेश जल्दी पहुँचाया जा सकता है। हर उम्र के लोग रामायण देखते हैं, तो हमने सोचा कि क्यों न इसे अपनी डोगरी भाषा में भी पेश किया जाए? इससे लोगों को पता चलेगा कि रामायण को डोगरी में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।"
इस प्रस्तुति का निर्देशन रजनीश गुप्ता ने किया है, जिन्होंने डोगरी स्क्रिप्ट (पटकथा) पर भी काम किया है। इसमें शामिल कलाकारों ने बताया कि इस महाकाव्य को क्षेत्रीय भाषा में ढालने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन इससे उन्हें डोगरी भाषा को बचाने में अपना योगदान देने का मौका भी मिला। इस प्रस्तुति से जुड़े कलाकार किंग सी. भारती ने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें डोगरी भाषा को एक नए नज़रिए से समझने का मौका दिया।
उन्होंने कहा, "इसकी स्क्रिप्ट डोगरी में लिखी गई है, और वह भी भाषा के पारंपरिक रूप में। इसमें थोड़ी मेहनत तो लगती है, लेकिन यह काफी मज़ेदार है। यह देखकर अच्छा लगता है कि हम अपनी भाषा को बढ़ावा देने में किसी तरह अपना योगदान दे पा रहे हैं।"
उन्होंने बताया कि दर्शकों की प्रतिक्रिया काफी उत्साहजनक रही, और खास तौर पर युवाओं की भागीदारी देखकर बहुत खुशी हुई।
एक अन्य कलाकार, अजय सैनी ने कहा कि इस पहल से नई पीढ़ी को डोगरी बोलने में और अधिक सहज महसूस करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि युवा कभी-कभी अपनी मातृभाषा बोलने में हिचकिचाते हैं, भले ही वे उसे समझते हों; ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम इस झिझक को दूर करने में मदद कर सकते हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया में भी कुछ ऐसी ही भावना देखने को मिली। मानस शर्मा नाम के एक युवा दर्शक ने बताया कि वह घर पर तो डोगरी बोलते हैं, लेकिन बाहर लोगों से बातचीत करते समय हिंदी का इस्तेमाल करने लगते हैं।
उन्होंने कहा, "यह एक अच्छी पहल है, क्योंकि हमें अपनी मातृभाषा आनी चाहिए। मैं घर पर डोगरी बोलता हूँ, लेकिन बाहर लोग आमतौर पर डोगरी नहीं बोलते, इसलिए मुझे हिंदी में बात करनी पड़ती है।" दर्शकों में शामिल एक और युवा, ऋषि शर्मा ने कहा कि इस प्रस्तुति ने उन्हें यहाँ बार-बार आने और डोगरी के नए शब्द सीखने के लिए प्रेरित किया है।
उन्होंने कहा कि जम्मू में ऐसी प्रस्तुतियाँ और भी जगहों पर आयोजित की जानी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह भाषा रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनी रहे।
आयोजकों और कलाकारों के लिए, यह पहल एक जानी-पहचानी सांस्कृतिक परंपरा का उपयोग करके डोगरी को फिर से आम बातचीत में लाने और नई पीढ़ी को अपनी भाषाई विरासत अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने का एक प्रयास है।