दादा साहब फालके की पुण्यतिथि : क्यों दिया जाता है देश का सर्वोच्च फिल्म सम्मान?

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 16-02-2026
Dadasaheb Phalke's death anniversary: ​​Why is the country's highest film honour given?
Dadasaheb Phalke's death anniversary: ​​Why is the country's highest film honour given?

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

भारतीय सिनेमा के इतिहास में अगर किसी एक नाम को सबसे ऊँचे सम्मान के साथ लिया जाता है, तो वह है दादा साहब फालके। उनकी पुण्यतिथि हर वर्ष हमें यह याद दिलाती है कि आज जिस भव्य और विशाल फिल्म उद्योग को हम देखते हैं, उसकी नींव एक ऐसे व्यक्ति ने रखी थी, जिसने सपनों को परदे पर उतारने का साहस किया। दादा साहब फालके का असली नाम धुंडीराज गोविंद फालके था और उन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर यह समझना और भी जरूरी हो जाता है कि उनके नाम पर दिया जाने वाला दादा साहब फालके पुरस्कार क्यों इतना महत्वपूर्ण है और इसकी शुरुआत कैसे हुई।
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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दादा साहब फालके ने 1913 में भारत की पहली पूर्ण लंबाई की फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई। उस दौर में न तो आधुनिक तकनीक थी, न बड़े स्टूडियो और न ही आर्थिक संसाधन। फिर भी उन्होंने अपनी लगन, मेहनत और कल्पनाशक्ति के बल पर एक नई कला को जन्म दिया। उस समय सिनेमा को लोग एक तमाशे की तरह देखते थे, लेकिन फालके जी ने इसे एक गंभीर और रचनात्मक माध्यम बना दिया। उनकी फिल्म ने भारतीय समाज को यह दिखाया कि हमारी अपनी कहानियाँ भी परदे पर उतारी जा सकती हैं।
 

फालके जी ने अपने जीवन में कई फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। उन्होंने पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और भारतीय संस्कृति को फिल्मों के माध्यम से जीवंत किया। उनके काम का असर यह हुआ कि धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में फिल्म निर्माण की शुरुआत हुई और भारतीय सिनेमा का विस्तार होता गया। लेकिन जिस व्यक्ति ने इतने बड़े आंदोलन की शुरुआत की, उसके जीवन के अंतिम दिन उतने सुखद नहीं थे। आर्थिक तंगी और बदलते दौर के कारण उन्हें संघर्ष का सामना करना पड़ा। 16 फरवरी 1944 को उनका निधन हो गया। उनकी पुण्यतिथि पर भारतीय सिनेमा जगत उन्हें श्रद्धांजलि देता है और उनके योगदान को याद करता है।
 

यही वह पृष्ठभूमि है, जिसके कारण उनके नाम पर देश का सबसे बड़ा फिल्म सम्मान स्थापित किया गया। वर्ष 1969 में, जब भारतीय सिनेमा ने अपने 50 वर्ष पूरे किए, तब भारत सरकार ने दादा साहब फालके की स्मृति में एक विशेष पुरस्कार शुरू किया। इस पुरस्कार का उद्देश्य उन कलाकारों और फिल्मकारों को सम्मानित करना है, जिन्होंने भारतीय सिनेमा में आजीवन महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह पुरस्कार भारत सरकार द्वारा दिया जाता है और यह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।
 

दादा साहब फालके पुरस्कार किसी एक फिल्म या एक साल के काम के लिए नहीं दिया जाता, बल्कि पूरे जीवन के योगदान के लिए दिया जाता है। जिन कलाकारों ने अपने अभिनय, निर्देशन, संगीत, लेखन या तकनीकी कार्य से भारतीय सिनेमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है, उन्हें यह सम्मान मिलता है। इस पुरस्कार में स्वर्ण कमल, शॉल और नकद राशि प्रदान की जाती है। इसे पाने वाले कलाकारों का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो जाता है।
 

इस पुरस्कार के पहले प्राप्तकर्ता थीं प्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी। इसके बाद कई दिग्गज कलाकारों को यह सम्मान मिल चुका है, जिनमें सत्यजीत रे, लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी कलाकारों ने अपने-अपने क्षेत्र में ऐसा योगदान दिया, जिसने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
 

दादा साहब फालके की पुण्यतिथि हमें यह भी सिखाती है कि किसी भी बड़े परिवर्तन की शुरुआत एक व्यक्ति के सपने से होती है। यदि फालके जी ने जोखिम उठाकर फिल्म निर्माण का साहस न किया होता, तो शायद भारतीय सिनेमा का स्वरूप आज इतना समृद्ध और व्यापक न होता। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और रचनात्मकता की मिसाल है। यही कारण है कि उनके नाम पर दिया जाने वाला पुरस्कार केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उस विरासत का प्रतीक है, जिसे उन्होंने अपनी मेहनत से गढ़ा।
 

आज जब भारतीय फिल्म उद्योग विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है, तब दादा साहब फालके की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना और उनके नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार के महत्व को समझना हमारे लिए एक श्रद्धांजलि के समान है। यह पुरस्कार आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता है कि वे सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के सशक्त माध्यम के रूप में देखें। इस तरह दादा साहब फालके पुरस्कार हर वर्ष हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाता है, जिसने भारत में सिनेमा की पहली लौ जलाई और उसे एक आंदोलन का रूप दिया।