नई दिल्ली
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बायोसाइंसेज विभाग के प्रोफेसर काज़ी मोहम्मद रिज़वानुल हक को एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना के लिए 22.94 लाख रुपये का अनुदान मिला है। यह अनुदान आयुष मंत्रालय के तहत यूनानी चिकित्सा अनुसंधान केंद्रीय परिषद CCRUM द्वारा EoI योजना 2025-26 के अंतर्गत दिया गया है।
इस परियोजना का उद्देश्य मल्टीड्रग-प्रतिरोधी यूरोपैथोजेनिक बैक्टीरिया के खिलाफ यूनानी औषधीय पौधों की रोगाणुरोधी क्षमता का अध्ययन करना है। इस शोध में आधुनिक AI और मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, जिससे पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक विज्ञान के बीच एक मजबूत पुल तैयार होगा।
प्रोफेसर हक इस परियोजना के प्रधान अन्वेषक और समन्वयक हैं। इस अध्ययन में जामिया हमदर्द के यूनानी चिकित्सा उत्कृष्टता केंद्र के निदेशक डॉ. सईद अहमद सह-अन्वेषक के रूप में सहयोग करेंगे। यह साझेदारी पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान को एक साथ लाने का प्रयास है।
संक्रामक रोग आज भी वैश्विक स्तर पर मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। खासकर एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता ने चिकित्सा जगत के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन यानी UTI जैसे सामान्य संक्रमणों में भी अब दवा का असर कम होता जा रहा है, जो चिंता का विषय है।
इस परियोजना के जरिए पौधों पर आधारित नए एंटीमाइक्रोबियल एजेंट विकसित करने की संभावना है। इससे दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के इलाज में नई दिशा मिल सकती है। यह शोध आयुष मंत्रालय की उस नीति के अनुरूप है, जिसमें पारंपरिक चिकित्सा को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
प्रोफेसर हक इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण शोध परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं। उन्होंने भारत और ब्रिटेन के संयुक्त प्रोजेक्ट SELECTAR में भी अहम भूमिका निभाई थी, जिसमें एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस पर काम किया गया।
वर्तमान में भी वे DBT द्वारा वित्तपोषित एक अन्य परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें TERI और मध्य प्रदेश के वन अनुसंधान संस्थान सहयोगी हैं। उनके शोध का फोकस एंटीबायोटिक प्रतिरोध की जटिल प्रक्रियाओं को समझना और उससे निपटने के नए उपाय खोजना है।इस तरह यह नई परियोजना न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ी उम्मीद लेकर आई है।