इमान सकीना
आज की दुनिया जिस दौर से गुजर रही है वहां 'क्लाइमेट चेंज' यानी जलवायु परिवर्तन और 'सस्टेनेबिलिटी' सिर्फ किताबी शब्द नहीं रह गए हैं। ये अब हमारे वजूद की लड़ाई बन चुके हैं। बढ़ता तापमान और पिघलते ग्लेशियर चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं। इंसान ने कुदरत के साथ जो खिलवाड़ किया है उसका हर्जाना अब पूरी मानवता को भुगतना पड़ रहा है। वैज्ञानिक और राजनेता अपनी तरफ से नीतियां बना रहे हैं। लेकिन एक बहुत बड़ा हिस्सा नैतिक जिम्मेदारी का है। इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यहीं पर इस्लामी शिक्षाएं एक मार्गदर्शक ढांचा प्रदान करती हैं। ये पर्यावरण की रक्षा को सिर्फ एक नागरिक कर्तव्य नहीं मानतीं। ये इसे 'इबादत' का दर्जा देती हैं।
इस्लामी नजरिए के केंद्र में 'खिलाफत' का क्रांतिकारी विचार है। इस्लाम यह मानता है कि इंसान इस धरती का मालिक नहीं है। वह अल्लाह की तरफ से नियुक्त किया गया एक प्रतिनिधि है। यह विचार दबदबे का नहीं बल्कि जिम्मेदारी का हैI
धरती और इसके संसाधन इंसान को एक 'अमानत'के तौर पर सौंपे गए हैं। जब हम खुद को मालिक समझने लगते हैं तो संसाधनों का दोहन शुरू कर देते हैं। लेकिन जब हम खुद को रखवाला मानते हैं तो हमारी सोच बदल जाती है। एक प्रतिनिधि के रूप में इंसान का फर्ज है कि वह धरती को बेहतर हालत में अगली पीढ़ी को सौंपे। यह नजरिया पर्यावरण संरक्षण को फाइल मैनेजमेंट से निकालकर सीधे जवाबदेही से जोड़ देता है।
कुरान में 'मिज़ान' यानी संतुलन का जिक्र बार-बार आया है। अल्लाह ने इस पूरी कायनात को एक बेहद सटीक अनुपात में बनाया है। सूरज और चांद से लेकर हवाएं और बारिश तक सब एक तालमेल में काम करते हैं। आज हम जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं वह इसी 'मिज़ान' को बिगाड़ने का नतीजा है। इंसान की लालच ने जब जंगलों को काटा तो कुदरती संतुलन टूट गया। इस्लाम हमें सिखाता है कि इस संतुलन को बहाल करना एक आध्यात्मिक जिम्मेदारी भी है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना ईश्वर की बनाई व्यवस्था का अपमान है।

पानी का संरक्षण इस्लामी शिक्षाओं में खास जगह रखता है। जल ही जीवन है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सदियों पहले इसके संरक्षण का पैमाना तय किया था। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार पानी अल्लाह की बड़ी नियामत है। वुज़ू जैसे धार्मिक काम में भी पानी बर्बाद करने की सख्त मनाही है।
एक मशहूर हदीस के अनुसार पैगंबर साहब ने सिखाया कि अगर आप बहती नदी के किनारे हों तब भी पानी बर्बाद न करें। यह शिक्षा हमें अनुशासन सिखाती है। सस्टेनेबिलिटी सिर्फ संसाधनों की कमी के बारे में नहीं है। यह हमारे ध्यान और व्यवहार के बारे में है।
आज का कंज्यूमर कल्चर पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन है। 'ज्यादा खरीदो और फेंको' की आदत ने कचरे के पहाड़ खड़े कर दिए हैं। इस्लाम में इसके लिए 'इसराफ़' यानी फिजूलखर्ची शब्द का इस्तेमाल हुआ है। कुरान कहता है कि बर्बाद करने वाले शैतान के भाई हैं। इस्लामी जीवनशैली सादगी पर जोर देती है। सस्टेनेबिलिटी का मतलब ही यही है कि हम अपनी जरूरतों को कम करें। खाना बर्बाद न करना और संसाधनों का संचय न करना इसी का हिस्सा है। ये क्लाइमेट चेंज को रोकने के व्यावहारिक कदम हैं।
पर्यावरण का एक बड़ा हिस्सा पेड़-पौधे और जानवर हैं। पैगंबर साहब की शिक्षाएं जानवरों के प्रति दया से भरी हैं। उन्होंने बेजुबानों को बेवजह मारने से आगाह किया। प्यासे जानवर को पानी पिलाना पुण्य का काम बताया। इस्लाम में पेड़ लगाना 'सदका-ए-जारिया' माना जाता है। इसका इनाम तब तक मिलता रहता है जब तक लोग या जानवर उससे फायदा उठाते हैं। यह सोच हमें लंबे समय की योजना बनाने की प्रेरणा देती है।
जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर गरीबों पर पड़ता है। यह एक वैश्विक अन्याय है। इस्लाम न्याय और दया पर आधारित समाज की बात करता है। पर्यावरण के प्रति हमारी लापरवाही उन लोगों पर जुल्म है जो पहले से ही संकट में हैं। क्लाइमेट जस्टिस की बात करना दरअसल सामाजिक न्याय को बनाए रखना है। पर्यावरण की रक्षा करना सिर्फ पेड़ों को बचाना नहीं है। यह लोगों के अधिकारों की रक्षा करना भी है।
अंत में यह समझना जरूरी है कि केवल तकनीक से बदलाव नहीं आएगा। हमें अपनी सोच और मूल्यों को बदलना होगा। इस्लामी शिक्षाएं वह नैतिक कंपास प्रदान करती हैं जिसकी आज जरूरत है। जब हम धरती को अमानत समझेंगे तभी इसे बचा पाएंगे।
संसाधनों का संतुलन और सादगी ही हमारा भविष्य बचा सकती है। मस्जिदों और संस्थाओं को अब 'ग्रीन मैसेज' देने की जरूरत है। पर्यावरण की जिम्मेदारी को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना होगा। इस्लाम हमें याद दिलाता है कि हमारे हर छोटे काम का असर पूरी कायनात पर पड़ता है। अपनी धरती की रक्षा करना आज के दौर की सबसे बड़ी इबादत है। हमें यह जिम्मेदारी आज ही उठानी होगी। अगली पीढ़ियां हमसे इसी की उम्मीद कर रही हैं।