बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की अनकही कहानी Jazz City, ओटीटी पर मचा रही धूम

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 03-04-2026
The untold story of the Bangladesh Liberation War—'Jazz City' is now making waves on OTT platforms.
The untold story of the Bangladesh Liberation War—'Jazz City' is now making waves on OTT platforms.

 

मलिक असरग हाशमी/ नई दिल्ली

आजकल हर तरफ बड़े बजट की फिल्मों और युद्ध की खबरों की चर्चा है। इसी शोर के बीच एक खामोश लेकिन बेहद असरदार वेब सीरीज ने दस्तक दी है। इसका नाम जैज़ है सिटी (Jazz City) । इस सीरीज के बारे में भले ही मुख्यधारा के मीडिया में कम बात हो रही हो। लेकिन पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसे खूब पसंद किया जा रहा है। बांग्लादेश की आज़ादी के इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह एक तोहफा है। नाम से यह कोई अंग्रेजी शो लग सकता है। असल में यह पूरी तरह भारतीय जासूसी और बांग्लादेश के संघर्ष पर आधारित है। इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म सोनी लिव पर देखा जा सकता है।

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सीरीज की कहानी सत्तर के दशक के कोलकाता में ले जाती है। उस समय का पार्क स्ट्रीट और वहां का माहौल रोंगटे खड़े कर देता है। पार्क स्ट्रीट में एक मशहूर नाइट क्लब है जिसका नाम जैज़ सिटी है। इसी क्लब का मालिक जिमी रॉय इस पूरी कहानी का केंद्र है। ढालीवुड के सुपरस्टार अरिफिन शुवो ने जिमी रॉय का किरदार निभाया है। अरिफिन इससे पहले शेख मुजीबुर रहमान की बायोपिक में नजर आए थे। वहां उन्होंने एक नेता का रोल किया था। यहाँ वह एक स्टाइलिश क्लब मालिक के रूप में दिखते हैं। वह एक ऐसा इंसान है जिसे राजनीति से कोई खास मतलब नहीं है। लेकिन वक्त और हालात उसे एक जासूस बना देते हैं। वह एक क्रांतिकारी के रूप में उभरता है।

हॉलीवुड रिपोर्टर जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ने इस सीरीज की समीक्षा की है। उन्होंने सीरीज की कुछ तकनीकी कमियों की बात की है। लेकिन अरिफिन शुवो के अभिनय की जमकर तारीफ हुई है। उनके सिगरेट जलाने के अंदाज से लेकर संवाद बोलने के तरीके तक ने सबका दिल जीत लिया है। वह स्क्रीन पर एक जादुई उपस्थिति दर्ज कराते हैं। उनके किरदार में एक खास किस्म की नज़ाकत है। एक आम कारोबारी से बहादुर विद्रोही बनने का उनका सफर देखने लायक है।

सीरीज कुल दस एपिसोड की है। इसकी शुरुआत थोड़ी धीमी लगती है। कहानी को जमने में थोड़ा वक्त लगता है। 1971 का दौर और बांग्लादेश मुक्ति युद्ध का विषय अब फिल्मों में काफी आम हो गया है। इसलिए दर्शकों को कुछ नया देने की चुनौती थी। कहानी में दिखाया गया है कि कैसे तीन बांग्लादेशी छात्र पाकिस्तानी सेना से बचकर भाग रहे हैं। जिमी रॉय न चाहते हुए भी इस आंदोलन में फंस जाता है। वह उन छात्रों को पनाह देता है। यहीं से उसकी बेपरवाह जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है।

निर्देशक सौमिक सेन ने इस सीरीज को बनाने में काफी मेहनत की है। उन्होंने पुराने कोलकाता की गलियों और वहां की संस्कृति को बखूबी दिखाया है। वह इस कहानी के जरिए भारत के योगदान को भी याद दिलाते हैं। उनका तरीका थोड़ा अलग है। वह पुरानी हॉलीवुड फिल्मों जैसा अहसास जगाने की कोशिश करते हैं। कहीं-कहीं कहानी थोड़ी उलझी हुई और बिखरी हुई लगती है। दस एपिसोड के बजाय इसे थोड़ा छोटा रखा जा सकता था। फिर भी यह दर्शकों को बांधे रखने में सफल होती है।

सीरीज में जासूसी और संगीत का अनोखा मेल है। क्लब की मुख्य गायिका पामेला का किरदार एलेक्जेंड्रा टेलर ने निभाया है। उनके गाने और बोलने का लहजा शुरू में थोड़ा अजीब लग सकता है। लेकिन धीरे-धीरे वह माहौल का हिस्सा बन जाती हैं। वहीं सौरसेनी मैत्रा ने शीला का किरदार निभाया है। वह जिमी की पुरानी प्रेमिका है। शहर में उमड़ रहे शरणार्थियों का दुख देखकर उसका दिल पिघल जाता है। वह भी इस बड़े आंदोलन का हिस्सा बन जाती है। शांतनु घटक ने एक भारतीय खुफिया अधिकारी सिन्हा का रोल किया है। उन्हें जिमी में एक काबिल जासूस नजर आता है। वह जिमी को अपने खतरनाक मिशन के लिए तैयार करते हैं।

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पाकिस्तानी जनरल हनीफ के रूप में शटाफ फिगर ने दमदार काम किया है। वह मुजीबुर रहमान के बढ़ते असर से बौखलाए हुए हैं। वह बागियों और छात्रों का पीछा करते हैं। उनका गुस्सा और जुल्म कहानी में तनाव पैदा करता है। सीरीज में एक रहस्यमयी पादरी का भी किरदार है। उसका लहजा काफी भारी है। वह अपनी धार्मिक शिक्षाओं के बिल्कुल उलट सोच रखता है। ऐसे छोटे-छोटे किरदार कोलकाता की साजिशों को और गहरा बनाते हैं।

आलोचकों का मानना है कि विजुअल इफेक्ट्स थोड़े और बेहतर हो सकते थे। कहीं-कहीं दृश्यों में असलियत की कमी खलती है। डायलॉग्स भी कई जगह बहुत सादा रखे गए हैं। लेकिन इन सब कमियों को अरिफिन शुवो का अभिनय ढक लेता है। उनकी स्टाइलिश मौजूदगी ही दर्शकों को स्क्रीन से चिपकाए रखती है। कोलकाता को जासूसों और विद्रोहियों के शहर के रूप में देखना रोमांचक है। यह अहसास होता है कि हर गली में कोई न कोई साजिश चल रही है।

जैज़ सिटी सिर्फ एक जासूसी थ्रिलर नहीं है। यह मानवीय संवेदनाओं की भी कहानी है। यह दिखाती है कि कैसे एक आम आदमी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकता। वह खुद को बदलने की हिम्मत जुटाता है। जिमी रॉय का बदलाव भले ही कुछ लोगों को सुविधाजनक लगे। लेकिन वह एक उम्मीद जगाता है। प्यार और बलिदान की दास्तान को संगीत के साथ पिरोना एक अच्छा प्रयोग है।

 

अगर आपको इतिहास और थ्रिलर का मेल पसंद है तो इसे जरूर देखें। इसमें सत्तर के दशक का वह दौर है जब देश और दुनिया बदल रही थी। इसमें वह जज्बा है जो आज़ादी की लड़ाई में जरूरी था। सौमिक सेन की यह कोशिश काबिल-ए-तारीफ है। उन्होंने एक ऐसी कहानी चुनी है जो आज की पीढ़ी को जानना जरूरी है। भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की गहराई इस शो में साफ दिखती है।

अरिफिन शुवो ने साबित कर दिया है कि वह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकार हैं। उनका काम सीमाओं से परे है। सीरीज की धीमी रफ्तार के बावजूद उनका प्रदर्शन मनोरंजन से भरपूर है। अन्य कलाकार जैसे शांतनु घटक और सायनदीप सेनगुप्ता ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। कुल मिलाकर जैज़ सिटी एक ऐसी सीरीज है जो अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। यह ओटीटी पर उपलब्ध साधारण कंटेंट से कहीं बेहतर है।

इस सीरीज को देखते हुए आप खुद को उस दौर में महसूस करेंगे। कोलकाता के नाइट क्लबों का धुंआ और आज़ादी की तड़प साथ-साथ चलती है। यह एक ऐसा सफर है जो आपको भावुक भी करेगा और रोमांचित भी। जासूसी की दुनिया की बारीकियां भले ही कम हों। लेकिन किरदारों की गहराई आपको प्रभावित करेगी। जैज़ सिटी को एक बार देखना तो बनता है। इसकी चर्चा भले ही कम हो रही हो। पर इसकी चमक देर तक बनी रहेगी।