ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
NEET-UG 2026 एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) की जांच में यह दावा सामने आया है कि परीक्षा से पहले एक “गेस पेपर” सर्कुलेट हुआ था, जिसके कई प्रश्न असली पेपर से मेल खाते हैं। इसी आधार पर 3 मई की परीक्षा रद्द कर दी गई है और इसे बाद में घोषित तारीखों पर दोबारा कराने का फैसला लिया गया है। सरकार ने इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है, जबकि NTA का कहना है कि परीक्षा पूरी तरह सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत आयोजित हुई थी और जांच अभी शुरुआती चरण में है।
यह विवाद नया नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से बार-बार दोहराए जा रहे घटनाक्रम की नई कड़ी है। इसकी शुरुआत 2015 में होती है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) को पूरी तरह रद्द कर दिया था, क्योंकि बड़े पैमाने पर पेपर लीक साबित हुआ था। यह भारत की परीक्षा प्रणाली के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था, जब सर्वोच्च अदालत ने पहली बार किसी राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा को सीधे रद्द किया।
इसके बाद 2016 में NEET-II के दौरान भी पेपर लीक के आरोप लगे। याचिकाओं में दावा किया गया कि प्रश्न पत्र परीक्षा से पहले ही बाहर आ गया था। हालांकि अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि जब्त सामग्री असली पेपर से मेल नहीं खाती। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया और मामला स्थानीय जांच एजेंसियों पर छोड़ दिया गया, जबकि परीक्षा रद्द नहीं हुई।
2020 और 2021 के दौरान NEET में धांधली का स्वरूप बदलता दिखा। इस समय “सॉल्वर गैंग” और संगठित नकल रैकेट सामने आए, खासकर तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में। यहां असली उम्मीदवारों की जगह नकली परीक्षार्थी परीक्षा में बैठे, बायोमेट्रिक सिस्टम में गड़बड़ी की गई और कुछ मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से उत्तर उपलब्ध कराए गए। हालांकि हर मामले में पेपर लीक की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इसने परीक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरियों को उजागर किया।
2024 का NEET विवाद अब तक का सबसे बड़ा मामला बनकर सामने आया। 5 मई 2024 की परीक्षा के बाद बिहार पुलिस ने उसी दिन FIR दर्ज की, क्योंकि पेपर लीक के संकेत मिले थे। पटना में जांच के दौरान बड़े रैकेट का खुलासा हुआ, जहां आरोप था कि उम्मीदवारों से 30 से 50 लाख रुपये तक वसूले गए। CBI जांच में झारखंड के हज़ारीबाग़ स्थित “ओएसिस पब्लिक स्कूल” का नाम सामने आया, जहां कथित तौर पर स्ट्रॉन्ग रूम से प्रश्नपत्र की तस्वीरें ली गईं और फिर उसे दोबारा सील कर दिया गया। इसके बाद प्रश्न और उत्तर पहले ही कुछ उम्मीदवारों तक पहुंचा दिए गए।
इस परीक्षा का परिणाम भी विवादों में आ गया। रिजल्ट तय समय से 10 दिन पहले घोषित हुआ और 67 छात्रों ने 720 में से 720 अंक हासिल किए, जबकि पिछले साल केवल 2 छात्रों ने ऐसा किया था। इनमें से 6 टॉपर एक ही परीक्षा केंद्र (हरियाणा) से थे। इसके अलावा 718 और 719 जैसे अंक भी सामने आए, जिन्हें कई विशेषज्ञों ने गणितीय रूप से असंभव बताया। इसके बाद NTA प्रमुख को हटा दिया गया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने माना कि पेपर लीक हुआ और कम से कम 155 उम्मीदवार प्रभावित हुए, लेकिन पूरे देश में दोबारा परीक्षा कराने से इनकार कर दिया क्योंकि व्यापक स्तर पर सिस्टम फेल होने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
2024 के बाद सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए 250 से अधिक MBBS छात्रों और उम्मीदवारों पर कार्रवाई की, जिन पर अनुचित तरीकों से लाभ लेने का आरोप था, जैसे लीक पेपर हल करना या किसी और की जगह परीक्षा देना। आलोचकों का कहना था कि यह कार्रवाई समस्या की जड़ पर नहीं बल्कि उसके परिणामों पर केंद्रित थी।
इसी बीच NTA की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठने लगे। जांचों में सामने आया कि बिहार और झारखंड में संगठित नेटवर्क सक्रिय था, जहां प्रश्नपत्र की तस्वीरें लेकर डिजिटल रूप से उत्तर फैलाए गए और उम्मीदवारों से भारी रकम वसूली गई। CBI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि लीक की शुरुआत हज़ारीबाग़ के “ओएसिस पब्लिक स्कूल” से हुई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि पेपर लीक हुआ है, लेकिन पूरे देश में परीक्षा रद्द करने के लिए इसे पर्याप्त नहीं माना।
इस बीच सिर्फ NEET ही नहीं, बल्कि अन्य परीक्षाएं भी विवादों में आईं। 2024 में UGC-NET परीक्षा एक दिन बाद ही रद्द कर दी गई और CBI जांच शुरू हुई। उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा भी पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द करनी पड़ी, जिससे लगभग 48 लाख उम्मीदवार प्रभावित हुए। साथ ही “व्यापम घोटाला” जैसे पुराने मामले भी परीक्षा प्रणाली पर लंबे समय तक छाया बनाए रहे।
इन सभी घटनाओं के बीच NTA लगातार बड़े पैमाने पर लीक के आरोपों से इनकार करता रहा और यह दावा करता रहा कि कुछ घटनाएं पूरे सिस्टम की विफलता नहीं दर्शातीं। लेकिन इन विवादों ने देशभर में छात्रों के विरोध, राजनीतिक बहस और परीक्षा सुधार की मांगों को लगातार बढ़ाया।
अब 2026 में NEET-UG फिर उसी स्थिति में है, जहां परीक्षा रद्द हो चुकी है, CBI जांच चल रही है और “गेस पेपर” तथा पेपर मिलान जैसे नए आरोप सामने आए हैं। यह वही पुराना पैटर्न दोहराता दिख रहा है—जांच, रद्दीकरण, आरोप और फिर भरोसे की बहाली की कोशिश।
इस पूरे दौर में सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ परीक्षा का नहीं, बल्कि भरोसे का हुआ है। लाखों छात्र हर साल इस परीक्षा के लिए वर्षों की मेहनत करते हैं, परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से भारी निवेश करते हैं, और पूरी एक कोचिंग आधारित अर्थव्यवस्था इसके इर्द-गिर्द खड़ी हो गई है। लेकिन बार-बार सामने आने वाले विवादों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मेहनत और योग्यता वास्तव में निर्णायक हैं या सिस्टम की खामियां उन्हें पीछे धकेल रही हैं।
NEET और अन्य परीक्षाओं के लगातार विवादों ने एक बड़े ढांचागत संकट को उजागर किया है, जहां परीक्षा केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि एक संगठित आर्थिक और प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा बन चुकी है, जिसमें कोचिंग संस्थान, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अनौपचारिक नेटवर्क भी शामिल हैं।
आज स्थिति यह है कि भारत के पास डिजिटल निगरानी और तकनीकी क्षमता पहले से कहीं अधिक होने के बावजूद पेपर लीक और परीक्षा विवाद लगातार सामने आते रहते हैं। यही विरोधाभास इस पूरे मुद्दे को और गंभीर बनाता है।
NEET-UG 2026 का विवाद सिर्फ एक परीक्षा की घटना नहीं है, बल्कि एक लंबे समय से चले आ रहे संकट की नवीनतम कड़ी है—एक ऐसा संकट जो बार-बार यह सवाल उठाता है कि अगर देश सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में ही निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं कर पा रहा, तो फिर योग्यता और भरोसे का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है।