नई दिल्ली।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) के शिक्षक प्रशिक्षण एवं गैर औपचारिक शिक्षा विभाग के बीएड स्पेशल एजुकेशन (विशिष्ट अधिगम अक्षमता यानी एसएलडी) तृतीय सेमेस्टर के प्रशिक्षु शिक्षकों ने नई दिल्ली स्थित बलवंतराय मेहता विद्या भवन (आसमा) में डिस्लेक्सिया जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम का उद्देश्य डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता बढ़ाना, समावेशी शिक्षण पद्धतियों को प्रोत्साहित करना और कक्षाओं में बहु संवेदी शिक्षण के महत्व को रेखांकित करना था।
डिस्लेक्सिया एक विशिष्ट अधिगम अक्षमता है, जिसका मुख्य असर पढ़ने, वर्तनी और लिखने की क्षमता पर पड़ सकता है। इसका बच्चे की बुद्धिमत्ता या उसकी मेहनत से कोई सीधा संबंध नहीं है। इसी समझ को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम में शिक्षकों को डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों की सीखने संबंधी जरूरतों से परिचित कराया गया। साथ ही, ऐसे शिक्षण अधिगम सामग्री (टीएलएम) का प्रदर्शन किया गया, जो कक्षा में पढ़ाई को अधिक सुलभ, रोचक और प्रभावी बना सकती है।
कार्यक्रम की तैयारियां सुबह से ही शुरू हो गई थीं। जामिया के प्रशिक्षु शिक्षकों ने डिस्लेक्सिया को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई शिक्षण अधिगम सामग्री को व्यवस्थित किया। इन सामग्रियों को बहु संवेदी शिक्षण पद्धतियों के अनुरूप विकसित किया गया था, ताकि विशिष्ट अधिगम अक्षमता वाले बच्चों की अलग अलग जरूरतों के अनुसार पढ़ाई कराई जा सके।
स्कूल के सभागार में टीएलएम कॉर्नर बनाया गया, जहां इन सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया। इसके अलावा क्विक न्यूरोलॉजिकल स्क्रीनिंग टेस्ट (क्यूएनएसटी-II) से परिचित कराने के लिए अलग व्यवस्था की गई। इसमें शैक्षणिक परिवेश में इस स्क्रीनिंग टूल की प्रासंगिकता और संभावित उपयोग पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम में स्कूल की प्रधानाचार्य वंदना बाबरवाल, उप प्रधानाचार्य स्वस्तिका बनर्जी और स्कूल इंचार्ज जितेंद्र प्रसाद मौजूद रहे। जामिया की कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. इरम नासिर और डॉ. मोहम्मद जुबेर के साथ डॉ. तौसीफ आलम और डॉ. सुमिता भंगू भी कार्यक्रम में शामिल हुए। सामान्य शिक्षा के शिक्षक और विशेष शिक्षक भी उपस्थित रहे।
देवराज बसु और हीना ने अतिथियों, शिक्षकों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कार्यक्रम के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डाला। इसके बाद रफिया, युसरा और जोया ने प्रधानाचार्य, उप प्रधानाचार्य, स्कूल इंचार्ज, प्रो. तौसीफ आलम और सुश्री सुमिता को पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया।
कार्यक्रम में आयशा ने डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता पर संबोधन दिया। उन्होंने बताया कि पारंपरिक कक्षा व्यवस्था में डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को पढ़ाई के दौरान किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि बच्चों की सीखने की कठिनाइयों को समझना और उन्हें केवल कम मेहनती या कमजोर विद्यार्थी मान लेना गलत है। हर बच्चे की जरूरत अलग हो सकती है। इसलिए शिक्षण के तरीके भी उसकी जरूरत के अनुसार होने चाहिए। धैर्य, प्रोत्साहन और सहयोगपूर्ण माहौल बच्चों के आत्मविश्वास को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
बीएड स्पेशल एजुकेशन द्वितीय वर्ष के कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. इरम नासिर और डॉ. मोहम्मद जुबेर ने भी शिक्षकों, अभिभावकों और प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता, सीखने की कठिनाइयों की शुरुआती पहचान और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।
दोनों ने कार्यक्रम की अनुमति देने के लिए स्कूल के प्रधानाचार्य और अधिकारियों के प्रति आभार जताया। उन्होंने बीएड स्पेशल एजुकेशन तृतीय सेमेस्टर के प्रशिक्षु शिक्षकों की मेहनत, उत्साह और सक्रिय भागीदारी की सराहना की।
कार्यक्रम में रचनात्मक प्रस्तुतियों के जरिए भी डिस्लेक्सिया का संदेश दिया गया। सुमैया ने कविता प्रस्तुत की। इसके बाद जामिया के प्रशिक्षु शिक्षकों ने एक नाटक के माध्यम से उन कठिनाइयों को सामने रखा, जिनसे डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को शैक्षणिक और सामाजिक जीवन में जूझना पड़ सकता है।
नाटक के जरिए संदेश दिया गया कि सीखने में कठिनाई को बुद्धिमत्ता की कमी या प्रयासों में कमजोरी नहीं समझना चाहिए। ऐसे बच्चों को समझ, उपयुक्त शिक्षण विधियों और सकारात्मक प्रोत्साहन की जरूरत होती है।
इसके बाद अब्दुल बासित ने डिस्लेक्सिया पर शायरी पेश की। उनकी प्रस्तुति में स्वीकार्यता, संवेदनशीलता और सभी बच्चों को समान अवसर देने का संदेश प्रमुख रहा।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बाद सभी प्रतिभागियों ने समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने की शपथ ली। इसमें बच्चों की व्यक्तिगत भिन्नताओं का सम्मान करने, उनकी सीखने संबंधी जरूरतों को समझने और समान अवसर सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया। प्रतिभागियों ने भेदभाव से मुक्त ऐसा शैक्षणिक वातावरण बनाने की प्रतिबद्धता जताई, जहां हर बच्चे को स्वीकार किया जाए और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण शिक्षण अधिगम सामग्री का इंटरैक्टिव कॉर्नर रहा। यहां स्कूल के शिक्षकों को प्रशिक्षु शिक्षकों की ओर से तैयार सामग्री देखने और उसका इस्तेमाल समझने का अवसर मिला।
जामिया के प्रशिक्षु शिक्षकों ने प्रत्येक सामग्री का उद्देश्य समझाया और कक्षा में उसके उपयोग का प्रदर्शन किया। इन गतिविधियों के माध्यम से बताया गया कि बहु संवेदी शिक्षण पद्धति में अलग अलग इंद्रियों को शामिल कर पढ़ाई को अधिक संवादात्मक बनाया जा सकता है। इससे बच्चों की भागीदारी और समझ बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
स्कूल के शिक्षकों ने सामग्री में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने उसे इस्तेमाल करके देखा और कक्षा में इसके उपयोग को लेकर सवाल भी पूछे। खास तौर पर पढ़ने, लिखने, वर्तनी और अन्य शैक्षणिक कार्यों में कठिनाई महसूस करने वाले बच्चों के लिए इन सामग्रियों की उपयोगिता पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम में क्विक न्यूरोलॉजिकल स्क्रीनिंग टेस्ट यानी क्यूएनएसटी-II का परिचय भी कराया गया। प्रशिक्षु शिक्षकों ने इसके उद्देश्य और शैक्षणिक क्षेत्र में संभावित उपयोग के बारे में जानकारी दी।
शिक्षकों को बताया गया कि संरचित स्क्रीनिंग गतिविधियों के माध्यम से बच्चे की कुछ क्षमताओं और कार्यप्रणाली से जुड़े ऐसे संकेतों पर ध्यान दिया जा सकता है, जिनके लिए आगे जांच की जरूरत हो सकती है।
सत्र में स्पष्ट किया गया कि क्यूएनएसटी-II एक स्क्रीनिंग टूल है। यह डिस्लेक्सिया या किसी अन्य अधिगम अक्षमता का निदान करने वाला टेस्ट नहीं है। इसके इस्तेमाल और नतीजों की व्याख्या के लिए उचित प्रशिक्षण जरूरी है। केवल स्क्रीनिंग के आधार पर किसी बच्चे में डिस्लेक्सिया की पुष्टि नहीं की जा सकती। जरूरत होने पर प्रशिक्षित विशेषज्ञ से विस्तृत आकलन कराना महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम के अंत में औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन किया गया। इसमें स्कूल की प्रधानाचार्य, उप प्रधानाचार्य, स्कूल इंचार्ज, जामिया के शिक्षकों, कोऑर्डिनेटरों, सामान्य शिक्षकों, विशेष शिक्षकों और आयोजन में सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार जताया गया।
यह जागरूकता कार्यक्रम शिक्षक प्रशिक्षुओं, सामान्य शिक्षकों और विशेष शिक्षकों के बीच सहयोग का एक उपयोगी मंच बना। कविता, नाटक, शायरी, शिक्षण सामग्री के प्रदर्शन और स्क्रीनिंग टूल के परिचय के जरिए डिस्लेक्सिया को समझने तथा समावेशी शिक्षण पद्धतियां अपनाने की जरूरत रेखांकित की गई।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के शिक्षक प्रशिक्षण एवं गैर औपचारिक शिक्षा विभाग की यह पहल भावी विशेष शिक्षकों को व्यावहारिक अनुभव देने और स्कूलों के साथ जुड़कर समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास रही।