नई दिल्ली/रामपुर
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का दौरा कर विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त की। प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को ध्वस्त करने के रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के आदेश पर गहरी चिंता जताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से इस कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय प्रशासन, स्थानीय समुदाय के प्रतिनिधियों और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के परिवार के सदस्यों से मुलाकात की। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपकर मामले में हस्तक्षेप की अपील की गई।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के प्रतिनिधिमंडल में संगठन के राष्ट्रीय सचिव मौलाना मोहम्मद शफी मदनी और मोहम्मद अहमद, सहायक सचिव इनाम-उर-रहमान, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद उत्तर प्रदेश पश्चिम के अध्यक्ष जमीर हसन फलाही, रामपुर इकाई के अध्यक्ष मौलाना अब्दुस्सलाम बस्तवी तथा वरिष्ठ पत्रकार सैयद खलीक अहमद शामिल थे।
प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय परिसर का निरीक्षण किया और प्रशासन, शिक्षकों तथा छात्रों से बातचीत कर मौजूदा स्थिति की जानकारी ली।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने अपनी प्रमुख मांगों में सबसे पहले विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को गिराने के आदेश पर तत्काल रोक लगाने की अपील की। संगठन ने कहा कि 30 जुलाई 2026 की निर्धारित समय-सीमा नजदीक है और यदि इस दौरान विध्वंस की कार्रवाई होती है तो इसका सबसे अधिक नुकसान हजारों छात्रों को उठाना पड़ेगा।
संगठन का कहना है कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में छात्रों के शैक्षिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
प्रतिनिधिमंडल ने जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में अनुरोध किया कि वे मामले में हस्तक्षेप करें और हजारों विद्यार्थियों के शिक्षा के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करें।
ज्ञापन में कहा गया कि यह केवल भवनों का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसे शैक्षणिक संस्थान का भविष्य दांव पर है, जहां बड़ी संख्या में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने यह भी मांग की कि विध्वंस के आदेश से जुड़े सभी कानूनी और अधिकार-क्षेत्र संबंधी विवादों का समाधान किसी सक्षम न्यायालय के माध्यम से किया जाए।
संगठन का कहना है कि जब तक न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई से बचा जाना चाहिए। इससे कानून का सम्मान भी बना रहेगा और छात्रों के हित भी सुरक्षित रहेंगे।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि विश्वविद्यालय में लगभग 3,000 छात्र अध्ययन कर रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों से आती है। कई विद्यार्थियों को फीस में रियायत भी दी जाती है।
जमाअत का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय की 40 में से 38 इमारतों को ध्वस्त कर दिया गया, तो संस्थान का अस्तित्व लगभग समाप्त हो जाएगा और हजारों छात्र अपनी शिक्षा जारी रखने से वंचित हो सकते हैं।
संगठन ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संसाधन है और इसका संबंध अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय शिक्षा के माध्यम से समाज की सेवा कर रहा है। यदि इसके भवनों को ध्वस्त किया जाता है तो हजारों युवाओं, विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग के छात्रों की शिक्षा पर गहरा असर पड़ेगा।
प्रतिनिधिमंडल ने अपने बयान में कहा, "हम विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के साथ खड़े हैं। यह केवल इमारतों का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है। सरकार को ध्वस्तीकरण के बजाय नियमितीकरण (रेगुलराइजेशन) जैसे व्यावहारिक विकल्पों पर विचार करना चाहिए, ताकि किसी भी छात्र की पढ़ाई प्रभावित न हो।"
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने अंत में उत्तर प्रदेश सरकार से अपील की कि वह इस मामले में संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाए तथा ऐसा समाधान निकाले जिससे कानून का पालन भी सुनिश्चित हो और हजारों छात्रों का शैक्षणिक भविष्य भी सुरक्षित रह सके।