नागालैंड: पिता बीमार, घर में संकट... फिर भी वाहिदा बेगम और नाहिन परवीन बनी यूनिवर्सिटी टॉपर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 23-07-2026
Nagaland: Father ill, family in crisis... yet Wahida Begum and Nahin Parveen became university toppers.
Nagaland: Father ill, family in crisis... yet Wahida Begum and Nahin Parveen became university toppers.

 

अपर्णा दास/गुवाहाटी।

कुछ सफलताएं केवल अंकों से नहीं मापी जातीं। उनके पीछे संघर्ष की लंबी कहानी होती है। कई रातों की अधूरी नींद होती है। परिवार की चिंता होती है। आर्थिक मुश्किलें होती हैं। फिर भी कुछ लोग हार नहीं मानते। वे अपने सपनों को बचाए रखते हैं। आखिरकार वही लोग दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।

नागालैंड विश्वविद्यालय की वर्ष 2026 की बीकॉम परीक्षा का परिणाम भी ऐसी ही दो बेटियों की कहानी लेकर आया है। बीकॉम ऑनर्स में वाहिदा बेगम तापदार और बीकॉम ऑनर्स एंड रिसर्च में नाहिन परवीन ने विश्वविद्यालय में पहला स्थान हासिल कर यह साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो मंजिल दूर नहीं रहती।

दोनों छात्राओं की पृष्ठभूमि अलग है। संघर्ष अलग है। लेकिन मंजिल एक रही। शिक्षा के दम पर अपनी पहचान बनाना। आज उनकी सफलता केवल एक विश्वविद्यालय के रिजल्ट तक सीमित नहीं है। यह हजारों विद्यार्थियों के लिए उम्मीद की नई रोशनी बन गई है।

असम के करीमगंज की रहने वाली वाहिदा बेगम तापदार का बचपन दीमापुर में बीता। शुरुआती शिक्षा सेंट मैरी हायर सेकेंडरी स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने क्रिश्चियन हायर सेकेंडरी स्कूल से उच्च माध्यमिक की पढ़ाई पूरी की। फिर एमजीएम कॉलेज में बीकॉम ऑनर्स में प्रवेश लिया। नई एफवाईयूजीपी व्यवस्था लागू होने के बाद उन्होंने सातवें और आठवें सेमेस्टर की पढ़ाई दीमापुर के पब्लिक कॉलेज से पूरी की। यहीं से उन्होंने नागालैंड विश्वविद्यालय में पहला स्थान हासिल किया।

यह उपलब्धि उनके लिए आसान नहीं थी। पढ़ाई शुरू होते ही परिवार पर बड़ा संकट आ गया। उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें क्रॉनिक किडनी डिजीज है। इलाज के लिए परिवार को चेन्नई और कोलकाता तक जाना पड़ा। लगभग दो महीने तक वाहिदा कॉलेज नहीं जा सकीं।

सामान्य छात्र शायद ऐसी स्थिति में पढ़ाई छोड़ देता। लेकिन वाहिदा ने ऐसा नहीं किया। अस्पताल के कमरों और सफर के बीच भी उन्होंने किताबों का साथ नहीं छोड़ा। कॉलेज लौटने के बाद शिक्षकों ने उन्हें अतिरिक्त समय दिया। हर विषय समझाया। परिवार ने भी उनका हौसला बनाए रखा।

वाहिदा कहती हैं कि उन्होंने कभी रटकर पढ़ाई नहीं की। उनका मानना है कि यदि किसी विषय को गहराई से समझ लिया जाए तो उसे लंबे समय तक याद रखा जा सकता है। परीक्षा में वही समझ अच्छे उत्तर लिखने में मदद करती है। यही तरीका उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

कॉलेज की कई प्रैक्टिकल कक्षाएं बीमारी के कारण छूट गई थीं। उन्होंने हार मानने के बजाय तकनीक का सहारा लिया। यूट्यूब पर वीडियो देखकर प्रैक्टिकल की तैयारी पूरी की। उन्होंने यह भी माना कि आज के समय में सही तरीके से तकनीक का उपयोग विद्यार्थियों के लिए बड़ी ताकत बन सकता है।

वाहिदा पहले भी मेधावी छात्रा रही हैं। उच्च माध्यमिक परीक्षा में 91 प्रतिशत अंक प्राप्त कर उन्होंने मेरिट छात्रवृत्ति हासिल की थी। अब उनका लक्ष्य नौकरी के साथ बीएड करना है ताकि शिक्षा के क्षेत्र में भी योगदान दे सकें।

शिक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि नागालैंड में वाणिज्य शिक्षा का स्तर पहले से बेहतर हुआ है। फिर भी उद्योगों से जुड़ाव, इंटर्नशिप, रिसर्च और डिजिटल स्किल्स पर अधिक काम करने की जरूरत है। उनका मानना है कि आज की पढ़ाई केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसे रोजगार और व्यवहारिक अनुभव से जोड़ना होगा।

महिला शिक्षा को लेकर उनकी सोच भी बेहद स्पष्ट है। उनका कहना है कि जब एक लड़की पढ़ती है तो केवल उसका जीवन नहीं बदलता बल्कि पूरा परिवार मजबूत होता है। शिक्षित महिला आत्मनिर्भर बनती है। वह अपने अधिकारों को बेहतर तरीके से समझती है और समाज में सम्मान के साथ आगे बढ़ती है।

दूसरी ओर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के छोटे से गांव रिपुरा की रहने वाली नाहिन परवीन की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं है। उनका पालन पोषण दीमापुर में हुआ। शुरुआती पढ़ाई असेंबली ऑफ गॉड हायर सेकेंडरी स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने होली क्रॉस हायर सेकेंडरी स्कूल से बारहवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद दीमापुर के पब्लिक कॉलेज में बीकॉम ऑनर्स एंड रिसर्च में दाखिला लिया और विश्वविद्यालय की टॉपर बन गईं।

नाहिन के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक थी। पिता का कारोबार बंद हो चुका था। घर की आय सीमित हो गई थी। ऐसे समय उन्होंने पढ़ाई के साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। सुबह कॉलेज जातीं। शाम को ट्यूशन लेतीं। रात में अपनी पढ़ाई करतीं। यही उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बन गई।

उनके भीतर एक सपना लगातार जीवित रहा। वह अपने पिता का बंद पड़ा कारोबार फिर से शुरू करना चाहती हैं। यही सपना उन्हें कॉमर्स की पढ़ाई की ओर लेकर आया। वह मानती हैं कि बिजनेस की सही समझ और प्रबंधन की शिक्षा के जरिए वह अपने परिवार को फिर से आर्थिक मजबूती दे सकती हैं।

सफलता की राह में बीमारी ने भी उनका रास्ता रोका। छठे सेमेस्टर के दौरान वह खुद गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। उसी समय उनके ट्यूशन पढ़ने वाले विद्यार्थियों की परीक्षाएं भी थीं। अपनी पढ़ाई और छात्रों की जिम्मेदारी दोनों साथ निभाना आसान नहीं था।

इस कठिन दौर में उनकी मां ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। खुद अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने घर की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली ताकि बेटी बिना किसी चिंता के पढ़ाई कर सके। नाहिन मानती हैं कि यह सफलता केवल उनकी नहीं बल्कि उनके माता पिता के त्याग और विश्वास का परिणाम है।

जब विश्वविद्यालय में पहला स्थान मिलने की जानकारी मिली तो उन्हें कुछ देर तक विश्वास ही नहीं हुआ। उन्हें उम्मीद थी कि मेरिट सूची में स्थान मिलेगा लेकिन प्रथम स्थान की कल्पना नहीं की थी। माता पिता की आंखों में खुशी के आंसू देखकर उन्हें लगा कि वर्षों की मेहनत आखिर रंग ले आई।

भविष्य को लेकर नाहिन का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है। वह एमबीए करना चाहती हैं। इसके बाद सफल उद्यमी बनकर अपने पिता के कारोबार को नई पहचान देना चाहती हैं। उनका मानना है कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह परिवार और समाज दोनों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सके।

आज के विद्यार्थियों के लिए उनका संदेश भी बेहद सरल है। वह कहती हैं कि समय सबसे बड़ी पूंजी है। उसकी कीमत समझिए। दूसरों से अपनी तुलना मत कीजिए। रोज थोड़ा पढ़िए। नियमित दोहराइए। विनम्र बने रहिए। सफलता अपने समय पर जरूर मिलेगी।

नागालैंड विश्वविद्यालय का यह परिणाम केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि पूर्वोत्तर भारत में शिक्षा का स्तर लगातार मजबूत हो रहा है। यहां के कॉलेज और विश्वविद्यालय अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाएं तैयार कर रहे हैं। खासकर मुस्लिम छात्राओं और बेटियों की बढ़ती भागीदारी सामाजिक बदलाव का सकारात्मक संकेत है।

आज देश में महिला शिक्षा, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और आत्मनिर्भर भारत जैसे विषयों पर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे समय में वाहिदा बेगम तापदार और नाहिन परवीन जैसी छात्राएं इन अभियानों को वास्तविक अर्थ देती हैं। उन्होंने यह दिखाया कि संसाधनों की कमी या पारिवारिक संकट किसी भी विद्यार्थी के सपनों की अंतिम सीमा नहीं होते।

दो अलग राज्यों से आई इन दोनों छात्राओं ने नागालैंड को अपनी शिक्षा की कर्मभूमि बनाया। उन्होंने मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के बल पर विश्वविद्यालय में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। उनकी सफलता आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। यह संदेश भी है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो तो सफलता एक दिन जरूर मिलती है।

उनकी कहानी केवल दो टॉपर्स की कहानी नहीं है। यह हर उस विद्यार्थी की कहानी है जो कठिन हालात के बीच भी अपने भविष्य को बेहतर बनाने का सपना देख रहा है। यही वजह है कि आज वाहिदा और नाहिन केवल विश्वविद्यालय की टॉपर नहीं हैं बल्कि संघर्ष, शिक्षा और उम्मीद की नई पहचान बन चुकी हैं।

AEO FAQ

प्रश्न: नागालैंड विश्वविद्यालय बीकॉम 2026 में टॉपर कौन बनीं।
उत्तर: बीकॉम ऑनर्स में वाहिदा बेगम तापदार और बीकॉम ऑनर्स एंड रिसर्च में नाहिन परवीन ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

प्रश्न: वाहिदा बेगम तापदार की सफलता की सबसे बड़ी वजह क्या रही।
उत्तर: कठिन पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद लगातार पढ़ाई, शिक्षकों का सहयोग और विषय को समझकर अध्ययन करना उनकी सफलता का आधार रहा।

प्रश्न: नाहिन परवीन ने पढ़ाई के दौरान किन चुनौतियों का सामना किया।
उत्तर: आर्थिक संकट, पिता का बंद कारोबार, ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई का खर्च उठाना और बीमारी जैसी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने विश्वविद्यालय में पहला स्थान हासिल किया।

प्रश्न: दोनों छात्राओं का भविष्य का लक्ष्य क्या है।
उत्तर: वाहिदा बीएड कर शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं जबकि नाहिन एमबीए के बाद अपने पिता का कारोबार दोबारा शुरू करना चाहती हैं।

प्रश्न: यह सफलता क्यों खास मानी जा रही है।
उत्तर: दोनों छात्राओं ने विपरीत परिस्थितियों में मेहनत और शिक्षा के बल पर नागालैंड विश्वविद्यालय में शीर्ष स्थान हासिल कर हजारों विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा प्रस्तुत की।