डॉ. फ़िरदौस ख़ान
मानव सभ्यता का इतिहास कुछ ऐसा है कि दुनिया के विभिन्न देशों में जन्मे और पनपे धर्मों में कहीं न कहीं कोई न कोई समानता देखने को मिल ही जाती है। भले ही उनकी आस्था अलग हो, उनके रीति-रिवाज अलग हों, उनकी भाषा अलग हो, उनका रहन-सहन और खानपान अलग हो। फ़िलहाल हम यहां मुहर्रम की बात कर रहे हैं, जो काफ़ी हद तक दशहरे से मिलता-जुलता है।
हालांकि मुहर्रम और दशहरा दोनों ही अलग-अलग धर्मों से संबंधित हैं। दोनों का आधार नैतिक मूल्य हैं और दोनों ही बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि मुहर्रम शोक का अवसर है और दशहरा हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

मुहर्रम में अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्यारे नवासे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और कर्बला के दीगर शहीदों को याद कर उनका ग़म मनाया जाता है। यह सच के लिए उनके समर्पण और उनकी क़ुर्बानी की याद दिलाता है कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने ख़ानदान के लोगों और साथियों के साथ शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने ज़ालिम यज़ीद की अधीनता स्वीकार नहीं की।
यह संदेश देता है कि अपनी जान क़ुर्बान कर दो, लेकिन सच का रास्ता कभी मत छोड़ो। कर्बला में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काफ़िले में कुल 123लोग थे, जिनमें मासूम बच्चे, औरतें, बूढ़े और बीमार लोग भी शामिल थे।
ये सब निहत्थे थे और इसके बरअक्स यज़ीद की हथियारों से सुसज्जित ताक़तवर बड़ी फ़ौज थी। दोनों में कोई मुक़ाबला नहीं था। एक तरफ़ चन्द लोगों के पास सच की ताक़त थी, तो दूसरी तरफ़ बड़ी फ़ौज और ज़ुल्म की इन्तेहा थी। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सजदे में अपनी जान क़ुर्बान करके अपने नाना के दीन को ज़िन्दा रखा।
दशहरा अत्याचारी रावण पर राम की विजय का प्रतीक है। एक तरफ़ रावण की शक्तिशाली सेना थी, तो दूसरी तरफ़ राम की वानरों की छोटी-सी सेना थी। यह याद दिलाता है कि बुराई कितनी भी ताक़तवर क्यों न हो, लेकिन आख़िर में जीत सच्चाई की ही होती है।
मुहर्रम और दशहरे में एक समानता यह भी है कि दोनों ही मौक़ों पर जुलूस निकाते जाते हैं, प्रतीक बनाए जाते हैं और उनकी आख़िरी रस्म भी अदा की जाती है। शिया कर्बला के वाक़िये की याद में जुलूस निकालते हैं। इस दौरान वे काला लिबास पहनते हैं।
जुलूस में अलम यानी परचम भी होते हैं। इन्हें हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के उस परचम की याद में बनाया जाता है, जो कर्बला में उनकी फ़ौज का प्रतीक था। जुलूस में जो परचम होता है, उस पर पंजे का निशान होता है।
इस निशान का ताल्लुक़ पंजतन पाक से है यानी अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, उनके दामाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम, उनकी प्यारी बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलाम उल्लाह अलैहा, उनके प्यारे नवासे हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम और हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम। अलम बांस से बनाया जाता है। कई अलम बहुत बड़े होते हैं, जिन्हें कई लोग पकड़ते हैं। बहुत से अलम छोटे भी होते हैं, जिन्हें एक व्यक्ति आसानी से पकड़ लेता है। बड़ा अलम थामे लोग जुलूस में आगे चलते हैं।
जुलूस में घोड़ा भी होता है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के घोड़े का नाम ज़ुलजनाह था। इसलिए जुलूस के लिए बहुत ही अच्छे घोड़े का इंतख़ाब किया जाता है। घोड़े को सजाते हैं और उसकी पीठ पर एक साफ़ा रखा जाता है। चूंकि यह हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का घोड़ा माना जाता है, इसलिए इसका बहुत ही अच्छी तरह ख़्याल रखा जाता है। उसे दूध जलेबी भी खिलाई जाती है। मुहर्रम के दौरान किसी को इस पर सवारी करने की इजाज़त नहीं होती।
जुलूस में तुर्बतें भी होती हैं। तुर्बत का मतलब है क़ब्र। कर्बला के शहीदों की याद में तुर्बतें बनाई जाती हैं। ताज़िये में दो तुर्बतें रखी जाती हैं। एक तुर्बत हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की याद में होती है। इसका रंग सब्ज़ होता है, क्योंकि उन्हें ज़हर देकर शहीद किया गया था।
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तुर्बत सुर्ख़ रंग की होती है, क्योंकि उन्हें सजदे की हालत में शहीद किया गया था और उनका जिस्म ख़ून से सुर्ख़ हो गया था। जुलूस में एक गहवारा यानी पालना भी होता है। यह हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के छह महीने के बेटे अली असग़र की शहादत की याद में होता है, जिन्हें तीन नोक वाला तीर मारकर शहीद कर दिया गया था।
जुलूस में एक अम्मारी यानी पहरेदार होता है। यह कर्बला में मौजूद महिलाओं की याद में मुहर्रम की आठ तारीख़ को निकाला जाता है। इसी तारीख़ को जुलूसे-अज़ा निकाला जाता है। अज़ा का मतलब है तकलीफ़। इसमें अज़ादारी से वाबस्ता चीज़ें होती हैं। लोग इन चीज़ों को देख-देखकर रोते हैं।
इनके सामने मरसिये और नौहे पढ़े जाते हैं। इस दौरान लोग अपने हाथों को सीने पर मारकर मातम करते हैं। बहुत से लोग ज़ंजीरों और तलवारों से ख़ुद को ज़ख़्मी करते हैं और ‘या हुसैन, या हुसैन’ कहते जाते हैं। बहुत जगहों पर लोग दहकते हुए अंगारों पर चलते हैं। ख़ास बात यह है कि उनके पैर ज़र्रा बराबर भी आग में नहीं झुलसते।
आशूरा यानी मुहर्रम की दस तारीख़ को ताज़िया निकाला जाता है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रोज़े के प्रतीक को ताज़िया कहा जाता है। यह लकड़ी, अबरक और रंग-बिरंगे काग़ज़ से बनाया जाता है। इसका कोई एक आकार नहीं होता। कारीगर अपनी-अपनी कल्पना के हिसाब से इसे बनाते हैं। ज़्यादातर ताज़ियों में गुम्बद बनाया जाता है। शाम को ताज़िये ज़मीन में दफ़न कर दिए जाते हैं।
दशहरे से पहले रामलीलाओं का आयोजन किया जाता है। इस दौरान रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतले बनाए जाते हैं। दशहरे के दिन शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। शाम को राम के वेशधारी द्वारा अग्निबाण से इनका दहन किया जाता है। पश्चिम बंगाल में विजयदशमी पर देवी दुर्गा की शोभायात्राएं निकाली जाती हैं और बाद में देवी की प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है।

मुहर्रम में मजालिस के बाद तबर्रुक बांटा जाता है। तबर्रुक में मलीदा, मीठी रोटी, जलेबी, लड्डू, ज़र्दा और बिरयानी भी बांटी जाती है। आजकल वेज बिरयानी बांटने का चलन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है, ताकि शाकाहारी लोग भी इसे खा सकें। मुहर्रम में शर्बत की सबीलें भी लगाईं जाती हैं। इसी तरह दशहरे पर भंडारा लगाया जाता है और शीतल पेय आदि वितरित किया जाता है।
मुहर्रम और दशहरे में एक एक समानता और भी है, जो गंगा जमुनी संस्कृति की प्रतीक है। उत्तर भारत में मुहर्रम के जुलूस में हिन्दू भी शामिल होते हैं। हिन्दू लोग ख़ासकर महिलाएं ताज़ियों को छूकर मन्नतें मांगती हैं। हुसैनी ब्राह्मण नामक हिन्दू समुदाय कर्बला के शहीदों की याद में शोक मनाता है। फ़िल्म अभिनेता सुनील दत्त इसी समुदाय से थे।
इसी तरह देश के कई इलाक़ों में मुसलमान भी दशहरे में शामिल होते हैं। कई जगह मुसलमान कलाकार के रूप में रामलीलाओं में शिरकत करते हैं, तो कई जगह पुतले बनाने वाले मुख्य कारीगर के रूप में शामिल होते हैं। इसके अलावा इनके आयोजन की समिति में भी मुसलमान शामिल होते हैं और प्रबंधन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
मुहर्रम और दशहरा दोनों ही बुराई पर सच्चाई की जीत का प्रतीक हैं और हमें सच के साथ खड़े रहने का संदेश देते हैं। दोनों ही मौक़ों पर राहगीरों को खाना खिलाने और पानी पिलाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है, जिससे ज़रूरतमंदों की मदद करने की प्रेरणा मिलती है।
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)