राकेश चौरासिया / नई दिल्ली
दीपावली प्रकाश का पर्व है. यह मूलतः भारतीय उपमहाद्वीप का सर्वोच्च त्योहार है, जो अब समूचे विश्व की संस्कृति का अंग बन चुका है,. भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक के रूप में भारतवंशी विश्व के कोने-कोने में फैल चुके हैं और अब वे वहां भी दीपावली का त्यौहार धूमधाम से मनाने लगे हैं. दिवाली पर घरों की सज्जा, रोशनी, आतिशबाजी, मिठाईयां और पकवान के साथ उमंग व उल्लास भरा वातावरण इतना विविध होता है कि अन्य मतालंबी भी इसके आकर्षण के जादुई पाश से मुक्त नहीं रह पाते हैं और दिवाली के सतरंगी एवं सात्विक आनंद में डूब जाते हैं. यह त्योहार अवगुणों और बुराई के प्रतीक राक्षस ‘रावण’ पर, पुरुषों की पुरुषों की मर्यादा का सूत्रपात करने वाले प्रभु ‘श्री राम’ के द्वारा सत्य की विजय के रूप में लोकमानस का अंग बन चुका है. यहां तक कि यह पर्व अब अमेरिका, रूस, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, मालदीव आदि देशों और महाद्वीपों में उल्लास पूर्वक मनाया जाता है.

भारत में मुस्लिम भाई भी उल्लासपूर्वक इस त्योहार में शिरकत करते हैं. वे ईद पर हिंदू भाईयों को दावत देते हैं, तो दिवाली पर मुस्लिम भाईयों के परिवारों में मिठाईयां वितरित की जाती हैं. निजामुद्दीन ओलिया, हाजी अली जैसी देश की प्रमुख दरगाहों में दिवाली के दिन दीपक भी जलाए जाते हैं. मुस्लिम भाईयों के परिवार आतिशबाजी और पटाखों तथा गृह सज्जा के लिए नाना प्रकार के अलंकरणों का निर्माण करके दिवाली का अभिन्न अंग बन चुके हैं. मुगल काल से ही कुछ मुस्लिम परिवार आतिशबाजी और मिठाईयों का आनंद उठाकर भारतीय समाज के इस महाउल्लास में समरस हो चुके हैं.

संस्कृत शब्द ‘दीपावली’ से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है रोशनी की एक पंक्ति. जब रावण पर विजय करके प्रभु श्री राम गृहनगर अयोध्या लौटे, तो पुर वासियों ने दीपकों से पूरे नगर को सजाया था, जो कालजयी परिघटना बन गई और उसी चिर स्मरण पर्व को अब तक भी परंपरा के रूप में मनाया जाता है. भगवान राम द्वारा रावण (दशहरा) को मारने और सीता को लंका में कैद से छुड़ाने के 20 दिन बाद दिवाली मनाई जाती है. यह उत्सव 14 साल के वनवास के बाद भगवान राम की अयोध्या वापसी का प्रतीक है. भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के स्वागत के लिए, पूरे शहर को सजाया गया था और लोगों ने अपने राजा के स्वागत के लिए शहर को दीयों (मिट्टी के दीयों) से सजाया था.
यह पांच दिवसीय त्योहार धनतेरस से शुरू होता है, जो सौभाग्य, धन और समृद्धि का जश्न मनाता है और स्वागत करता है. धनतेरस पर लोग आभूषण और बर्तन खरीदते हैं, क्योंकि माना जाता है कि किसी भी प्रकार की धातु दुर्भाग्य को दूर करती है और धन और समृद्धि की शुरूआत करती है. धनतेरस के अधिदेव भगवान धन्वंतरि हैं, जो संपूर्ण आरोग्य प्रदान करने वाले आयुर्वेद के जनक हैं और माता लक्ष्मी के भाई हैं. लोक विश्वास है कि धन्वंतरि महाराज की पूजा से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और गृहस्थों को कभी लक्ष्मी का अभाव नहीं रहता है. धनतेरस के बाद छोटी दिवाली, दिवाली की पूजा होती है, जिसे भगवान यम की स्मृति में मनाया जाता है. फिर अगले दिवाली मनाते हैं. मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीराम 14 साल के बाद वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे. एक अन्य मान्यता है कि दिवाली के दिन ही मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं. इस कारण इस दिन लक्ष्मी पूजन किया जाता है. जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि इस दिन भगवान विष्णु संग मां लक्ष्मी का विवाह हुआ था. दिवाली की शाम को उत्तम मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश और भगवान कुबेर की पूजा का विशेष महत्व है. उसके अगले दिन धन-धान्य के दाता गोवर्धन महाराज की पूजा होती है और अंत में, भाई दूज इस त्योहार के समापन का प्रतीक है. भाईदूज पर बहनें अपने भाईयों को वीर तिलक करके उनकी चिरायु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं.
‘स्वच्छता में लक्ष्मी का वास होता है’ और इसे दिवाली मनाने वाले लोगों से बेहतर कोई नहीं समझा सकता. लोगों द्वारा अपने घरों और कार्यालयों की सफाई और रंग-रोगन किया जाता है. इस भव्य उत्सव की तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती है. फिर वे अपने स्थानों को फूल, दीपक, रोशनी और रंगोली से सजाते हैं.

भारत में अन्य सभी त्योहारों की तरह, दीवाली में भोजन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. स्वादिष्ट मिठाइयों या पकवानों से हर घर महकने लगता है. बहुत सारे लोग अपने दोस्तों और परिवारों को आने वाले दिनों के लिए शुभकामनाएं और समृद्धि की कामना करने के लिए मिठाई भी उपहार में देते हैं. उत्सव की शुरुआत धनतेरस पर आभूषण और बर्तन खरीदने वाले लोगों के साथ होती है. यह किसी भी प्रकार की धातु को खरीदने का एक शुभ अवसर है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह बुराई को दूर करता है और समृद्धि लाता है. अगले दो दिन छोटी दिवाली और दीवाली इस त्योहार के सबसे बहुप्रतीक्षित दिन हैं, जब लोग सबसे अधिक आनंदित होते हैं. पूजा करने और देवताओं को प्रार्थना करने के बाद शाम की शुरुआत होती है. इसके बाद लोग दीया जलाते हैं और पटाखे फोड़ते हैं. पूरा माहौल उत्सव के स्वर में गूंजता है.

हालाँकि दिवाली पर पटाखे फोड़ने की परंपरा है, लेकिन वायु प्रदूषण में वृद्धि के कारण हमें अब न्यूनतम आतिशबाजी का प्रयोग करना चाहिए. हमें दिवाली को पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाने और प्रकृति का सम्मान करने का लक्ष्य रखना चाहिए. पटाखे फोड़ने के बजाय, हम दीये जला सकते हैं, अपने घर और आसपास को परियों की रोशनी से सजा सकते हैं और दोस्तों और परिवार के साथ एक जादुई शाम बिता सकते हैं.
इस बार वर्ष 2022 की दिवाली 24 अक्टूबर को मनाई जाएगी, इसका मुहूर्त 06.53 सायं बजे से शुरू होगा. दवाली के दिन शाम को शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश पूजन किया जाता है. यह त्योहार हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है. इस साल अमावस्या तिथि 24 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 27 मिनट से प्रारंभ होगी, जो कि 25 अक्टूबर को शाम 04 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगी.
दीपावली 2022 लक्ष्मी पूजन मुहूर्त शाम 06 बजकर 53 मिनट से रात 08 बजकर 16 मिनट तक रहेगा. लक्ष्मी पूजन की अवधि 1 घंटा 23 मिनट की है. प्रदोष काल - 05.43 सायं से 08.16 सायं तक और वृषभ काल - 06.53 पी एम से 08.48 सायं तक रहेगा. लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल वृषभ लग्न और सिंह लग्न में करना श्रेयस्कर होगा. काली पूजा अमावस्या की मध्य रात्रि में करना श्रेष्ठ है. राशियों के अनुरूप पूजन करने से आपके अधूरे कार्य पूरे होंगे. महानिशिथ काल रात्रि 11.35 बजे से 12.26 बजे तक (काली पूजा तथा तांत्रिक पूजा के लिए ) है.

दिवाली पूजन में शंख, कमल का फूल, गोमती चक्र, धनिया के दाने, कच्चा सिंघाड़ा, मोती व कमलगट्टे का माला आदि शामिल करना चाहिए. दीपावली पर दक्षिणावर्तीं शंख, श्री यंत्र, गोमती चक्र, मां लक्ष्मी, कुबेर यंत्र, हल्दी की गांठ और छोटा नारियल के साथ पूजन करना चाहिए.
दीपावली के दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु के निमित्त दीपक प्रज्वलित करें. घूप, दीप, चंदन, भोग लगाएं, हवन करें और आरती करें. महाकाली पूजा से मनोकामनाओं की पूर्ति और शत्रु भय से मुक्ति के साथ मुकदमे में विजय प्राप्त होती है. लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल, वृषभ लग्न और सिंह लग्न में करना श्रेयस्कर होगा. काली पूजा अमावस्या की मध्य रात्रि में करना श्रेष्ठ है. राशियों के अनुरूप पूजन करने से आपके अधूरे कार्य पूरे होंगे. आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि राशियों के अनुरूप पुष्प व प्रसाद चढ़ाना चाहिए.
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥
ॐ श्रीं श्रीयै नमरू
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः॥
इन घरों में होता है मां लक्ष्मी का वासः
मां लक्ष्मी दिवाली पर उन घरों में प्रवेश करती हैं, जहां साफ-सफाई हो और प्रतिदिन पूजा-पाठ होता है.