आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
घरेलू इस्पात क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में असमानता और कच्चे माल की सुरक्षा से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बृहस्पतिवार को जारी आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश की।
सरकारी दस्तावेज के अनुसार, इस्पात क्षेत्र औद्योगीकरण एवं अवसंरचना की रीढ़ है जो भारत को विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कच्चे इस्पात का उत्पादक बनाता है। निर्माण और विनिर्माण क्षेत्रों से मजबूत घरेलू मांग से पिछले पांच वर्ष में इस क्षेत्र में व्यापक बदलाव आया है।
समीक्षा कहती है, ‘‘ हालांकि, इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मूल्य असमानता और कच्चे माल की सुरक्षा से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-अक्टूबर) के दौरान इस्पात का शुद्ध आयातक रहा जिसका मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम कीमतें रहीं। इसके चलते निर्यात पर मुनाफा कम हुआ और आयात सस्ता हुआ।’’
भारत लौह अयस्क के मामले में हालांकि काफी हद तक आत्मनिर्भर है लेकिन उद्योग को आयातित कोकिंग कोयले पर गंभीर निर्भरता का सामना करना पड़ता है।
वैश्विक आपूर्ति जोखिमों को कम करने के लिए कोयला मंत्रालय ने 2022 में मिशन कोकिंग कोल की शुरुआत की। इसका उद्देश्य 2030 तक घरेलू कच्चे कोकिंग कोयले के उत्पादन को बढ़ाकर 14 करोड़ टन करना था। विशेष इस्पात के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भी 2021 में 6,322 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ शुरू की गई ताकि इस क्षेत्र की वृद्धि को बनाए रखा जा सके और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सके। अक्टूबर, 2025 तक पीएलआई योजना के तहत संचयी निवेश 23,022 करोड़ रुपये तक पहुंच गया जिसमें 23.4 लाख टन विशेष इस्पात का उत्पादन हुआ।
वित्त वर्ष 2025-26 में, कच्चे इस्पात उत्पादन में सालाना आधार पर 11.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि तैयार इस्पात उत्पादन 10.8 प्रतिशत बढ़ा। साथ ही खपत में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई।