MENA must classify AI data centres as critical loads, overhaul power planning amid rising demand: WEF
नई दिल्ली
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) के देशों से कहा है कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटरों को "क्रिटिकल डायनेमिक लोड" (महत्वपूर्ण गतिशील भार) के रूप में वर्गीकृत करें और अपनी ऊर्जा योजना में बड़ा बदलाव लाएं। फोरम ने चेतावनी दी है कि बिजली की बढ़ती मांग, पानी की कमी और अत्यधिक गर्मी, इस क्षेत्र के AI इंफ्रास्ट्रक्चर का ग्लोबल हब बनने के सपनों के लिए खतरा पैदा कर सकती है। अपनी रिपोर्ट में, WEF ने कहा है कि 2030 तक इस क्षेत्र की बिजली क्षमता में 40 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा अनुमानों के अनुसार इसमें केवल 15 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी होने की संभावना है। इससे यह चिंता पैदा होती है कि क्या बिजली प्रणालियां, बहुत अधिक ऊर्जा खपत करने वाली AI सुविधाओं के तेजी से विस्तार को संभाल पाएंगी।
रिपोर्ट में कहा गया है, "अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार कैसे किया जाए, बल्कि यह है कि इसे बड़े पैमाने पर कुशलतापूर्वक, टिकाऊ तरीके से और मजबूती के साथ कैसे किया जाए।" रिपोर्ट में सरकारों को सलाह दी गई है कि वे AI डेटा सेंटरों को पारंपरिक औद्योगिक और व्यावसायिक बिजली उपभोक्ताओं से अलग श्रेणी में रखें। साथ ही, ऊर्जा की मांग का अनिवार्य पूर्वानुमान (forecast) पेश करें और डेवलपर्स, बिजली कंपनियों, ग्रिड ऑपरेटरों तथा नियामकों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिए तंत्र बनाएं। इसमें यह भी सुझाव दिया गया है कि 10 मेगावाट से अधिक IT लोड वाले डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स को ग्रिड-कनेक्शन के लिए आवेदन करते समय बिजली की मांग का विस्तृत पूर्वानुमान देना होगा।
रिपोर्ट में AI वर्कलोड के कारण बढ़ते दबाव पर प्रकाश डाला गया है। पारंपरिक वेब वर्कलोड में 3-10 किलोवाट बिजली की खपत होती है, जबकि AI सर्वर रैक 30 से 100 किलोवाट तक बिजली की खपत करते हैं। बिजली की मांग में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव से बिजली ग्रिड अस्थिर हो सकते हैं, खासकर तब जब कई सुविधाएं एक साथ ग्रिड से अलग हो जाएं या फिर से जुड़ जाएं। पानी और कूलिंग (ठंडा रखने) की जरूरतें एक और बड़ी चुनौती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र के डेटा सेंटरों में कुल बिजली खपत का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल कूलिंग में खर्च होता है। वहीं, अत्यधिक तापमान और पानी की सीमित उपलब्धता के कारण परिचालन लागत (ऑपरेटिंग कॉस्ट) और संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है।
इन जोखिमों से निपटने के लिए, WEF ने चार क्षेत्रों में कदम उठाने का सुझाव दिया है: बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन, एकीकृत ऊर्जा प्रणालियां, उन्नत कूलिंग और जल प्रबंधन, तथा भविष्य को ध्यान में रखने वाले नियम-कानून। इसमें बैटरी स्टोरेज के साथ सौर ऊर्जा के अधिक उपयोग, मौके पर ही बिजली उत्पादन (ऑन-साइट जनरेशन), AI-आधारित ऊर्जा प्रबंधन, क्लोज्ड-लूप कूलिंग सिस्टम और उपचारित अपशिष्ट जल (treated wastewater) के इस्तेमाल की सिफारिश की गई है। छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर और उन्नत भू-तापीय प्रणालियाँ (geothermal systems) लंबे समय के लिए बिजली के समाधान दे सकती हैं, हालाँकि इनकी व्यावसायिक व्यवहार्यता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 'बिहाइंड-द-मीटर' बिजली उत्पादन, यूटिलिटी ग्रिड कनेक्शन पर निर्भरता को कम करके डेटा सेंटर लगाने की प्रक्रिया में 12-36 महीनों की तेजी ला सकता है। इसमें क्षेत्रीय सरकारों से यह भी आग्रह किया गया है कि वे बुनियादी ढाँचे की कार्यक्षमता और निवेश के प्रति भरोसे को बेहतर बनाने के लिए नियामक मानकों में तालमेल बिठाएँ और सीमा-पार सहयोग को बढ़ावा दें। रिपोर्ट के अनुसार, ये सुझाव अगले पाँच वर्षों के लिए एक कार्य-ढाँचा प्रदान करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि AI-आधारित माँग बढ़ रही है, और बिजली आपूर्ति, कूलिंग तथा नियमन से जुड़े फैसले इस क्षेत्र की डिजिटल प्रतिस्पर्धात्मकता को काफी हद तक तय कर रहे हैं।