आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
स्थानीय शेयर बाजारों में सोमवार को लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में गिरावट जारी रही और बीएसई सेंसक्स 1,313 अंक लुढ़क गया जबकि एनएसई निफ्टी 24,000 अंक के नीचे आ गया। अमेरिका और ईरान के शांति समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहने के बाद कच्चे तेल के दाम में तेजी के बीच बाजार में गिरावट आई।
तीस शेयरों पर आधारित बीएसई सेंसेक्स 1,312.91 अंक यानी 1.70 प्रतिशत टूटकर 76,015.28 अंक पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान यह 1,370.79 अंक तक लुढ़क गया था।
पचास शेयरों पर आधारित एनएसई निफ्टी 360.30 अंक यानी 1.49 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,815.85 अंक पर बंद हुआ।
पिछले बृहस्पतिवार से शुरू तीन कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स लगभग 1,950 अंक यानी 2.5 प्रतिशत टूटा है जबकि निफ्टी 515 अंक यानी दो प्रतिशत से अधिक के नुकसान में रहा।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नये शांति प्रस्ताव पर दी गई प्रतिक्रिया को 'पूरी तरह अस्वीकार्य' बताया। इससे पश्चिम एशिया में संकट दूर करने के लिए राजनयिक सफलता की उम्मीद फिलहाल कमजोर हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मितव्ययिता की अपील ने विदेशी मुद्रा भंडार, ईंधन की कीमतों और उपभोग के दृष्टिकोण को लेकर निवेशकों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
सेंसेक्स में शामिल कंपनियों में टाइटन के शेयर में सबसे ज्यादा सात प्रतिशत की गिरावट आई। इंटरग्लोब एविएशन, भारतीय स्टेट बैंक, भारती एयरटेल, इटर्नल और रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में भी भारी गिरावट देखी गई।
दूसरी तरफ, लाभ में रहने वाले शेयरों में सन फार्मा, हिंदुस्तान यूनिलीवर, अदाणी पोर्ट्स, कोटक महिंद्रा बैंक, एक्सिस बैंक और आईसीआईसीआई बैंक शामिल हैं।
वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड 2.23 प्रतिशत बढ़कर 103.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
लाइवलॉन्ग वेल्थ के शोध विश्लेषक और संस्थापक हरिप्रसाद के. ने कहा, ‘‘कच्चे तेल की कीमतों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता और वैश्विक तनाव बढ़ने की आशंका के बीच निवेशकों ने आक्रामक रूप से शेयरों की बिकवाली की। इससे सूचकांकों में गिरावट आई।’’
उन्होंने कहा कि आज की इस गिरावट का तात्कालिक कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 10 मई का भाषण है, जिसे बाजार ने वृहद आर्थिक दबाव के संकेत के रूप में लिया है।
हरिप्रसाद ने कहा, ‘‘अमेरिका-ईरान संघर्ष और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर वैश्विक अनिश्चितता ने पहले ही बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया था। अब प्रधानमंत्री के मितव्ययिता उपायों की अपील ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, ईंधन की लागत और उपभोग के दृष्टिकोण को लेकर निवेशकों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।’’