ट्रक ड्राइवर की बेटी शगुफ्ता शेख ने ऐसे हासिल की बड़ी कामयाबी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 12-10-2026
How truck driver's daughter Shagufta Shaikh achieved great success
How truck driver's daughter Shagufta Shaikh achieved great success

 

भक्ति चालक

महाराष्ट्र के धाराशिव जिले के तेरखेडा जैसे छोटे से गांव की एक लड़की. घर के हालात खस्ता, वालिद ट्रक ड्राइवर और मां खेत मजदूर. समाज में लड़कियों की तालीम को लेकर होने वाली मुखालफत, कदम-कदम पर सुनने पड़ने वाले ताने और पैसों की तंगी. इन तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए, एक के बाद एक लगातार ६ सरकारी इम्तिहान पास कर शगुफ्ता शेख ने एक बड़ी मिसाल कायम की है.

टीसीएस (TCS) की एक नामी आईटी (IT) नौकरी छोड़कर सिविल सर्विसेस में आने का ख्वाब देखने वाली शगुफ्ता हाल ही में 'टैक्स असेसमेंट और एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर' के ऊंचे ओहदे पर चुनी गई हैं. 'आवाज़-द-वॉयस' से बात करते हुए उन्होंने अपने इस मुश्किल लेकिन बेहद प्रेरणादायक सफर की कहानी बयान की.

शगुफ्ता का तालीम के लिए कड़ा संघर्ष.

धाराशिव जिले का तेरखेडा शगुफ्ता का अपना गांव है. एक बड़ी बहन और २ छोटे भाइयों के साथ पले-बढ़े होने के दौरान उन्होंने घर की गरीबी को बहुत करीब से देखा. गांव में १०वीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने धाराशिव से ११वीं और १२वीं साइंस से की. आगे लातूर से कंप्यूटर साइंस (CS) में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. मां-बाप की माली हालत ठीक न होने की वजह से उन्होंने एजुकेशन लोन लेकर अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी.

इंजीनियरिंग के बाद टीसीएस कंपनी में उनका कैंपस प्लेसमेंट हो गया. पुणे में ७ महीने नौकरी करने के बाद, कॉर्पोरेट जिंदगी के बजाय सिविल सर्विसेस में जाकर समाज के लिए कुछ करने की ख्वाहिश उनके दिल में जागी. राज्य सेवा मुख्य परीक्षा के लिए क्वालिफाई होते ही उन्होंने कॉर्पोरेट नौकरी को अलविदा कह दिया और अपना पूरा वक़्त पढ़ाई में लगा दिया.

सफर के दौरान आया डिप्रेशन का दौर.

पुणे आकर सरकारी इम्तिहानों की तैयारी तो शुरू कर दी, लेकिन कामयाबी मिलना इतना आसान नहीं था. पहली ३ कोशिशों में प्रीलिम्स पास किया, लेकिन मेंस के मुकाम पर नाकामी हाथ लगी. उनकी ड्रीम पोस्ट एसटीआई  सिर्फ ४ नंबरों से उनके हाथ से निकल गई.

उन यादों का जिक्र करते हुए शगुफ्ता बताती हैं कि उनकी सपनो की एसटीआई पोस्ट सिर्फ चार नंबरों से छूट गई और वह फाइनल लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पाईं. इस नाकामी से वह गहरे डिप्रेशन में चली गईं. उस सदमे और जहनी उलझन से बाहर निकलने में उन्हें पूरे डेढ़ साल लग गए.

पास रखे पैसे खत्म हो चुके थे. लेकिन हार मानना उनकी फितरत में नहीं था. पुणे में रहने और पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्होंने एक पब्लिकेशन में प्रूफ एडिटर और कंटेंट राइटर की नौकरी कर ली, जो सरकारी इम्तिहानों की किताबें छापता था. उनकी तैयार की गई एक किताब की लगभग १ लाख प्रतियां बिकीं. नाम कहीं नहीं मिला, लेकिन उस काम की वजह से उनकी गहरी पढ़ाई भी हो गई और पैसों की मदद भी मिल गई.

एक के बाद एक 6 इम्तिहानों में शानदार कामयाबी.

डिप्रेशन से बाहर निकलने के बाद उन्होंने सिविल सर्विसेस के इम्तिहानों पर पूरा ध्यान लगाया. 2023 में निकली सभी भर्तियों में अप्लाई किया और पढ़ाई जारी रखी. अगले 2 सालों में उन्होंने ६ इम्तिहानों में लगातार कामयाबी हासिल की.

उन्होंने जल संसाधन विभाग में कैनाल इंस्पेक्टर के तौर पर कामयाबी हासिल की. इसके साथ ही रत्नागिरी जिला परिषद में जूनियर असिस्टेंट, मंत्रालय में असिस्टेंट, लातूर कृषि निदेशालय में रेवेन्यू असिस्टेंट, मुंबई जीएसटी विभाग में टैक्स असिस्टेंट और पुणे जिला परिषद में असिस्टेंट जैसे पूरे ६ अलग-अलग ओहदों पर अपना सिलेक्शन पक्का किया.

इनमें से उन्होंने 'कैनाल इंस्पेक्टर' की पोस्ट जॉइन की और 2 साल बीड जिले में ईमानदारी से अपना फर्ज निभाया. बाकी 5 ओहदों से उन्होंने खुद 'ऑप्टिंग आउट' कर लिया ताकि दूसरे जरूरतमंद उम्मीदवारों को मौका मिल सके.

समाज से मिलने वाली प्रतिक्रियाएं.

एक मुस्लिम परिवार से निकलकर आला तालीम हासिल करना शगुफ्ता के लिए एक बहुत बड़ा संघर्ष था. अपने पारिवारिक और सामाजिक संघर्ष पर बात करते हुए शगुफ्ता कहती हैं कि मुस्लिम परिवार से तालीम हासिल करके आगे बढ़ना एक अलग ही जद्दोजहद है. बिना बुर्के के घर से बाहर कदम रखने में भी उन्हें डर लगता था.

वह आगे बताती हैं कि अगर ओढ़नी थोड़ी सी भी सरक जाती, तो लोग बिना मांगे घरवालों को सलाह देने लगते थे कि लड़की बिगड़ गई है, इसकी शादी करा दो. लेकिन वह पढ़ाई पर डटी रहीं. घर के हालात बेहाल होने से कोई माली मदद तो नहीं मिल सकी, लेकिन मां-बाप ने उनका पूरा जहनी हौसला बढ़ाया.

मुस्लिम समाज की लड़कियों को आला तालीम के लिए आज भी जो कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, उस पर अफसोस जताते हुए उन्होंने लड़कियों के मां-बाप से खास गुजारिश की. लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा किए बिना उनकी शादी न करें और लड़कियों ने भी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे घरवालों की इज्जत पर आंच आए, ऐसा पैगाम शगुफ्ता ने दिया.

'टैक्स असेसमेंट ऑफिसर' के रूप में नई जिम्मेदारी.

पुणे जिला परिषद का नतीजा आने के बाद शगुफ्ता ने कैनाल इंस्पेक्टर के ओहदे से इस्तीफा दे दिया था और पुणे में 'असिस्टेंट' के तौर पर काम शुरू किया था. अब उनकी 'टैक्स असेसमेंट और एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर' के बेहद इज्जतदार ओहदे पर बहाली हुई है. आने वाले हफ्ते में वह अपने मौजूदा ओहदे से इस्तीफा देकर नए ओहदे की जिम्मेदारी संभालेंगी.

अपने आगे के सफर के बारे में शगुफ्ता पूरे यकीन के साथ कहती हैं कि आने वाली तमाम जिम्मेदारियों और चुनौतियों को ईमानदारी से पूरा करने का उनका पक्का इरादा है. अपने ओहदे के साथ पूरा इंसाफ और सम्मान बरकरार रहे, ऐसा ही काम वह आगे भी करती रहेंगी.

मायूस हो चुके नौजवानों के लिए शगुफ्ता का यह सफर एक नई उम्मीद जगाने वाला है. नाकामी के वक्त टूटकर बिखरने के बजाय खुद को दोबारा साबित करते हुए ऊंची उड़ान कैसे भरी जाती है, शगुफ्ता शेख इसकी एक बेहतरीन मिसाल हैं.