कश्मीर के युवाओं पर डिजिटल दबाव: सोशल मीडिया बनता जा रहा है डिप्रेशन की एक बड़ी वजह
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 18-01-2026
Famous psychologist Jasinda Meer
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कश्मीर घाटी में युवाओं के बीच बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनती जा रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी के मामलों में इज़ाफ़े के पीछे बेरोज़गारी, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और बदलती जीवनशैली के साथ-साथ सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव भी एक अहम कारण है। लगातार डिजिटल एक्सपोज़र, नकारात्मक कंटेंट और अनियंत्रित स्क्रीन टाइम युवाओं के मानसिक संतुलन पर गहरा असर डाल रहे हैं, जिससे यह मुद्दा अब केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक चिंता का विषय बन चुका है।
कश्मीर घाटी में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकट अब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक मुद्दे के रूप में सामने आ रहा है। हाल के वर्षों में घाटी के युवाओं में डिप्रेशन, ओवरथिंकिंग और एंग्जायटी के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह बढ़ता हुआ मानसिक दबाव युवाओं की पढ़ाई, करियर, पारिवारिक जीवन और सामाजिक व्यवहार पर गहरा असर डाल रहा है। विशेषज्ञ इसे एक “साइलेंट क्राइसिस” मानते हैं, जिस पर समय रहते ध्यान न दिया गया तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जासिंदा मीर के अनुसार, डिप्रेशन को आज भी समाज में गंभीर बीमारी के रूप में नहीं देखा जाता, जबकि यह मानसिक स्वास्थ्य की सबसे आम लेकिन खतरनाक समस्याओं में से एक है। डिप्रेशन की स्थिति में व्यक्ति का मूड लगातार खराब रहता है, उसे किसी काम में रुचि नहीं होती, भविष्य निराशाजनक लगने लगता है और आत्मविश्वास खत्म हो जाता है। कई मामलों में व्यक्ति अपने शरीर की देखभाल भी छोड़ देता है, जिससे मानसिक बीमारी धीरे-धीरे शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करने लगती है।
कश्मीर में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया अब केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि एक तरह का मानसिक प्रदूषण बनता जा रहा है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर लगातार बहती नकारात्मक खबरें, हिंसा से भरे वीडियो और बनावटी खुशहाल ज़िंदगियों की झलक युवाओं के दिमाग को आराम का मौका ही नहीं देती। यह एक ऐसा डिजिटल दबाव पैदा करता है, जिसमें व्यक्ति अनजाने में खुद की तुलना दूसरों से करने लगता है और अपनी ज़िंदगी को अधूरा व असफल समझने लगता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि वहां क्या दिखाया जा रहा है, बल्कि यह है कि युवा बिना किसी सीमा के उसे लगातार खपत कर रहे हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि जिस तरह प्रदूषित हवा शरीर को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाती है, उसी तरह नकारात्मक डिजिटल कंटेंट दिमाग को थका देता है। घंटों तक स्क्रीन से चिपके रहने से दिमाग हमेशा अलर्ट मोड में रहता है, जिससे बेचैनी बढ़ती है और नींद की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है। कई युवा देर रात तक फोन इस्तेमाल करते हैं, जिससे नींद पूरी नहीं हो पाती और अगला दिन मानसिक थकावट के साथ शुरू होता है। यही थकावट समय के साथ एंग्जायटी और डिप्रेशन का रूप ले लेती है। मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि अगर सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह डिजिटल लत युवाओं के मानसिक संतुलन को और अधिक कमजोर कर सकती है।
कश्मीर में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बेरोज़गारी और भविष्य की अनिश्चितता का गहरा प्रभाव देखा जा रहा है। पढ़े-लिखे युवा वर्षों तक नौकरी की तलाश में भटकते रहते हैं, जिससे उनमें तनाव, हताशा और आत्मग्लानि की भावना पैदा होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, बेरोज़गारी और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ एक-दूसरे को बढ़ाती हैं। जहां रोज़गार की कमी होती है, वहां डिप्रेशन बढ़ता है और जहां मानसिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, वहां व्यक्ति की कार्यक्षमता और रोज़गार की संभावना भी घट जाती है।
सोशल मीडिया भी कश्मीर में बढ़ते डिप्रेशन का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। लगातार नकारात्मक खबरें, हिंसा से जुड़े वीडियो, व्यक्तिगत तुलना और दिखावटी जीवनशैली युवाओं के दिमाग पर भारी दबाव डालती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सोशल मीडिया दिमाग के लिए वैसा ही है जैसा शरीर के लिए खाना। अगर दिमाग को लगातार नकारात्मक और डर पैदा करने वाला कंटेंट दिया जाएगा, तो उसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर ज़रूर पड़ेगा। कई युवा बिना ब्रेक के घंटों सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं, जिससे एंग्जायटी, नींद की कमी और डिप्रेशन की समस्या बढ़ जाती है।
मानसिक स्वास्थ्य के मामलों में एक अहम सामाजिक समस्या यह भी है कि पुरुष अपनी मानसिक परेशानी को खुलकर साझा नहीं करते। समाज में यह धारणा गहराई से बैठी हुई है कि पुरुष को मजबूत होना चाहिए और भावनाएँ दिखाना कमजोरी है। इसी कारण कई युवा अंदर ही अंदर टूटते रहते हैं और मदद लेने से बचते हैं। इसके विपरीत, महिलाएँ अपनी भावनाएँ व्यक्त करती हैं, इसलिए उनमें डिप्रेशन के मामले ज़्यादा रिपोर्ट होते हैं, हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या दोनों में लगभग समान है।
परिवार और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका इस पूरे मुद्दे में बेहद अहम मानी जा रही है। घर का तनावपूर्ण माहौल, माता-पिता के बीच लगातार झगड़े और भावनात्मक अस्थिरता बच्चों के मानसिक विकास को गहराई से प्रभावित करती है। स्कूल और कॉलेजों में शिक्षक छात्रों के व्यवहार और प्रदर्शन में आए बदलावों को सबसे पहले देख सकते हैं। समय रहते इन संकेतों को पहचानकर माता-पिता और काउंसलर्स को सूचित करना कई ज़िंदगियाँ बचा सकता है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि डिप्रेशन को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति में दो हफ्तों से अधिक समय तक उदासी, चिड़चिड़ापन, नींद या भूख में बदलाव, निराशा या खुद को नुकसान पहुँचाने के विचार दिखाई दें, तो तुरंत पेशेवर काउंसलिंग और इलाज ज़रूरी है। समय पर इलाज न मिलने पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ आत्महत्या जैसे गंभीर कदम तक पहुँच सकती हैं। कश्मीर में बढ़ते आत्महत्या के मामलों को इसी मानसिक स्वास्थ्य संकट से जोड़कर देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना, सामाजिक कलंक को तोड़ना और काउंसलिंग को सामान्य प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना अब समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। जब तक मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितनी अहमियत नहीं दी जाएगी, तब तक घाटी का यह अदृश्य संकट यूँ ही गहराता रहेगा।