लंदन
पश्चिम एशिया में जारी तनाव तेजी से एक ऐसे संघर्ष का रूप लेता जा रहा है, जिसका कोई स्पष्ट विजेता दिखाई नहीं देता। लंदन विश्वविद्यालय के बामो नूरी और इंद्रजीत परमार के विश्लेषण के अनुसार, यह युद्ध अब केवल सैन्य टकराव नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक उलझनों का एक जटिल जाल बन चुका है।
विश्लेषण में सबसे पहले एक मूलभूत सवाल उठाया गया है,ईरान पर “विजय” का अर्थ वास्तव में क्या होगा? अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों के दृष्टिकोण से इसका उत्तर अक्सर सरल माना जाता है: ईरान की परमाणु क्षमता को समाप्त करना, उसकी क्षेत्रीय ताकत को कमजोर करना और संभवतः राजनीतिक परिवर्तन लाना। यह एक निर्णायक युद्ध की सोच को दर्शाता है, जिसमें अंत स्पष्ट और निश्चित माना जाता है।
लेकिन जब इसी प्रश्न को ईरान के दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो उत्तर पूरी तरह बदल जाता है। ईरान के लिए जीत का अर्थ किसी अन्य शक्ति को हराना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बनाए रखना है। यही दृष्टिकोण इस पूरे संघर्ष की असमान प्रकृति को दर्शाता है।
सैन्य रूप से अमेरिका और इज़राइल की क्षमता अत्यधिक मजबूत मानी जाती है। वे सटीक हमले करने, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने और रणनीतिक ठिकानों को नुकसान पहुँचाने में सक्षम हैं। इसके बावजूद, इन हमलों का स्थायी राजनीतिक परिणाम अभी तक सामने नहीं आया है। ईरान की शासन व्यवस्था अभी भी कायम है और उसके क्षेत्रीय तथा वैचारिक नेटवर्क सक्रिय हैं।
विश्लेषण के अनुसार, सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि ईरान भी पश्चिमी शक्तियों जैसी सीधी जीत की रणनीति अपना रहा है। वास्तव में, ईरान का उद्देश्य प्रत्यक्ष विजय नहीं, बल्कि संघर्ष को इतना जटिल और महंगा बनाना है कि उसके विरोधी किसी स्पष्ट समाधान तक न पहुँच सकें।
इस रणनीति के तहत संघर्ष केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह ऊर्जा बाजारों, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय गठबंधनों तक फैल गया है। होर्मूज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक जगहों पर तनाव वैश्विक प्रभाव डालता है और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
ईरान की रणनीति प्रभुत्व स्थापित करने की नहीं, बल्कि “उलझाव” पैदा करने की है, जिससे विरोधी देशों पर लगातार दबाव बना रहे और संघर्ष लंबे समय तक खिंचता जाए। इस स्थिति में किसी भी पक्ष के लिए निर्णायक जीत हासिल करना कठिन हो जाता है।
विश्लेषण यह भी बताता है कि युद्ध के बढ़ने से स्थिति और अधिक खतरनाक हो सकती है। ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई केवल एक देश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान, इराक और जॉर्डन जैसे देशों तक फैल सकती है। इससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है।
इसके अलावा, ऊर्जा ढांचे और बुनियादी सेवाओं पर हमले क्षेत्रीय संकट को और गहरा कर सकते हैं। बिजली, पानी और ईंधन आपूर्ति बाधित होने से बड़े पैमाने पर मानवीय संकट और विस्थापन की स्थिति पैदा हो सकती है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि युद्ध को आगे बढ़ाना अब केवल राजनीतिक इच्छा का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि सैन्य संसाधनों की सीमाओं का भी मामला बन चुका है। किसी भी बड़े संघर्ष में यह स्पष्ट नहीं है कि किसी भी पक्ष के पास लंबे समय तक लड़ने की क्षमता कितनी बची है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संघर्ष का कोई स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य नहीं दिखता, जिसे सैन्य बल से हासिल किया जा सके। यही कारण है कि यह युद्ध एक ऐसे गतिरोध की ओर बढ़ रहा है, जहाँ न कोई स्पष्ट विजेता है और न ही आसान समाधान।