न्यूयॉर्क
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के बीच न्यूयॉर्क में भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम (USISPF) की ओर से आयोजित एक विशेष रात्रिभोज में लेखक और उद्यमी अल मेसन की मोहन भागवत से मुलाकात हुई। मेसन के मुताबिक, इस मुलाकात से उन्हें यह स्पष्ट संदेश मिला कि भारत और अमेरिका के बीच दीर्घकालिक साझेदारी दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
मेसन ने अपने लेख में बताया कि एक दिन पहले ही उन्होंने टाइम्स नाउ और अन्य मीडिया मंचों पर मोहन भागवत को लेकर एक लेख लिखा था। उन्होंने भागवत को ‘भारत की सभ्यता का संरक्षक’ बताया था। उस समय तक उनकी भागवत से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई थी और उनका आकलन उनके शोध पर आधारित था। हालांकि, न्यूयॉर्क में आमने-सामने मुलाकात का अवसर मिलने के बाद उन्होंने अपने विचार उनके सामने भी रखे।
मेसन ने बातचीत के दौरान मोहन भागवत के बारे में अपने कुछ प्रमुख निष्कर्ष साझा किए। उनका पहला निष्कर्ष था कि भागवत भारतीय सभ्यता और उसके विचारों के महत्वपूर्ण संरक्षकों में से एक हैं।
उन्होंने कहा कि भागवत भारत सरकार में कोई संवैधानिक पद नहीं रखते। वह न तो किसी सरकारी मंत्रालय का नेतृत्व करते हैं, न सैन्य शक्ति उनके हाथ में है और न ही वह कानून बनाते हैं। उनका नाम चुनावी मतपत्र पर भी नहीं होता। इसके बावजूद वह एक सदी पुराने संगठन का नेतृत्व करते हैं, जिसका भारत के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है।
मेसन ने अपने लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी RSS की विचारधारा और संगठन से निकले प्रमुख नेताओं में से एक के तौर पर प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार, भागवत के विचारों में ‘विश्वगुरु’ की अवधारणा और ‘वसुधैव कुटुंबकम’, यानी पूरी दुनिया को एक परिवार मानने का विचार प्रमुख है।
लेखक का मानना है कि अगर अमेरिका यह समझना चाहता है कि आने वाले वर्षों में करीब 1.5 अरब आबादी वाला भारत किस दिशा में आगे बढ़ सकता है, तो मोहन भागवत उन प्रभावशाली आवाजों में शामिल हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मेसन ने न्यूयॉर्क में हुई मुलाकात के बाद अपने लेख में कहा कि उनकी सबसे महत्वपूर्ण समझ यह रही कि मोहन भागवत भारत और अमेरिका के बीच संबंधों के दीर्घकालिक महत्व को समझते हैं।
उनका कहना है कि भागवत भारत सरकार का हिस्सा नहीं हैं। वह अमेरिका के साथ संधियों पर बातचीत नहीं करते और न ही अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों के साथ सरकारी वार्ताओं में शामिल होते हैं। इसके बावजूद वह ऐसे संगठन का नेतृत्व करते हैं, जिसने भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को प्रभावित किया है और कई पीढ़ियों के नेताओं को आकार देने में भूमिका निभाई है।
मेसन के अनुसार, मुलाकात के दौरान उन्हें ऐसा नहीं लगा कि भागवत भारत को अमेरिका से दूर ले जाने की बात कर रहे हैं। इसके बजाय उन्हें एक ऐसे भारतीय नेता की सोच दिखाई दी, जो दोनों देशों के रिश्तों को तत्काल राजनीतिक परिस्थितियों से कहीं अधिक लंबे ऐतिहासिक नजरिए से देखता है।
लेखक ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया कि सरकारें बदलती रहती हैं। राष्ट्रपति बदलते हैं। प्रधानमंत्री बदलते हैं। व्यापार शुल्क और नीतियां भी समय के साथ बदल सकती हैं। दोनों देशों के बीच राजनयिक मतभेद भी हो सकते हैं। लेकिन उनके अनुसार भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों का आधार इन तत्काल राजनीतिक बदलावों से कहीं बड़ा है।
मेसन ने चीन के बदलते प्रभाव को भी भारत और अमेरिका के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके मुताबिक, दोनों देश चीन के बढ़ते प्रभाव और बदलती वैश्विक परिस्थितियों से जूझ रहे हैं।
इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से विस्तार भी वैश्विक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय शक्ति का स्वरूप बदल रहा है। भारत और अमेरिका दोनों के लिए तकनीक, ऊर्जा, रक्षा, शिक्षा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग के बड़े अवसर मौजूद हैं।
हालांकि, दोनों देशों के बीच मतभेद भी होते हैं। लेखक के अनुसार, एक परिपक्व रणनीतिक साझेदारी वही होती है जो मतभेदों के बावजूद कायम रह सके।
मेसन का मानना है कि अमेरिका को भारत को केवल उसकी मौजूदा सरकार के नजरिए से नहीं समझना चाहिए। अगर वॉशिंगटन यह जानना चाहता है कि भारत भविष्य में किस दिशा में बढ़ रहा है, तो उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों के साथ-साथ उन संस्थाओं और समूहों को भी समझना होगा, जो देश के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित करते हैं।
लेखक ने ऐसे प्रभावशाली समूहों में विचारकों, उद्योगपतियों, सांस्कृतिक आंदोलनों और नागरिक समाज संगठनों के साथ RSS का भी उल्लेख किया है।
उनके अनुसार, भारत को समझने के लिए केवल चुनावी राजनीति को देखना पर्याप्त नहीं है। देश के भीतर मौजूद सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक धाराओं को समझना भी उतना ही जरूरी है।
लेख में एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई है कि अमेरिका और भारत के बीच संवाद के लिए हर मुद्दे पर सहमत होना जरूरी नहीं है।
मेसन के मुताबिक, भारत-अमेरिका संबंधों को अक्सर अलग-अलग अमेरिकी और भारतीय नेताओं के नाम से समझाया जाता रहा है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने जॉर्ज डब्ल्यू बुश और मनमोहन सिंह, बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी तथा डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के दौर का उल्लेख किया।
लेकिन उनका सवाल है कि क्या दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों के बीच संबंधों को केवल सरकारों और राष्ट्राध्यक्षों तक सीमित करके देखा जाना चाहिए?
उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच सबसे टिकाऊ साझेदारी तभी बन सकती है, जब यह केवल सरकारों के बीच संबंध न रहकर दोनों समाजों के बीच मजबूत रिश्ते में बदल जाए।
मेसन ने मोहन भागवत के साथ रात्रिभोज में हुई मुलाकात को इसी व्यापक संदर्भ में देखा है। उनके अनुसार, इस मुलाकात से उन्हें यह संदेश मिला कि भारत और अमेरिका के रिश्तों को केवल मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।
उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच साझेदारी का भविष्य सरकारों और नेताओं के साथ-साथ समाजों, संस्थाओं, कारोबारी समुदाय, विचारकों और सांस्कृतिक संगठनों के बीच संवाद पर भी निर्भर करेगा।
मेसन ने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि अमेरिका को भारत की दिशा और भविष्य को समझने के लिए उन सभी प्रभावशाली आवाजों से संवाद करना चाहिए, जो देश को भीतर से प्रभावित कर रही हैं। उनके अनुसार, इस व्यापक संवाद में RSS और मोहन भागवत की भूमिका को भी समझना महत्वपूर्ण है।
अस्वीकरण: अल मेसन न्यूयॉर्क स्थित उद्यमी और लेखक हैं। उनका लेखन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कारोबार, तकनीक, भू-राजनीति और वैश्विक मामलों पर केंद्रित है। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।