कश्मीर पर सकारात्मक सिनेमा की आवश्यकता: अली इमरान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-02-2026
The need for positive cinema on Kashmir: Ali Imran
The need for positive cinema on Kashmir: Ali Imran

 

आवाज द वाॅयस / श्रीनगर

कश्मीर को लेकर बनी फिल्मों में अक्सर हिंसा, टकराव और राजनीतिक दृष्टिकोण हावी रहता है, जबकि वहाँ का समाज, उसकी संवेदनाएँ और मानवीय कहानियाँ परदे के पीछे छूट जाती हैं। कश्मीर के जाने-माने फिल्म निर्माता अली इमरान का मानना है कि अब समय आ गया है कि कश्मीर पर मानवीय और सकारात्मक कहानियों को सामने लाया जाए और ऐसी फिल्मों का निर्माण किया जाए जो कश्मीरी समाज को एक संतुलित और सकारात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करें। उन्होंने कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन या कमाई का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर कला और समाज को दिशा देने वाला सशक्त माध्यम भी है।

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आवाज़ द वॉयस से नई दिल्ली में हुई विशेष बातचीत में अली इमरान ने अपने रचनात्मक सफर, फिल्म निर्माण की चुनौतियों, बॉलीवुड के मौजूदा रुझानों और कश्मीर से जुड़े सिनेमा पर विस्तार से चर्चा की। यह बातचीत आवाज़ द वॉयस की ब्यूरो चीफ यासमीन खान ने की। अली इमरान न केवल एक फिल्म निर्माता हैं, बल्कि लेखक और निर्देशक के रूप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है।

अली इमरान ने बताया कि उनका रुझान बचपन से ही रचनात्मकता की ओर था। स्कूल के दिनों से ही उन्होंने कविता और कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी थीं। उसी समय उन्होंने यह तय कर लिया था कि उनका भविष्य कला के क्षेत्र से ही जुड़ा होगा।

हालाँकि माता-पिता की सलाह पर उन्होंने दिल्ली से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन उनका मन हमेशा सिनेमा और लेखन में ही रमा रहा। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने बॉलीवुड के कई निर्देशकों के साथ सहायक के रूप में काम किया। इस अनुभव ने उन्हें सिनेमा को नज़दीक से समझने का अवसर दिया। इसी दौर में उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव देखे, जहाँ से उन्हें सिनेमा की भाषा, उसकी तकनीक और उसकी आत्मा को समझने का मौका मिला।

वर्ष 2006 में अली इमरान ने स्वतंत्र फिल्म निर्माता बनने का निर्णय लिया। उसी साल उन्होंने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म बनाई, जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने सराहा। उनका मानना है कि एक कलाकार अपनी भाषा, अपने परिवेश और अपनी ज़मीन से जुड़कर ही सबसे बेहतर रचना कर सकता है। इसी सोच के चलते उन्होंने कश्मीर में रहकर काम करने को प्राथमिकता दी। उनके अनुसार कश्मीर की ज़मीन, उसकी संस्कृति और उसके लोग उनकी रचनात्मकता को गहराई देते हैं।

बॉलीवुड पर अपनी राय रखते हुए अली इमरान ने कहा कि हिंदी फिल्म उद्योग अधिकतर व्यावसायिक दबावों में काम करता है। वहाँ प्रचलित ट्रेंड को फॉलो किया जाता है और एक ही फॉर्मूले की फिल्में बार-बार बनाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में सिनेमा की आत्मा कहीं न कहीं खो जाती है। कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने विशेष रूप से ज़ोर दिया कि यहाँ की कहानियों को केवल राजनीतिक या नकारात्मक नज़रिए से दिखाने के बजाय मानवीय संवेदनाओं, रोज़मर्रा के संघर्षों, रिश्तों और उम्मीदों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे न केवल कश्मीर की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी, बल्कि समाज के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित होगा।

मौजूदा दौर के सिनेमा पर बात करते हुए अली इमरान ने सोशल मीडिया और रील्स के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आजकल कई फिल्मों के दृश्य रील्स की तरह बनाए जा रहे हैं, जिससे सिनेमा की गहराई और गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उनके अनुसार सिनेमा एक गंभीर कला है, जिसे जल्दबाज़ी और सतहीपन से नहीं गढ़ा जा सकता। उन्होंने कहा कि जब सिनेमा केवल व्यूज़ और कमाई तक सीमित हो जाता है, तो उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी पीछे छूट जाती है।

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स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को संदेश देते हुए अली इमरान ने कहा कि फिल्म निर्माण का रास्ता लंबा और कठिन होता है। शुरुआती दौर में किसी पेशेवर सेटअप के साथ काम करना बेहद ज़रूरी है, ताकि तकनीकी और व्यावहारिक समझ विकसित हो सके। उन्होंने कहा कि एक फिल्म निर्माता को खुद को स्थापित करने में कम से कम दस साल का समय लग सकता है, इसलिए धैर्य, निरंतरता और आत्मविश्वास बहुत ज़रूरी हैं। जल्द सफलता की चाह और निराशा से बचना चाहिए। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं फिल्म फेस्टिवल सर्किट को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक योजना बनाई है और उसी दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

अपने वर्तमान और आने वाले प्रोजेक्ट्स पर बात करते हुए अली इमरान ने बताया कि उनकी फिल्म ‘बांध’ रिलीज़ के लिए पूरी तरह तैयार है। सेंसर प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे ईद के बाद रिलीज़ किया जाएगा। इसके अलावा उनके तीन अन्य प्रोजेक्ट्स निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। इनमें एक म्यूज़िकल फिल्म भी शामिल है, जो कश्मीर की पृष्ठभूमि में बनाई जा रही है। इसके साथ ही वह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्म पर भी काम कर रहे हैं, जो समकालीन विषय के साथ-साथ कुछ हद तक सूफियाना रंग लिए होगी।

युवा और उभरते हुए फिल्म निर्माताओं को सलाह देते हुए अली इमरान ने कहा कि उन्हें केवल बॉलीवुड तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि विश्व सिनेमा से भी सीख लेनी चाहिए। उन्होंने पोलिश और चेक सिनेमा के साथ-साथ ईरान के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अब्बास कियारोस्तामी और मजीद मजीदी की फिल्मों को देखने की सलाह दी। उनके अनुसार इन निर्देशकों की फिल्में सिनेमा के दर्शन, संवेदनशीलता और तकनीक को समझने में मदद करती हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी पेशेवर सेटअप में सहायक के रूप में काम करना एक फिल्म निर्माता के लिए बेहद लाभकारी अनुभव होता है।

अली इमरान का मानना है कि यदि सिनेमा को ईमानदारी, संवेदनशीलता और सामाजिक ज़िम्मेदारी के साथ बनाया जाए, तो वह समाज को जोड़ने और सोच बदलने का सशक्त माध्यम बन सकता है। कश्मीर के संदर्भ में यह और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि वहाँ की कहानियाँ केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि उम्मीद, इंसानियत और जीवन की सुंदरता की भी हैं। ऐसी कहानियों को परदे पर लाना आज के समय की एक बड़ी ज़रूरत है।