ज़रदोज़ी : वाराणसी की आत्मा में बुनी सुनहरी विरासत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-02-2026
Zardozi: A golden heritage woven into the soul of Varanasi.
Zardozi: A golden heritage woven into the soul of Varanasi.

 

dमुजीब अल-रहमान

वाराणसी,दुनिया के सबसे प्राचीन, निरंतर बसे शहरों में से एक के भीतर एक ऐसी विलक्षण कला सांस लेती है, जहाँ सटीकता, धैर्य और सौंदर्य एक-दूसरे में घुलकर शाश्वत रूप ले लेते हैं। यह कला हैज़रदोज़ी,सोने और चांदी के धागों से वस्त्रों पर की जाने वाली कढ़ाई, जो केवल सजावट नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और स्मृति की जीवित अभिव्यक्ति है। ज़रदोज़ी वाराणसी की उस आत्मा को प्रतिबिंबित करती है, जिसने सदियों से पवित्रता, सौंदर्य और मानवीय प्रतिभा को एक साथ साधा है। यह कला समय के साथ चलती नहीं, बल्कि समय को अपने भीतर समेटे चलती है—राजमहलों से लेकर संकरी गलियों तक, शाही वैभव से लेकर लोक विरासत तक।

ज़रदोज़ी की जड़ें भारतीय इतिहास के प्राचीन काल में मिलती हैं, किंतु इसका स्वर्णकाल मुगल शासन के दौरान आया। मुगल सम्राटों, विशेषकर अकबर महान (1542–1605), ने पारंपरिक कलाओं और शिल्पों को शाही संरक्षण प्रदान किया और ज़रदोज़ी को दरबारी उद्योग का दर्जा दिया। अकबर ने फारस और मध्य एशिया के कुशल कारीगरों को भारत बुलवाया और वाराणसी, दिल्ली तथा लाहौर जैसे नगरों में स्थानीय शिल्पकारों को इस भव्य कला का प्रशिक्षण दिलवाया। समय के साथ फारसी रूपांकन भारतीय सौंदर्यबोध में घुलते चले गए और एक ऐसी शैली ने जन्म लिया, जिसकी पहचान भारतीय भी थी और जिसकी आत्मा सार्वभौमिक। यहीं से बनारस ज़रदोज़ी का प्रमुख केंद्र बनकर उभराएक ऐसा केंद्र, जहाँ शाही परंपरा और स्थानीय संवेदना ने मिलकर कला को नई ऊँचाइयाँ दीं।

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उस दौर में ज़रदोज़ी को “शाही वैभव की भाषा” कहा जाता था। राजसी परिधान, दरबारों के परदे, सिंहासन के कुशन और अनुष्ठानों के वस्त्र—सब पर सोने-चांदी के धागों की चमक सत्ता, प्रतिष्ठा और वैभव का प्रतीक बन जाती थी। प्रकाश में झिलमिलाते ये धागे केवल दृश्य आकर्षण नहीं रचते थे; वे सत्ता के सौंदर्यशास्त्र को गढ़ते थे। समय के साथ यह कला महलों से बाहर निकली और कारीगरों के घरों, मुहल्लों और कार्यशालाओं में बस गई,जहाँ आज भी यह सांस लेती है।

ज़रदोज़ी की तकनीक अपने आप में साधना है। काम की शुरुआत कपड़े पर चाक या कोयले से डिज़ाइन उकेरने से होती है। फिर उस कपड़े को “अड्डा” नामक मजबूत लकड़ी के फ्रेम पर कसकर फैलाया जाता है, ताकि हर टांका सटीक बैठे। इसके बाद सोने या चांदी के धागे अक्सर तांबे पर सोने-चांदी की परत चढ़ाकर बनाए गए—“अरी” नामक महीन सुई में पिरोए जाते हैं। कारीगर आमतौर पर फ्रेम के चारों ओर बैठते हैं; हर हाथ डिज़ाइन का एक हिस्सा संभालता है। किनारों से शुरू होकर भीतर के हिस्सों तक, रंगीन धागों, मोतियों, पत्थरों और कभी-कभी छोटे दर्पणों से रूपांकन भरे जाते हैं। यह प्रक्रिया केवल कौशल नहीं मांगतीयह लय, धैर्य और कल्पना की मांग करती है। हर टांका वाराणसी की गलियों में संचित सौंदर्य का एक अंश बन जाता है।

रेशम, मखमल और वेलोर जैसे भव्य कपड़े ज़रदोज़ी के प्रिय माध्यम हैं। इन पर जड़े कीमती पत्थर और मोती कृति को जीवंत बना देते हैं—मानो वस्त्र नहीं, एक चलती-फिरती कलाकृति हो। मदनपुरा और लालाबुरा जैसे पुराने मुहल्लों में आज भी सुइयों की लयबद्ध ध्वनि सुनाई देती है एक ऐसी ध्वनि, जो पीढ़ियों से पिता से पुत्र तक विरासत में चली आ रही है। यहाँ ज़रदोज़ी आजीविका भर नहीं; यह पहचान है, संकल्प है, और एक मिशन है,विरासत को बचाए रखने का।

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प्रतीकात्मक अर्थों में ज़रदोज़ी विलासिता, प्रतिष्ठा और आध्यात्मिकता को एक साथ साधती है। भारतीय संस्कृति में सोना पवित्रता, शाश्वतता और समृद्धि का प्रतीक है—इसीलिए ज़रदोज़ी धार्मिक अनुष्ठानों और शादियों से गहराई से जुड़ी रही है। दुल्हन के परिधान पर चमकते धागे शाश्वत सौंदर्य और मंगल कामनाओं का रूप लेते हैं। इस्लामी कला में ज़रदोज़ी ज्यामितीय पैटर्न और वनस्पति रूपांकों के माध्यम से अनंतता और सामंजस्य की अवधारणाओं को व्यक्त करती है एक ऐसा सौंदर्य, जो दृष्टि से आगे जाकर अर्थ रचता है।

इतिहास में ज़रदोज़ी ने उत्थान और अवसानदोनों देखे हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में शाही संरक्षण घटा, तो यह कला ठहराव में चली गई। फिर भी, वह विलुप्त नहीं हुई। 20वीं शताब्दी में पारंपरिक परिधानों के प्रति वैश्विक रुचि बढ़ी, तो ज़रदोज़ी का पुनरुत्थान हुआ। सरकारी संस्थानों और शिल्प संगठनों ने प्रशिक्षण केंद्र खोले, युवाओं को इस कला से जोड़ा और इसे संरक्षित विरासत का दर्जा दिलाया। आज बनारस, अब वाराणसीको ज़रदोज़ी की वैश्विक राजधानी माना जाता है। यहाँ की कृतियाँ यूरोप, मध्य पूर्व और अमेरिका तक निर्यात होती हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भारतीय सौंदर्य और शिल्प कौशल का प्रतिनिधित्व करती हैं।

आधुनिक मशीनों और तकनीकों के युग में भी ज़रदोज़ी अपनी हस्तनिर्मित आत्मा को बचाए हुए है। एक अनुभवी कारीगर का कथन इस कला का मर्म खोल देता है,“ज़रदोज़ी काम नहीं, एक प्रार्थना है; हम सुई के साथ अपने पूर्वजों की कहानियाँ पढ़ते हैं।” यह कथन ज़रदोज़ी को अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित करता है,जहाँ कौशल प्रेरणा से और कला आत्मा से जुड़ती है।

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आर्थिक दृष्टि से भी ज़रदोज़ी वाराणसी की जीवनरेखा है। यह हजारों कारीगरों को रोजगार देती है,अधिकांश ऐसे परिवार, जिन्होंने इसे पीढ़ियों से संभाला है। अनुमान है कि वाराणसी का कढ़ाई उद्योग वार्षिक रूप से 400 करोड़ रुपये से अधिक का है, और इसका बड़ा हिस्सा निर्यात से आता है। भारत में होने वाली कुल कढ़ाई का आधे से अधिक उत्पादन यहीं होता है, और शहर की हस्तशिल्प आय में इसका योगदान लगभग 60 प्रतिशत है।

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लेकिन ज़रदोज़ी का महत्व केवल आँकड़ों में नहीं समाता। यह सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का हिस्सा हैहिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के उत्सवों, शादियों और धार्मिक परिधानों में समान रूप से उपस्थित। यह स्थानीय गौरव का प्रतीक है, जहाँ छोटी-छोटी कार्यशालाओं में ज्ञान का आदान-प्रदान होता है और विरासत बच्चों के हाथों में सौंपी जाती है। वाराणसी में ज़रदोज़ी एक शिल्प नहीं—एक जीवन-दर्शन है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है, भारतीय स्वाद की एकता को रचता है और उस शहर की भावना को व्यक्त करता है, जो पवित्रता, सौंदर्य और रचनात्मकता का पर्याय है।

( लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अरब और अफ्रीकी अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर और इस केंद्र के पूर्व प्रमुख  है।)