मस्जिदों के दस्तावेज छह महीने में दुरुस्त करेगी जमीयत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 31-10-2026
Jamiat will rectify mosque documentation within six months
Jamiat will rectify mosque documentation within six months

 

आवाज द वाॅयस/ नूंह (हरियाणा)

जमीयत उलमा ए हिंद ने देश में मस्जिदों, ईदगाहों और अन्य इस्लामी धार्मिक स्थलों पर बुलडोजर कार्रवाई रोकने, छह महीने में मस्जिदों के दस्तावेज दुरूस्त करने तथा मदरसों के अधिकारों की रक्षा करने की मांग उठाई है। हरियाणा के नूंह जिले के मेवात में आयोजित संगठन की गवर्निंग काउंसिल की वार्षिक बैठक में इन मुद्दों पर महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। बैठक में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लेकर भी संगठन ने अपना विरोध दर्ज कराया।

30 अक्टूबर को शुरू हुई इस बैठक में देशभर से करीब 2,000 सदस्य, प्रमुख हस्तियां और प्रसिद्ध उलेमा हिस्सा ले रहे हैं। बैठक का आयोजन नूंह जिले के पिपाका क्षेत्र में डीएलएफ स्प्रिंगफील्ड, सहसौला पट्टी में किया जा रहा है। जमीयत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने ध्वजारोहण के साथ बैठक की शुरुआत की।

शुरुआती सत्र में तीन प्रमुख प्रस्ताव पेश किए गए। इनमें मदरसों के खिलाफ कथित उत्पीड़न और भ्रामक प्रचार पर रोक लगाने, मस्जिदों तथा अन्य धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और समान नागरिक संहिता का विरोध करने से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। संगठन ने केंद्र सरकार और संबंधित कानूनी संस्थाओं से इन विषयों पर आवश्यक कदम उठाने की मांग की।

ffमदरसों के खिलाफ कार्रवाई पर जताई चिंता

जमीयत उलमा ए हिंद की गवर्निंग काउंसिल ने मदरसों को मान्यता देने के नाम पर कथित तौर पर परेशान किए जाने और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के खिलाफ आधारहीन प्रचार पर चिंता जताई। प्रस्ताव में कहा गया कि मदरसों के संवैधानिक अधिकारों और कानूनी संरक्षण को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

संगठन ने केंद्र सरकार और संबंधित कानूनी अधिकारियों से ऐसी गतिविधियों को रोकने की अपील की, जिनसे मदरसों के संचालन और शिक्षा व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। प्रस्ताव में भारतीय संविधान के तहत उपलब्ध अधिकारों और संरक्षण का उल्लेख करते हुए मदरसों को उचित कानूनी सुरक्षा देने की मांग की गई।

हालांकि, जमीयत ने मदरसों के प्रबंधन की जिम्मेदारियों पर भी जोर दिया। संगठन ने मदरसा संचालकों से कहा कि वे अपने संस्थानों के जमीन संबंधी दस्तावेज, स्वीकृत भवन नक्शे, छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों के पहचान संबंधी रिकॉर्ड और वित्तीय खातों का पूरा हिसाब व्यवस्थित रखें।

प्रस्ताव के मुताबिक, संस्थानों के वित्तीय रिकॉर्ड का ऑडिट होना चाहिए और सभी दस्तावेज पारदर्शिता के साथ सुरक्षित रखे जाने चाहिए। इससे मदरसों को अपनी कानूनी स्थिति स्पष्ट करने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सामना करने में मदद मिल सकती है।

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जमीयत ने सरकार से अधिकारों की रक्षा की मांग करने के साथ मदरसा प्रबंधन को भी अपने रिकॉर्ड दुरुस्त रखने की सलाह दी है।

मस्जिदों और ईदगाहों पर बुलडोजर कार्रवाई रोकने की मांग

बैठक में पारित दूसरा प्रस्ताव मस्जिदों, ईदगाहों, दरगाहों और अन्य इस्लामी धार्मिक स्थलों की सुरक्षा से संबंधित है। जमीयत उलमा ए हिंद ने देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की कथित बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई।

संगठन का कहना है कि मस्जिदें केवल इमारतें नहीं हैं। वे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आस्था और सामूहिक पहचान से जुड़ी हैं। प्रस्ताव में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लेख किया गया। ये अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता तथा धर्म से जुड़े मामलों के प्रबंधन के अधिकारों से संबंधित हैं।

जमीयत ने मांग की कि नगरपालिका, राजस्व और विकास प्राधिकरणों की ओर से मस्जिदों को गिराने की कार्रवाई कानून के अनुसार ही होनी चाहिए। प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। संगठन ने कानून का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की।

इस मांग का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों के निपटारे में कानूनी प्रक्रिया और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। जमीयत का कहना है कि प्रशासनिक कार्रवाई में संबंधित पक्षों को सुनना और लागू कानूनी प्रावधानों का पालन करना आवश्यक है।

पूजा स्थल कानून 1991 का किया उल्लेख

मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों की सुरक्षा से जुड़े प्रस्ताव में पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का विशेष उल्लेख किया गया। इस कानून का उद्देश्य 15 अगस्त 1947 को मौजूद पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना और उनके स्वरूप को बदलने से जुड़े विवादों पर रोक लगाना है। हालांकि, कानून में कुछ अपवाद भी हैं।

जमीयत ने कहा कि इस कानून की भावना ऐतिहासिक धार्मिक विवादों को दोबारा खोलने से रोकना है। प्रस्ताव में अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया गया और कानून को संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रावधान बताया गया।

संगठन ने कुछ निचली अदालतों की ओर से धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण के आदेश दिए जाने पर चिंता व्यक्त की। उसके अनुसार, ऐसे मामलों में पूजा स्थल अधिनियम की भावना और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इस संदर्भ में प्रस्ताव में संभल की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद का उल्लेख किया गया। जमीयत का कहना है कि एकतरफा सर्वेक्षण आदेश के बाद पैदा हुई स्थिति से शांति और कानून व्यवस्था प्रभावित हुई।

गवर्निंग काउंसिल ने केंद्र सरकार और उच्च न्यायपालिका से सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के अंतरिम आदेश का पूरी तरह पालन सुनिश्चित करने की अपील की। संगठन ने यह भी मांग की कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के विपरीत दायर नए दावों को शुरुआती चरण में ही खारिज किया जाए।यह प्रस्ताव धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में कानून के अनुपालन, न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक शांति के सवालों को सामने लाता है।

छह महीने में मस्जिदों के दस्तावेज दुरुस्त करने का फैसला

जमीयत उलमा ए हिंद ने केवल मांगें रखने तक सीमित रहने के बजाय अपने संगठनात्मक स्तर पर भी कदम उठाने का निर्णय लिया है। बैठक में तय किया गया कि संगठन की सभी प्रांतीय, जिला और तहसील इकाइयां केंद्र की ओर से निर्धारित एक ही तारीख और समय पर संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपेंगी।

इसके साथ ही जमीयत की सभी इकाइयों को मस्जिद प्रबंधन समितियों की सहायता करने का निर्देश दिया गया है। इस काम के तहत मस्जिदों की जमीन से जुड़े कानूनी दस्तावेजों की जांच की जाएगी और आवश्यक रिकॉर्ड पूरा करने में मदद दी जाएगी।

इन दस्तावेजों में खसरा और खतौनी जैसे राजस्व रिकॉर्ड, जमीन के स्वामित्व से जुड़े कागजात, नगरपालिका कर संबंधी दस्तावेज और अन्य जरूरी अभिलेख शामिल होंगे। संगठन ने इस पूरी प्रक्रिया को अगले छह महीने के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा है।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धार्मिक स्थलों की जमीन से जुड़े विवादों में दस्तावेजों की स्थिति अहम हो सकती है। रिकॉर्ड व्यवस्थित होने से संबंधित प्रबंधन समितियों को कानूनी प्रक्रियाओं में अपना पक्ष रखने में मदद मिल सकती है।

समान नागरिक संहिता पर जमीयत का विरोध

बैठक में पारित तीसरे प्रस्ताव में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को पूरी तरह खारिज किया गया। जमीयत ने इसे अपने स्वरूप में भेदभावपूर्ण बताते हुए विरोध दर्ज कराया।समान नागरिक संहिता का मुद्दा भारत में लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। इसके तहत विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर समान नागरिक कानून लागू करने की अवधारणा पर चर्चा होती है। जमीयत का रुख इस प्रस्ताव के विरोध में है।

संगठन ने अपने प्रस्ताव में यूसीसी की प्रकृति पर आपत्ति जताई। हालांकि, बैठक के शुरुआती सत्र में पारित प्रस्ताव से आगे इस विषय पर विस्तृत कानूनी या नीतिगत तर्कों का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया।

31 अक्टूबर तक जारी रहेगी बैठक

इससे पहले 29 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित जमीयत उलमा ए हिंद के केंद्रीय कार्यालय के मदनी हॉल में संगठन की मजलिस ए आमिला की बैठक हुई थी। इसमें गवर्निंग काउंसिल के सामने रखे जाने वाले विभिन्न प्रस्तावों के मसौदों पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यसमिति से मंजूरी मिलने के बाद इन प्रस्तावों को 30 अक्टूबर की बैठक में पेश किया गया।

शुरुआती कार्यक्रम में जमीयत उलमा हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के महासचिव मौलाना मुहम्मद यहया करीमी ने स्वागत भाषण दिया। इसके बाद जमीयत उलमा ए हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने पिछली बैठक की कार्यवाही पढ़ी और सचिव की रिपोर्ट पेश की।

इस अवसर पर प्रसिद्ध शायर कारी एहसान मोहसिन ने अपनी शायरी भी प्रस्तुत की। संगठन के उत्तरी भारत के आयोजन सचिव मौलाना मुफ्ती जाकिर हुसैन कासमी ने शोक प्रस्ताव पेश किया।

बैठक 31 अक्टूबर की दोपहर तक जारी रहने का कार्यक्रम है। संगठन के अनुसार, देश की मौजूदा स्थिति और मुस्लिम समाज के सामने मौजूद सामाजिक, शैक्षणिक तथा संगठनात्मक चुनौतियों पर अन्य प्रस्ताव भी पेश किए जाएंगे। अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी का विस्तृत संबोधन भी बैठक का प्रमुख हिस्सा होगा।

मेवात में हो रही इस बैठक के शुरुआती फैसलों से स्पष्ट है कि जमीयत उलमा ए हिंद ने मदरसों की सुरक्षा, मस्जिदों से जुड़े कानूनी विवादों और समान नागरिक संहिता को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। अब संगठन की प्रांतीय और स्थानीय इकाइयों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, खासकर मस्जिदों के दस्तावेज दुरुस्त करने और अधिकारियों तक अपनी मांगें पहुंचाने के मामले में।