फरहान इसराइली/ टोंक (राजस्थान )
डिजिटल फ़ॉन्ट, आर्टिफ़िशियल डिज़ाइन और एआई आर्ट के इस तेज़ रफ़्तार दौर में जहां हाथ से लिखी कला को हाशिये पर माना जाने लगा है, वहीं राजस्थान के टोंक शहर से निकले एक ख़ानदान ने यह साबित कर दिया है कि परंपरा अगर साधना बन जाए, तो वह समय की सीमाओं को लांघ जाती है। काली पलटन इलाके में खादी भंडार के पास एक सादा से घर में बरसों से चल रही क़लम की साधना आज न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक कला केंद्र तक अपनी पहचान दर्ज करा चुकी है। अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक कैलिग्राफी प्रतियोगिता में टोंक के मशहूर ख़त्तात क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी को सेकंड प्राइज़ मिलना न सिर्फ़ एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारत की समृद्ध ख़त्ताती परंपरा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी है।

अमेरिका के न्यूयॉर्क में इस्लामिक आर्ट सोसाइटी द्वारा आयोजित इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में दुनिया भर से चार सौ से अधिक कलाकारों ने हिस्सा लिया।
पांच महाद्वीपों के अनुभवी और नवोदित ख़त्तातों के बीच क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी का चयन यह बताने के लिए काफ़ी है कि हाथ से लिखी इबारत की खूबसूरती और अनुशासन आज भी वैश्विक कला जगत में उतनी ही प्रासंगिक है।
इस वर्ष प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिस्र, दूसरा भारत, तीसरा पाकिस्तान और चौथा तुर्की को मिला। सर्टिफिकेट, मोमेंटो और नकद पुरस्कार से ज़्यादा अहम वह पहचान है, जो हर बार भारत और विशेष रूप से टोंक के नाम के साथ जुड़ती है।
यह कामयाबी किसी एक साल की मेहनत का नतीजा नहीं है। पिछले चार वर्षों से यह अंतरराष्ट्रीय मंच लगातार वासिफ़ी परिवार की उपस्थिति का गवाह बन रहा है।
वर्ष 2022 में क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी ने पहला पुरस्कार हासिल किया था। 2023 में उनके बेटे हारिस वासिफ़ी ने दूसरा स्थान प्राप्त किया। 2024 में हारिस ने एक बार फिर परिवार का नाम रोशन करते हुए पहला पुरस्कार अपने नाम किया। और अब 2026 में वासिफ़ी परिवार का नाम फिर से विजेताओं की सूची में दर्ज हुआ है। दुनिया भर के कलाकारों के बीच ऐसी निरंतरता को असाधारण माना जा रहा है।
क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी का सफ़र किसी आधुनिक आर्ट स्कूल या डिज़ाइन इंस्टिट्यूट से शुरू नहीं हुआ। उनकी पहली पाठशाला उनका अपना घर था। उनके वालिद मरहूम क़ारी सलीमुल्लाह वासिफ़ फुरक़ानी अपने दौर के मशहूर ख़त्तात, क़ारी और आलिम थे।
अरबी, फ़ारसी और उर्दू पर उनकी गहरी पकड़ थी और क़ुरआन की किताबत उनकी पहचान मानी जाती थी। बचपन में मुतिउल्लाह ने अपने वालिद को घंटों एक ही मुद्रा में बैठकर लिखते देखा। क़लम की धार, हरूफ़ की गोलाई, स्याही की मात्रा और काग़ज़ की बनावट,ये सब उनके लिए खेल नहीं, बल्कि इबादत का हिस्सा थे। यही अनुशासन आगे चलकर क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी की पहचान बना।
औपचारिक शिक्षा के लिए उन्होंने टोंक स्थित मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अरबी-फ़ारसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (APRI) में दाख़िला लिया। 1992 से 1996 तक चार साल का डिप्लोमा कोर्स उन्होंने यहीं से किया, जो एनसीपीयूएल, दिल्ली से मान्यता प्राप्त है।
यह वही संस्थान है जिसने टोंक को अरबी-फ़ारसी अध्ययन और इस्लामिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया है। नवाबी दौर से चली आ रही इस विरासत को APRI जैसे संस्थानों ने संजोकर रखा, और वासिफ़ी उसी परंपरा की एक मज़बूत कड़ी बनकर उभरे।
क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी के लिए कैलिग्राफी महज़ सजावटी कला नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक साधना है।
अब तक वे अपने हाथ से 27 मुकम्मल क़ुरआन-ए-मजीद लिख चुके हैं। इनमें कुछ बेहद बारीक हरूफ़ में लिखे गए हैं, तो कुछ में सोने और चांदी की सजावट की गई है।
उन्होंने ऐसे दुर्लभ प्रयोग भी किए हैं, जिनमें पूरा क़ुरआन एक ही बड़े पन्ने पर लिखा गया।
यह काम महीनों में नहीं, बल्कि वर्षों के अभ्यास, धैर्य और मानसिक एकाग्रता से पूरा होता है। हर हरफ़ की जगह पहले से तय होती है और ज़रा सी चूक पूरी रचना को प्रभावित कर सकती है।
वासिफ़ी का एक कम चर्चित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान पांडुलिपियों के संरक्षण से जुड़ा है।
समय के साथ अधूरे हो चुके क़ुरआन-ए-मजीद और अरबी, फ़ारसी व उर्दू की दुर्लभ किताबों को पूरा करना उनका विशेष क्षेत्र है। अब तक वे लगभग 500 अधूरे क़ुरआन और सैकड़ों पुरानी किताबों को फिर से मुकम्मल कर चुके हैं। यह काम उन्होंने निजी संग्रहकर्ताओं, लाइब्रेरियों और शोध संस्थानों के लिए किया है। उनके प्रयास उन किताबों को नई ज़िंदगी देते हैं, जो शायद गुमनामी में खो जातीं।
उनकी कला काग़ज़ तक सीमित नहीं है। कपड़े, चमड़े, लकड़ी, धातु, मार्बल, चावल और दाल के दाने, यहां तक कि बाल और बोतल के अंदर भी उन्होंने कैलिग्राफी की है। यह कला सिर्फ़ हाथ की नहीं, बल्कि संतुलन, धैर्य और ध्यान की भी परीक्षा है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी की मौजूदगी लगातार बढ़ी है। उन्होंने तुर्की के इस्तांबुल में इस्लामिक इदारा “इर्तिका” की अंतरराष्ट्रीय खत्ताती प्रतियोगिता, दुबई की फुजेरा कंपनी द्वारा आयोजित वैश्विक मुकाबलों सहित लगभग 30 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भाग लिया है।भारत में भी उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं और देश के प्रमुख कला मंचों पर उनकी भागीदारी रही है।
वासिफ़ी परिवार में यह विरासत अगली पीढ़ी तक पूरी मजबूती से पहुंच रही है। बड़े बेटे हारिस वासिफ़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित ख़त्तात हैं, दूसरे बेटे अब्बास वासिफ़ी हाफ़िज़ और क़ारी हैं, जबकि बेटी सिदरा वासिफ़ी बच्चियों को कैलिग्राफी सिखाकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
क़ारी मुतिउल्लाह वासिफ़ी का सपना है कि टोंक में कैलिग्राफी की एक विशेष लाइब्रेरी और संग्रहालय स्थापित किया जाए, जहां उनके और उनके वालिद के मख़तूतात सुरक्षित रखे जा सकें। संसाधनों की कमी के बावजूद उनका इरादा अडिग है। उनका मानना है कि टोंक की यह क़लमी विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए। डिजिटल युग में भी जब हाथ की क़लम अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन कर रही है, तब वासिफ़ी परिवार की यह साधना सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर बन चुकी है।