
सम्मेलन का उद्घाटन जामिया मिल्लिया इस्लामिया के डॉ. एम. ए. अंसारी ऑडिटोरियम में कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ़ और रजिस्ट्रार प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ़ ने कहा कि मानवता की सच्ची सफलता क़ुरान को समझने, उस पर चिंतन करने और उसकी शिक्षाओं को जीवन में उतारने में निहित है। उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जिस क़ुरान ने कभी समाजों को नैतिकता, चरित्र और न्याय की राह दिखाई थी, वह आज केवल रस्मों तक सीमित कर दिया गया है।
उन्होंने कहा, “आज ज़रूरत है कि क़ुरान को फिर से जीवन का मार्गदर्शक बनाया जाए—उसे समझ के साथ पढ़ा जाए, दिल और चरित्र में उतारा जाए और व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन की धड़कन बनाया जाए।” प्रो. आसिफ़ ने यह भी रेखांकित किया कि धर्म की वास्तविक आत्मा यही है कि इंसान अपने शब्दों, आचरण और कर्मों से किसी को नुकसान न पहुँचाए।
मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए जामिया के रजिस्ट्रार प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने कहा कि क़ुरान की अनेक आयतें मानव को वैज्ञानिक तथ्यों की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं। उन्होंने पानी की उत्पत्ति, ब्रह्मांड की विशालता, मिट्टी से मानव सृजन, आकाशीय व्यवस्था और दो समुद्रों के बीच की प्राकृतिक सीमा जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि क़ुरान न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन देता है, बल्कि मानव को ब्रह्मांड के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर सोचने के लिए भी प्रेरित करता है।

सम्मेलन के मुख्य वक्ता और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के पूर्व कुलपति प्रो. असलम परवेज़ ने कहा कि क़ुरान और सुन्नत इंसान को यह सिखाते हैं कि प्रेम और करुणा केवल दावों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि कर्मों में दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने इस्लाम के उस सिद्धांत पर भी प्रकाश डाला, जिसके अनुसार अतिरिक्त धन को मानवता और समाज के कल्याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक संतुलन बना रहे।
सम्मेलन के निदेशक, इस्लामिक स्टडीज़ विभाग के अध्यक्ष और ह्यूमैनिटीज़ एवं लैंग्वेजेज़ फैकल्टी के डीन प्रो. इक़्तिदार मोहम्मद खान ने कहा कि क़ुरान इंसान को पूरे ब्रह्मांड में फैले संकेतों पर बुद्धि और विवेक के साथ विचार करने का आमंत्रण देता है। उन्होंने कहा कि यह चिंतन न केवल बौद्धिक विकास, बल्कि व्यावहारिक जीवन को भी बेहतर बनाने का माध्यम बनता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. अख्तरुल वासे ने अपने संबोधन में कहा कि क़ुरान और विज्ञान, दोनों ही इंसानियत को एक ही अंतिम सत्य—अल्लाह—की ओर ले जाते हैं। उनके अनुसार क़ुरान सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जबकि विज्ञान उन सिद्धांतों को समझने और व्याख्या करने के साधन उपलब्ध कराता है।
स्वागत भाषण देते हुए इस्लामिक स्टडीज़ विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सैयद शाहिद अली ने कहा कि इस्लामी सभ्यता के आरंभिक काल से ही क़ुरान ने अवलोकन, तर्क, चिंतन और ज्ञान की खोज को प्रोत्साहित किया है। उन्होंने पहली वह़ी की आयत का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान की खोज इस्लाम में केवल सांसारिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक पवित्र इबादत है।
ईरान की पूर्व प्रथम महिला और शिक्षाविद प्रो. डॉ. जमीलेह सआदत अलमोलहोदा ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि बौद्धिक सुरक्षा और व्यावहारिक सफलता के लिए क़ुरान से गहरा रिश्ता बनाना बेहद आवश्यक है। वहीं भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फथाली ने क़ुरान को उसके अर्थ और संदेश के साथ पढ़ने पर ज़ोर दिया।
ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि प्रो. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक और सामाजिक चुनौतियाँ हमें यह समझने पर मजबूर करती हैं कि क़ुरान का उद्देश्य इंसानी चेतना को जागृत करना है। कुवैत से आए इंजीनियर मुस्तफा अब्बास और सैयद कल्बे जवाद नकवी ने भी क़ुरान और विज्ञान के संतुलित संबंध पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. मोहम्मद मुनव्वर कमाल द्वारा पवित्र क़ुरान के पाठ से हुई। संचालन एसोसिएट प्रोफेसर जुनैद हारिस और डॉ. मेहदी बाकिर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मोहम्मद मुश्ताक ने प्रस्तुत किया।सम्मेलन में जामिया के विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, फैकल्टी सदस्य, देश-विदेश से आए विद्वान, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। सम्मेलन का समापन सत्र 30 जनवरी, 2026 को सुबह 10 बजे सेंटर फॉर इंफॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी (CIT), जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आयोजित होगा।




