अजमेर दरगाह में कामाख्या मंदिर की साध्वी, गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-10-2026
A sadhvi from the Kamakhya Temple at the Ajmer Dargah: an example of the 'Ganga-Jamuni tehzeeb' (syncretic culture).
A sadhvi from the Kamakhya Temple at the Ajmer Dargah: an example of the 'Ganga-Jamuni tehzeeb' (syncretic culture).

 

किशोर सिंह सोलंकी / अजमेर

अजमेर की तंग गलियों में गूंजती सूफियाना कव्वाली और हवा में तैरती गुलाब की खुशबू के बीच एक बेहद खास पल देखने को मिला। असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर से ताल्लुक रखने वाली पंडित विद्या देवी ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह पहुंचीं। उन्होंने ख्वाजा गरीब नवाज की आस्ताने पर मन्नत की चादर चढ़ाई और देश में अमन चैन की दुआ मांगी। भारत की प्राचीन साझी विरासत और गंगा जमुनी तहजीब का यह दृश्य आज के दौर में भाईचारे का बड़ा संदेश देता है। सदियों से अजमेर दरगाह प्रेम और इंसानियत का केंद्र रही है।

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यहां हर मजहब के लोग अपनी आस्था के साथ आते हैं। कामाख्या पीठ की साध्वी का अजमेर आना इसी अटूट परंपरा को और मजबूत करता है।दरगाह परिसर में कदम रखते ही पंडित विद्या देवी सूफी अध्यात्म के रंग में रंगी नजर आईं। उन्होंने वहां बैठकर सूफियाना कव्वाली का आनंद लिया और गहरी आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया।

उनके साथ आए प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने भी ख्वाजा साहब के दरबार में माथा टेका। इस मौके पर धार्मिक नफरत को खत्म करने और देश में आपसी सद्भाव बनाए रखने का संकल्प लिया गया। उन्होंने आस्ताने पर अकीदत के फूल पेश किए और भारत की खुशहाली के लिए हाथ उठाए। अजमेर की यह पावन धरती एक बार फिर सर्वधर्म समभाव की मिसाल बनी।

इस दौरान दरगाह के खादिम सैयद अहमद अली नियाजी ने पंडित विद्या देवी को पूरे एहतराम के साथ जियारत कराई। उन्होंने दरगाह के इतिहास और सूफी परंपराओं की जानकारी साझा की। जियारत के बाद सैयद आसिफ अली चिश्ती ने प्रतिनिधिमंडल के सभी सदस्यों का स्वागत किया।

उन्होंने परंपरा के अनुसार सभी अतिथियों की दस्तारबंदी की और दरबार का तबर्रुक भेंट किया। इस धार्मिक मिलन ने वहां मौजूद आम जायरीन का दिल जीत लिया। दरगाह में हर कोई इस अनूठे आध्यात्मिक संगम का गवाह बन रहा था।

पंडित विद्या देवी केवल दुआ मांगने ही नहीं आई थीं, बल्कि उन्होंने अपनी अकीदत को सेवा से भी जोड़ा। उन्होंने दरगाह में आए हजारों जायरीन और जरूरतमंदों के लिए लंगर का आयोजन किया। अपने हाथों से लंगर बांटकर उन्होंने मानव सेवा का संदेश दिया।

खादिम सैयद अहमद अली नियाजी ने बताया कि पंडित विद्या देवी का अजमेर दरगाह से रिश्ता बहुत पुराना है। वे पिछले कई सालों से नियमित रूप से ख्वाजा साहब के दरबार में हाजिरी देने आती रही हैं। जब भी वे अपने जीवन में कोई नया काम शुरू करती हैं, तो सबसे पहले ख्वाजा गरीब नवाज का आशीर्वाद लेने अजमेर जरूर पहुंचती हैं।

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इस बार की जियारत खास रही क्योंकि उन्होंने आस्ताने के लिए एक विशेष शामियाना और बड़ी चादर पेश की। खादिमों के अनुसार पंडित विद्या देवी ने आगामी 815वें उर्स के दौरान भी बड़े पैमाने पर जनसेवा करने की इच्छा जताई है। वे उर्स के मौके पर देश विदेश से आने वाले जायरीन के लिए भोजन और इलाज की व्यवस्था में योगदान देना चाहती हैं। देशभर में उनके हजारों अनुयायी हैं, जो उनकी इस साझी संस्कृति की सोच का सम्मान करते हैं। उनका मानना है कि ईश्वर और अल्लाह की इबादत का अंतिम मकसद इंसानियत की सेवा ही है।

जियारत पूरी करने के बाद पंडित विद्या देवी ने मीडिया से खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अजमेर दरगाह आकर उन्हें जो आत्मिक सुकून मिलता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यहां आने से एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। उन्होंने कहा कि आज समाज को नफरत की नहीं बल्कि प्रेम और भाईचारे की जरूरत है। देश में बढ़ती धार्मिक कड़वाहट को दूर करने के लिए ऐसे प्रयासों की बहुत जरूरत है। वे यहां सभी के कल्याण और देश की प्रगति की मनोकामना लेकर आई हैं।

बातचीत के दौरान उन्होंने देश के समसामयिक मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के सवाल पर उन्होंने कहा कि छात्रों की मांगें सही हो सकती हैं और लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है।

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लेकिन देश के प्रधानमंत्री के पद की एक अपनी गरिमा होती है। छात्रों को विरोध दर्ज कराते समय भाषा की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। देश के प्रधानमंत्री का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। छात्र हमारे देश का भविष्य हैं और उन्हें गरिमापूर्ण आचरण अपनाना चाहिए।

पंडित विद्या देवी ने अपने जीवन के लक्ष्य पर रोशनी डालते हुए कहा कि गरीबों और दुखियों की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। लाचार लोगों की मदद करने से ही मन को असली शांति मिलती है। उन्होंने माना कि उन्हें जो भी आध्यात्मिक शक्ति मिली है, उसमें ख्वाजा गरीब नवाज की असीम कृपा का बड़ा हाथ है। इसी आस्था के कारण वे बार बार अजमेर खिंचे चले आती हैं। वे मानती हैं कि ख्वाजा साहब का दरबार हर उस शख्स के लिए खुला है जो सच्चे दिल से दुआ मांगता है।

आज के दौर में जब छोटी छोटी बातों पर समाज को बांटने की कोशिशें होती हैं, तब ऐसे धार्मिक स्थल और ऐसी हस्तियां उम्मीद की किरण बनकर सामने आती हैं। कामाख्या मंदिर और अजमेर शरीफ का यह रिश्ता केवल दो धार्मिक स्थलों का मिलन नहीं है। यह दो अलग अलग उपासना पद्धतियों के बीच आपसी सम्मान और विश्वास का प्रतीक है। यही वह भावना है जिसने भारत को सदियों से एक सूत्र में पिरो कर रखा है।

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अजमेर का ख्वाजा दरबार हमेशा से अमीर गरीब, हिंदू मुस्लिम और हर वर्ग के व्यक्ति को गले लगाता आया है। पंडित विद्या देवी की यह यात्रा यह साबित करती है कि आस्था की कोई एक दीवार नहीं होती। सच्चा अध्यात्म इंसान को जोड़ना सिखाता है, तोड़ना नहीं। कामाख्या से आई साध्वी की अजमेर दरगाह में यह हाजिरी आने वाले समय में सामाजिक समरसता की एक मजबूत मिसाल के तौर पर याद रखी जाएगी।

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