बेहतरीन विचार अक्सर घर से ही शुरू होते हैं

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-10-2026
Great ideas often start right at home.
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राजीव नारायण

जब फ़रिया और सुहा जुबैर ने अपने भाई ज़ेन को स्ट्रैबिस्मस यानी भेंगापन की समस्या से जूझते देखा, तो उनके मन में कई सवाल उठे। ये सवाल धीरे धीरे उन्हें अपने परिवार की समस्या से कहीं आगे ले गए। उनकी इसी तलाश ने ‘स्ट्रैबी क्योर’ (Strabi Cure) को जन्म दिया। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया एक प्रोजेक्ट है, जिसका उद्देश्य भेंगेपन की शुरुआती जांच को आसान बनाना और इलाज तक पहुंच को अधिक सुलभ बनाना है।

एक पारिवारिक समस्या से शुरू हुई यह कहानी अब एक ऐसे विचार में बदल गई है, जो इसी समस्या से जूझ रहे दूसरे लोगों की भी मदद कर सकता है।

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शुरुआत भाई की आंखों की समस्या से हुई

फ़रिया और सुहा के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में प्रवेश किसी कोडिंग क्लास, टेक्नोलॉजी सम्मेलन या भविष्य की मशीनों पर चर्चा से नहीं हुआ। इसकी शुरुआत उनके भाई ज़ेन से हुई।

ज़ेन को स्ट्रैबिस्मस था। यह आंखों से जुड़ी ऐसी स्थिति है, जिसमें दोनों आंखें एक ही दिशा में ठीक से नहीं देख पातीं। बचपन में आंखों की समस्या से जूझने वाले कई परिवारों की तरह जुबैर बहनों के लिए भी यह एक ऐसी स्थिति थी, जिसे वे शुरू में पूरी तरह समझ नहीं पा रही थीं।

लेकिन एक बात उन्हें जल्द समझ में आ गई। ऐसी समस्या का जितनी जल्दी पता चले और इलाज शुरू हो, आंखों की दृष्टि को लंबे समय तक प्रभावित होने से बचाने की संभावना उतनी ही बेहतर हो सकती है।

इसके बाद दोनों बहनों ने इस समस्या को समझने की कोशिश शुरू की। उन्होंने जानकारी जुटाई और यह जानने की कोशिश की कि भेंगेपन की पहचान और इलाज को अधिक आसान कैसे बनाया जा सकता है।इसी दौरान उन्हें पता चला कि समस्या सिर्फ उनके परिवार तक सीमित नहीं है।

भेंगेपन की पहचान हमेशा आसान नहीं

बच्चों में भेंगेपन की समस्या कई बार परिवार के लोग भी शुरुआती दौर में पहचान नहीं पाते। कई जगहों पर आंखों की जांच और विशेषज्ञ इलाज की सुविधा भी आसानी से उपलब्ध नहीं होती।

समस्या केवल आंखों तक सीमित नहीं रहती। किसी बच्चे की आंखों में साफ दिखाई देने वाला भेंगापन उसके आत्मविश्वास को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरे बच्चों और समाज की प्रतिक्रिया भी उसके अनुभव को प्रभावित करती है। फ़रिया और सुहा के सामने अब कई सवाल थे।

क्या भेंगेपन की शुरुआती जांच को आसान बनाया जा सकता है? क्या स्मार्टफोन जैसी आम तकनीक की मदद से परिवार शुरुआती संकेतों को पहचान सकते हैं?क्या इलाज और आंखों की एक्सरसाइज को घर तक पहुंचाना संभव है? इन्हीं सवालों से स्ट्रैबी क्योर का विचार सामने आया।

स्मार्टफोन कैमरे से शुरुआती जांच

स्ट्रैबी क्योर में स्मार्टफोन के कैमरे की मदद से भेंगेपन की शुरुआती स्क्रीनिंग करने का विचार शामिल है। इसके साथ आंखों की एक्सरसाइज और उनकी प्रगति को ट्रैक करने की व्यवस्था भी जोड़ी गई है।प्रोजेक्ट में घर पर थेरेपी के लिए एक किफायती उपकरण भी शामिल है।

इसका उद्देश्य विशेषज्ञ डॉक्टर की जगह लेना नहीं है। बल्कि शुरुआती स्तर पर समस्या को पहचानने और लोगों को समय पर उचित चिकित्सा सलाह तक पहुंचाने में तकनीक की मदद लेना है।एक परिवार की निजी चिंता से शुरू हुआ यह विचार अब एक व्यापक स्वास्थ्य समस्या के समाधान की दिशा में प्रयोग बन चुका है।

बिना बड़े संसाधनों के शुरू हुआ सफर

फ़रिया और सुहा के पास किसी बड़ी टेक कंपनी जैसे संसाधन नहीं थे। उनके पास जिज्ञासा थी। समस्या को समझने की इच्छा थी। और कुछ नया सीखने का उत्साह था।उन्हें सिर्फ समस्या समझना ही नहीं था। उन्हें यह भी सीखना था कि AI तकनीक का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

उपयोगकर्ताओं की जरूरतों को कैसे समझा जाए। अपने विचार का परीक्षण कैसे किया जाए। प्रोडक्ट कैसे तैयार किया जाए। और फिर उस प्रोडक्ट को ऐसे लोगों के सामने कैसे पेश किया जाए, जिन्होंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।किसी युवा व्यक्ति के लिए यह आसान काम नहीं है। खासकर तब, जब तकनीक और स्वास्थ्य जैसे दो अलग क्षेत्रों को एक साथ समझना हो।लेकिन दोनों बहनों ने यह चुनौती स्वीकार की।

UNICEF और Technovation के कार्यक्रम से मिला मंच

फ़रिया और सुहा की कहानी UNICEF Generation Unlimited और Technovation की संयुक्त पहल AI Ventures Accelerator से भी जुड़ी है।इस वर्ष 60 से अधिक देशों की 1,000 से ज्यादा युवा महिलाओं ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। 12 सप्ताह के इस एक्सेलरेटर कार्यक्रम के दौरान 200 से अधिक प्रतिभागियों ने काम करने वाले प्रोडक्ट, प्रदर्शन वीडियो और पिच तैयार की।

इसके बाद 11 वेंचर्स को शॉर्टलिस्ट किया गया। इन प्रोजेक्ट्स की 19 से 24 वर्ष की संस्थापकों ने Google के मंच पर अपने विचार प्रस्तुत किए।कार्यक्रम का मकसद केवल तकनीकी प्रोजेक्ट तैयार करवाना नहीं था। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य युवा महिलाओं को स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए AI और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल करने का अवसर देना भी था।

UNICEF Generation Unlimited के ग्लोबल सॉल्यूशंस के वरिष्ठ सलाहकार थॉमस माइकल के के मुताबिक, कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसी युवा महिलाओं को सामने लाना था, जिन्होंने अपने आसपास की समस्याओं को पहचाना और उन्हें हल करने की कोशिश शुरू की।

उनके मुताबिक, इन प्रतिभागियों की मेहनत और साझेदारी यह दिखाती है कि सही मार्गदर्शन और AI टूल्स मिलने पर युवा महिलाएं अपने विचारों को वास्तविक समाधान में बदल सकती हैं।

हर देश में समस्या अलग, सोच एक जैसी

AI Ventures Accelerator में शामिल सभी प्रोजेक्ट एक जैसे नहीं थे।फ़रिया और सुहा की शुरुआत आंखों की बीमारी से हुई। वहीं मेक्सिको की प्रतिभागी एंबर हर्नांडेज़ और फ़ातिमा गायतान ने CONCORA नाम का प्रोजेक्ट विकसित किया।

उनका प्रोजेक्ट युवाओं की एक आम समस्या से जुड़ा था। नौकरी के लिए कंपनियां अनुभव मांगती हैं। लेकिन युवाओं को अनुभव तभी मिल सकता है, जब कोई उन्हें पहला अवसर दे।दोनों प्रोजेक्ट की समस्याएं अलग थीं। देश अलग थे। परिस्थितियां अलग थीं। लेकिन दोनों के पीछे सोच एक थी।अपने आसपास मौजूद समस्या को पहचानना और उसके समाधान की कोशिश करना।

12 सप्ताह में बदला विचार

इस कार्यक्रम की खास बात केवल अंतिम 11 प्रोजेक्ट नहीं थे। असली बदलाव उस सफर में हुआ, जो एक विचार से शुरू होकर प्रोडक्ट और फिर अंतिम प्रस्तुति तक पहुंचा।कई प्रतिभागियों को कोडिंग, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, ग्राहक की जरूरत समझने या पिच तैयार करने का बहुत कम अनुभव था। लेकिन 12 सप्ताह के दौरान उन्होंने सीखा कि किसी विचार को वास्तविक और उपयोगी प्रोडक्ट में कैसे बदला जा सकता है।

Technovation की मुख्य शिक्षण एवं नवाचार अधिकारी रेबेका एंडरसन ने प्रतिभागियों में इतने कम समय में आए बदलाव को महत्वपूर्ण बताया।उनके अनुसार, इस कार्यक्रम की सफलता को केवल 11 शॉर्टलिस्ट किए गए प्रोजेक्ट्स से नहीं मापा जाना चाहिए। कार्यक्रम पूरा करने वाली 200 से अधिक टीमें भी इस सफर की उपलब्धि हैं।

AI को केवल इस्तेमाल नहीं, बनाने का जरिया

इस पूरी पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि युवा महिलाएं तकनीक को केवल इस्तेमाल करने वाली नहीं, बल्कि उसे बनाने वाली भूमिका में दिखाई देती हैं।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा अक्सर बड़ी टेक कंपनियों, निवेश, ऑटोमेशन, कंप्यूटिंग क्षमता और नौकरियों के भविष्य के संदर्भ में होती है।

लेकिन AI की एक दूसरी कहानी भी है।यह कहानी उन युवाओं की है, जो अपने आसपास की समस्याओं को देखते हैं और फिर तकनीक की मदद से उनके समाधान तलाशते हैं।फ़रिया और सुहा के लिए यह शुरुआत उनके घर से हुई। उन्होंने अपने भाई की आंखों की समस्या देखी। सवाल पूछे। जानकारी जुटाई। और फिर समाधान बनाने की कोशिश शुरू की।

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आगे की राह अभी लंबी है

स्ट्रैबी क्योर का सफर अभी पूरा नहीं हुआ है। प्रोजेक्ट को आगे विकसित करने के लिए मेडिकल विशेषज्ञों की सलाह, वैज्ञानिक परीक्षण, नियामकीय मंजूरी, फंडिंग और बड़े स्तर पर उपयोग जैसी कई चुनौतियों से गुजरना होगा।

लेकिन एक महत्वपूर्ण कदम पहले ही उठ चुका है।दोनों बहनों ने एक ऐसी समस्या को देखा, जिसे अनदेखा करना आसान था। उन्होंने उसे समझने की कोशिश की और फिर समाधान खोजने का फैसला किया।

यही AI Ventures Accelerator की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।किसी समस्या को देखकर यह सवाल पूछना कि इसे बदला कैसे जा सकता है।कहीं यह समस्या आंखों से जुड़ी हो सकती है। कहीं रोजगार से। कहीं शिक्षा से। कहीं स्वास्थ्य से। समस्या अलग हो सकती है, लेकिन समाधान तलाशने की शुरुआत एक ही सवाल से होती है।

क्या मैं इसे बेहतर बनाने की कोशिश कर सकती हूं?

फ़रिया और सुहा ने अपने भाई की आंखों की समस्या को देखकर यही सवाल पूछा था। उसी सवाल ने उन्हें स्ट्रैबी क्योर तक पहुंचाया।और शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है। सही तकनीक, सही मार्गदर्शन और कुछ नया करने का साहस मिल जाए, तो एक परिवार की छोटी सी चिंता भी समाज के लिए उपयोगी समाधान की शुरुआत बन सकती है।